#STANDWITHANAND

2.02.2019

दलित शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बडे को सुबह 3:30 बजे मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया गया है। अगर अब भी हमें लगता है कि देश में लोकतंत्र बचा हुआ है तो इससे ज़्यादा बेशर्मी और क्या हो सकती है! दलित बुद्धिजीवियों में शुमार तेलतुम्बड़े को पुणे पुलिस ने पिछले साल हुई भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में नामजद किया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महीने भर का वक्त इन बुद्धिजीवियों को जमानत लेने के लिए दिया था। सोमवार 14 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आनंद तेलतुम्बडे के खिलाफ पुणे पुलिस द्वारा की गई एफआईआर को रद्द करने संबंधी याचिका खारिज कर दी। ताज्जुब की बात देखिए उन्होंने कुछ ही दिन पूर्व अपनी बचाव में देश के लोगों से अपील भी की थी उन्होंने कहा था कि ‘मेरी उम्मीदें बिखर चुकी हैं, मुझे आपका सहयोग चाहिए। उनकी गिरफ्तारी उनके बचाव पर भी हमला है।
उन्होंने अपने बचाव में लिखा था कि अब तक मुझे भरोसा था कि पुलिस ने जो भी आरोप लगाए हैं उन्हें अदालत के सामने फर्जी साबित किया जा सकेगा इसलिए मैंने आप सब को परेशान नहीं किया था। अब हालांकि मेरी उम्मीदें पूरी तरह बिखर गई हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से मेरी याचिका खारिज होने के बाद मेरे पास पुणे की सत्र अदालत से ही जमानत लेने का रास्ता बचा है। अब समय आ गया है कि मेरी आसन्न गिरफ्तारी से मुझे बचाने के लिए विभिन्न तबके के लोग मिलकर एक अभियान छेड़ें।’ उन्होंने अपने बचाव में कहा था कि ‘मेरे लिए गिरफ्तारी का मतलब केवल जेल की जिंदगी की कठिनाइयां नहीं हैं। यह मुझे मेरे लैपटॉप से दूर रखने का मामला है जो मेरी देह का एक अभिन्न अंग हो चुका है। यह मुझे मेरी लाइब्रेरी से दूर रखने का मामला है जो मेरी जिंदगी का हिस्सा है, जहां आधी लिखी किताबें रखी जिसे देने का वादा प्रकाशकों से है, मेरे वे छात्र हैं जिन्होंने मेरी पेशेवर प्रतिष्ठा के नाम पर अपना भविष्य दांव पर लगाया है, मेरा संस्थान है जिसने मेरे नाम पर इतने संसाधन खर्च किए हैं और हाल ही में जिसने मुझे बोर्ड ऑफ गवर्नर का हिस्सा बनाया, और मेरे तमाम दोस्त व मेरा परिवार भी एक मसला है-मेरी पत्नी, जो बाबासाहब आंबेडकर की पौत्री हैं और जिन्होंने कभी भी इस नियति से समझौता नहीं किया और मेरी बेटियां, जो बिना यह जाने कि मेरे साथ बीते अगस्त से क्या हो रहा है, पहले से ही परेशान हैं।’
एन वेणुगोपाल राव ने फेसबुक में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए चार हफ्तों के समय तक आनंद तेलतुम्बडे को गिरफ्तार न करने के आदेश का घोर उल्लंघन करते हुए और उसे गिरफ्तार करने के खिलाफ व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभियान का अनादर करने के बाद अचानक आज पुणे पुलिस डॉ. तेलतुम्बडे को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मुंबई घरेलू हवाई अड्डे से सुबह 3.30 बजे गिरफ्तार किया गया जब वह कोच्चि से मुंबई लौट रहे थे। बताया जा रहा है कि उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि उनकी जमानत को पुणे ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया था! कानून के जानकारों का कहना है कि यह कार्रवाई उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवमानना का उल्लंघन करती है। दिनांक 14 जनवरी को न्यायालय ने आनंद को चार सप्ताह के लिए गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की ताकि वह जमानत के लिए अदालतों का रुख कर सके। तेलतुम्बडे मुंबई आए क्योंकि उन्हें अपने जमानत के लिए वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई के माध्यम से आज सुबह उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। उच्चतम न्यायालय आदेश के अनुसार तेलतुंबडे को आदेश की तारीख से 4 सप्ताह पूरा होने के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकता था, जब तक कि उन्हें निचली अदालतों या उच्च न्यायालय से जमानत नहीं मिल सकती थी। गिरफ्तारी से सुरक्षा की यह चार सप्ताह की अवधि 11 फरवरी को समाप्त होगी। आज सुबह उनकी गिरफ्तारी उपरोक्त आदेश का घोर उल्लंघन है।
आइए इस मामले को समझने के लिए हाशिया ब्लॉग में लिखे गए उनके लेख ‘भीमा-कोरेगांव: मिथक, रूपक और अभियान’ को अवश्य पढ़े:-
भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाने के लिए जस्टिस बीपी सावंत की अध्यक्षता में 31 दिसंबर को पुणे में दलितों, ओबीसी, मुस्लिमों और मराठा संगठनों द्वारा एक साथ मिल कर बुलाए गए यलगार कॉन्फ्रेंस की पूर्व संध्या उन्होंने एक लेख लिखा था ‘द मिथ ऑफ भीमा-कोरेगांव रीइन्फोर्सेज द आइडेंटिटीज इट सीक्स टू ट्रान्सेंड’। यह कॉन्फ्रेंस (जिसके संयोजकों में से एक मैं भी था) मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्व गिरोह की प्रतिक्रियावादी जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ था। इसके लिए एक महीने से ज्यादा चलने वाले अभियान के बावजूद, नागपुर, शिरूर और मुंबई से आयोजन स्थल शनिवारवाड़ा तक पहुंचने वाले लॉग मार्चों में, मुझे बताया गया कि, सिर्फ 30-35 लोगों ने ही भागीदारी की। लॉग मार्चों में सिर्फ 30-35 लोग ही क्यों शामिल हुए जबकि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में आने वालों की तादाद लाखों की होने वाली थी? यह देखना निराशाजनक था कि ‘नई पेशवाई’ से लडऩे के लिए लोगों को तैयार करने वाले सम्मेलन का नतीजा बस शायद यह निकले कि उससे भीमा-कोरेगांव में स्तंभ पर पहले से ही जुटने वाली भारी भीड़ में कुछ लाख लोग और बढ़ जाएं।
सिर्फ बाबासाहेब आंबेडकर के साथ इसके जुड़ाव की वजह से ही, जिन्हें सीमित करके दलितों ने अपनी पहचान की निशानी बना कर रख दिया है, भीमा-कोरेगांव पर और ऐसी ही दूसरी जगहों पर हाल के बरसों में दलितों की भीड़ में इजाफा हुआ है।इस लेख पर उग्र प्रतिक्रियाएं आईं, इनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं शामिल हैं। सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देश भर के प्रगतिशील दायरों से आईं, और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दिलचस्प तौर पर दलितों और हिंदुत्ववादी दकियानूस लोगों की तरफ से आईं जो ज्यादातर नाराजगी और दुव्र्यवहार से भरी हुई थीं। दलितों ने आमतौर पर ‘मिथक’ वाले हिस्से को पकड़ा, अपने दिल को तसल्ली देने के लिए मनमाने तरीके से उसे तोड़ा-मरोड़ा और इस तरह की अफवाहें फैला कर लोगों की भावनाएं भडक़ाने की कोशिश की कि यह आंबेडकर के खिलाफ था। यहां तक कि कांचा इलैया शेफर्ड जैसे विद्वान भी मेरी कही हुई बात को तोडऩे-मरोडऩे के इस शोर-शराबे में शामिल हो गए ताकि मुझे बदनाम कर सकें। मिसाल के लिए, उन्होंने लिखा, ‘आनंद तेलतुंबड़े, जो यह मानते हैं कि महार सैनिकों ने राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए अपनी जान नहीं दी’ जबकि मैंने साफ-साफ इसकी उल्टी बात लिखी थी, ‘ऐतिहासिक तथ्यों को एक ना-मौजूद राष्ट्र के चश्मे से देखना उतना ही निंदनीय है।’ लेख में पेश किए गए तथ्यों के लिहाज से एक भी चीज ऐसी नहीं थी जिस पर उंगली उठाई जा सके, लेकिन जब जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा हो तो तर्क की कोई नहीं सुनता।

#मिथकों के पीछे की सच्चाई

इस पर कोई मतभेद नहीं है कि भीमा-कोरेगांव में खड़ा स्तंभ महार सैनिकों के शौर्य की निशानी है, बल्कि इसके भी आगे कहें तो ये ज्यादातर दलित सैनिक ही थे जिन्होंने ब्रिटिशों को उनका साम्राज्य जीत कर दिया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की अनेक लड़ाइयों में सांकेतिक रूप से खास 1757 की पलासी की पहली लड़ाई से लेकर 1818 की भीमा कोरेगांव की आखिरी लड़ाई तक, दलित सैनिकों ने उनमें जीत हासिल करने में इंतहाई बड़ी भूमिका अदा की थी। जब अहसानफरामोश ब्रिटिशों ने यह बहाना बनाते हुए 1892 में दलितों की भर्ती बंद कर दी कि वे लड़ाकू नस्ल नहीं थे, तो दलित इससे नाराज हुए और उन्होंने वापस अपनी बहाली की मांग की। इसका नेतृत्व दलित आंदोलन के रहनुमाओं जैसे गोपाल बाबा वालंगकार, शिवराम जनबा कांबले ने किया और उनमें बाबासाहेब आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी आंबेडकर थे, जिन्होंने लड़ाकू नस्ल होने के अपने दावे के लिए वाजिब ही कोरेगांव स्तंभ की गवाही का इस्तेमाल किया।
लेकिन इस बात का संकेत देना एक मिथक है कि महारों ने कोरेगांव की लड़ाई को पेशवाओं द्वारा अपने अपमान का बदला लेने के लिए जीता था। बाबासाहेब आंबेडकर ने 119 साल बाद 1 जनवरी 1927 को पहली बार इस स्तंभ का दौरा किया और कहते हैं कि इसके बाद वे कई बार वहां गए। उन्होंने इसका इस्तेमाल महारों को प्रेरित करने के लिए किया कि वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ वैसी ही लड़ाई लड़ें जैसा उनके पुरखों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ी थी। महाड़ सम्मेलन में उन्होंने यह बताते हुए कि उनके पुरखे कितने ज्ञानी लोग थे, उनको अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की। आगे चल कर उन्हें जातीय पहचान की सीमाओं का अहसास हुआ और उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के तहत अपने आह्वान को व्यापक बनाते हुए मजदूरों और किसानों तक उसका विस्तार किया, जिसके भीतर दलित भी आते थे। इसके पहले और इसके बाद भी भीमा-कोरेगांव भुला दिया गया था और 1990 के दशक तक ऐसा ही रहा, जब दलित वहां जमा होने शुरू हुए-ये तथ्य अपने आप में ही दलितों द्वारा इसका मतलब लगाए जाने और दलित विद्वानों द्वारा इसके बारे में बुने जाने वाले सिद्धांतों की कहानी कहते हैं।
जिन बाबासाहेब आंबेडकर की समाधि की जगह पर एक छोटा सा ढांचा भी नहीं था जब तक कि उनके बेटे ने 1967 में मौजूदा स्तूप का निर्माण नहीं कराया, या फिर अन्य मांगों के अलावा जिनकी तस्वीर संसद के हॉल में लगाने के लिए दलितों को 1965 में एक व्यापक जेल भरो अभियान चलाना पड़ा था, वही आंबेडकर 1960 के दशक के आखिरी दौर में एक अहम प्रतीक बन गए। इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है। चुनावी राजनीति में लगातार प्रतिद्वंद्विता तेज होती जा रही थी, क्योंकि उत्तर-औपनिवेशिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने जातियों के ढांचे में सबसे ज्यादा आबादी वाली शूद्र जातियों में जो एक ग्रामीण धनी तबका पैदा किया था, उनकी क्षेत्रीय पार्टियां उभरने लगी थीं। इन हालात में शासक वर्गों ने बड़ी महारत से आंबेडकर को एक प्रतीक में ढाल दिया, ताकि दलितों को लुभाया जा सके जो अपने आंदोलन की शिकस्त के बाद अतीत के प्रति मोह के साथ आंबेडकर को भक्ति-भाव से देखने लगे थे। 1960 के दशक के आखिरी दौर तक जिस चैत्य भूमि पर उनके परिजनों समेत महज कुछ सौ लोग 6 दिसंबर को उन्हें याद करने के लिए जमा होते थे, वहां आज जमा होने वाले लोगों की तादाद बीस लाख के पार चली जाती है। आंबेडकर के बाद बढ़ती हुई तादाद में स्मारकों पर जमा होने वाले लोगों की तादाद में इजाफा, पहचान के उस जुनून की अभिव्यक्ति है, जिसे समकालीन राजनीतिक बदलावों ने जन्म दिया है।

#पेशवाई का रूपक

1990 के दशक से अब तक भीमा-कोरेगांव पर बिना किसी दिक्कत के लोग जुटते रहे हैं। फिर इस साल यह घटना क्यों घटी? जवाब इस बात में है कि ‘नई पेशवाई’ के खिलाफ इसका नारा जिन ताकतों ने पेश दिया वे दलितों, मुसलमानों, ओबीसी और मराठाओं के एक साथ एक जगह आने का एक झलक देते हैं। महाराष्ट्र में यह बदलाव सत्ताधारी भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं। पिछले साल राज्य को जिस मराठा आंदोलन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, वह राजनीतिक रूप से उलझन का शिकार था, क्योंकि भले ही इसे एक राजनीतिक दल ने उकसाया था, मगर वह दल इसके फायदे को अपने प्रतिद्वंद्वी दलों की झोली में जाने से रोक नहीं सका, साथ ही वह दलितों और ओबीसी के बीच अलगाव को भी नहीं रोक पाया। मराठाओं ने तय किया कि वे सत्ताधारी ब्राह्मणवादी भाजपा को निशाना बनाने के लिए दलितों से दोस्ती करेंगे। इस नई नई एकता को तोडऩे के लिए हिंदुत्व ताकतों ने शंभाजी भिडे और मिलिंग एकबोटे जैसे उकसावेबाजों को लगाया ताकि पास के वाडु बुडरूक गांव में संभाजी स्मारक के मुद्दे पर मराठाओं को दलितों के खिलाफ खड़ा किया जा सके। उन्होंने यह इतिहास का यह झूठ गढ़ा कि संभाजी के शव का अंतिम संस्कार गोविंद महार ने नहीं बल्कि एक मराठा परिवार ने किया था। 28 दिसंबर को उन्होंने गोविंद महार के स्मारक को नुकसान पहुंचाया, आसपास के गांवों में बंद का आह्वान किया, दलितों पर हमले की योजना बनाई और एक जनवरी को इस पर अमल किया। इसमें राजसत्ता की मिलीभगत बहुत साफ थी। अत्याचार अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत अपराधियों पर एफआईआर के बावजूद, और राज्य की निष्क्रियता पर विश्वव्यापी नाराजगी के बावजूद, राज्य ने उन्हें गिरफ्तार करने से इन्कार कर दिया, बल्कि उल्टे इन हमलों के विरोध में 3 जनवरी को एक शांतिपूर्ण बंद में भाग लेने के लिए राज्य भर से हजारों दलित नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया।
पेशवाई प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी शासन का एक रूपक बन गई थी, जिसके उत्पीडऩकारी इतिहास का ब्योरा अपना थूक जमा करने के लिए एक महार के गले में बंधी मिट्टी के घड़े और अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए कमर में बंधी कंटीली झाड़ी से दिया जाता है। नई पेशवाई मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्ववादी गिरोह के रूपक के बतौर काम करती है। इसे सिर्फ जातियों के पहलू के लिहाज से देख कर, इसके पुराने संस्करण के साथ इसका मिलान मत कीजिए। यह अपनी व्यापकता और फासीवादी क्षमताओं की वजह से उससे कहीं ज्यादा घातक है। इसके फासीवादी गुणों पर वामपंथी बुद्धिजीवियों की बहसें अपनी जगह, यह यूरोप में 1920 और 30 के दशकों में आई बदनाम फासीवादी हुकूमतों से भी कहीं बदतर होने जा रही है। अपने सैकड़ों सिरों वाले संगठन, ब्राह्मणवाद की विचारधारा जो दुनिया में समता-विरोधी सबसे पुरानी विचारधारा है, वैश्विक पूंजीवाद का समर्थन और अनुकूल राजनीतिक हालात इसे संभावित रूप से मुसोलिनी के इटली या हिटलर के जर्मनी से भी कहीं अधिक नुकसानदेह बनाते हैं। यह सत्ताधारी गिरोह अपने संस्थापकों की परिकल्पना के अति-फासीवादी चरित्र वाले हिंदू राष्ट्र के अपने सपने को हकीकत में उतारने के लिए अगले चुनावों को आखिरी मौके के रूप में देख रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह दलितों के लिए खतरनाक होने जा रहा है क्योंकि हिंदुत्व ताकतों के लिए वे ही असली ‘अन्य’ हैं।

##दलितों का अपना मिशन

बदकिस्मती की बात यह है कि दलित, फासीवाद, साम्राज्यवाद को अजनबी शब्दों की तरह लेते हैं, जो उनके लिए महज कम्युनिस्टों की बेमतलब की बकवास है। उनका अपना मिशन, उनका सर्वोच्च मकसद अपने जातीय उत्पीडऩ से लडऩा है। लेकिन इस लड़ाई की प्रकृति क्या है? क्या वे इस पैमाने को उलटना चाहते हैं या जातियों का खात्मा करना चाहते हैं? पहचान (अस्मिता) की जो हसरत दिखाई देती है, उससे पक्के तौर पर तो यही इशारे मिलते हैं कि दलित जातीय ढांचे के भीतर ही एक तरह के शासक समुदाय जैसी प्रभुत्वशाली हैसियत पा लेंगे, जैसा कि कहीं पर आंबेडकर ने कहा था। इसके तहत मन ही मन यह मान लिया गया है कि जातियों का खात्मा नहीं हो सकता है। लेकिन इस मान्यता के साथ दिक्कत यह है कि यह जातीय पहचान के चरित्र को लेकर नादानी को ही जाहिर करती है, क्योंकि जातीय पहचान का बुनियादी गुण ऊंच-नीच का क्रम (हाइरार्की) है। यह जातियों को अमीबा की तरह बांटती और अलग करती है। इसका सबूत यह है कि आंबेडकर ने दलित नाम की जो श्रेणी बनाई, वह भी दलित जातियों को एक साथ नहीं रख सकी और न ही उन्हें उप-जातियों में टूटने से बचा सकी। जातीय पहचान के आधार पर बनाई गई कोई भी चीज जनता की एक व्यापक एकता नहीं बना सकती है। शासक समुदाय बनने का सपना, ऊपर उठ रहे दलितों के एक छोटे से तबके को प्रेरणा भले दे दे, लेकिन यह हमेशा ही एक ऐसा हसीन सपना बना रहेगा, जो कभी हकीकत नहीं बन पाएगा।
दलितों का असली मकसद, बल्कि देश का ही असली मकसद जातियों का खात्मा होना चाहिए, जिसकी पैरवी इत्तेफाक से खुद आंबेडकर ने ही की है। उन्होंने बीमारी की पहचान करते हुए कहा था कि जातियों की जड़ें हिंदू धर्म के धर्मशास्त्रों में हैं और चूंकि हिंदू कभी भी इन धर्मशास्त्रों को नष्ट करने को तैयार नहीं होंगे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म को छोडऩे का फैसला किया और बौद्ध धर्म अपनाया। यह समाधान कितना कारगर था, इस बहस में न जाते हुए, यह बात समझनी जरूरी है कि अकेले दलित कभी भी जातियों का खात्मा नहीं कर सकते। इसके अलावा यह बात भी है कि जातियां आज पुराने दौर की जातियां नहीं रह गई हैं जैसी आंबेडकर के चिंतन में दिखती हैं, बल्कि वे वर्ग के साथ घुल-मिल गई हैं, जो समकालीन दुनिया की एक प्रभुत्वशाली श्रेणी है। इसके अलावा, ऐसी घोर ढांचागत बाधाएं भी हैं जिन्हें उत्तर-औपनिवेशिक शासक वर्गों ने संविधान में ही तैयार किया, जिसे वे पवित्र मानते हैं। जाति और वर्ग के इस जटिल मकडज़ाल को, सिर्फ अवाम के ऐसे एकजुट संघर्ष से ही तोड़ा जा सकता है जो वर्गीय पहचान की बुनियाद पर कायम हुआ हो।

जिन दलितों को इस पेशकश में कुफ्र की बू आ रही हो उनके लिए मैं आंबेडकर की ही बात को पेश कर सकता हूं-‘कोई भी महान आदमी अपना फर्ज अदा नहीं कर रहा है अगर वह अपने शिष्य पर अपने उसूलों या अपने नतीजों को जबरदस्ती थोपते हुए उसे पंगु बना दे। महान आदमी अपने शिष्यों पर अपने उसूल नहीं थोपते…अगर एक शिष्य अपने गुरु के उसूलों या नतीजों को कबूल नहीं करता तो इसमें कोई भी कृतघ्नता नहीं है। क्योंकि जब वह उन्हें नकारता है तो वह गहरी श्रद्धा के साथ अपने गुरु के आगे यह भी कबूल करता है कि ‘आपने मेरी आंखें खोलीं कि मैं अपना आपा हासिल कर सकूं-इसके लिए आपका शुक्रिया।’ गुरु इससे कम किसी चीज का हकदार नहीं है। और शिष्य इससे ज्यादा कुछ देने के लिए मजबूर नहीं है।’

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