29.01.2019

कृष्णा सोबती नहीं रहीं। 94 साल की अवस्था में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सामान्यत: इस उम्र में किसी का जाना बहुत धक्का नहीं पहुंचाता है। लेकिन कृष्णाजी के जाने से ऐसा लगता है कि कोई बहुत बड़ा खजाना आपसे छीन लिया गया है। खजाना केवल रचनाओं का नहीं, बल्कि शब्दों का, विचारों का, हौसले का और जीवट का। सामान्य इंसान अक्सर 60 और बहुत हुआ तो 70-75 तक खुद को बूढ़ा बताकर दुनियादारी से अलग कर लेता है। जीवन जी लिया अब तो भगवदभक्ति में लीन रहना है, ऐसी सोच 60 पार वालों के लिए बना दी गई है और भारतीय समाज में तो महिलाओं को और जल्दी ही जीवन से चुका हुआ मान लिया जाता है। लेकिन कृष्णा जी इस मामले में अपनी रचनाओं की तरह ही अनूठी थीं, लीक से हटकर थीं।

उन्होंने आख़िरी समय तक न केवल अपनी रचनात्मक सक्रियता बनाए रखी, बल्कि एक सजग साहित्यकार और नागरिक होने का फर्ज़ भी अदा किया। 2015 का वह दौर अभी भी याद है, जब देश में राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषाएं गढ़ कर कुछ लोगों के विद्रोह, असंतोष को देशद्रोह बतलाया जा रहा था। असहिष्णुता बनाम सहिष्णुता का राजनैतिक षड्यंत्र खुलेआम रचा जा रहा था। सत्ताविरोधी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों पर तरह-तरह के प्रहार हो रहे थे। दादरी में अखलाक की हत्या भारतीय समाज की समरसता के ताने-बाने को नष्ट करने का प्रमाण बन गई थी। तब भी बहुत से लेखकों-कलाकारों ने चुप्पी साधी हुई थी कि हम क्यों बोले, और नाहक मुसीबत मोल लें। मानो उनका लेखन, उनका कला कर्म इस समाज से परे है।

लेकिन तब 90 बरस की अवस्था में शारीरिक रूप से थोड़ी कमजोर कृष्णा सोबती जी दिल्ली के मावलंकर सभागार पहुंची और वहां इन हालात के विरोध में आयोजित कार्यक्रम में अपनी बात दमदार तरीके से रखी। उन्होंने कहा- ‘जिन लोगों का साहित्य से कोई परिचय ही नहीं है, जिन्हें भारतीयता का कोई बोध ही नहीं है, वे लेखकों को भारतीयता सिखाएं और उनके विरोध को ‘मन्युफैक्चर्ड’ बताएं, हमारे समय की इससे बड़ी कोई दूसरी विडंबना नहीं हो सकती’। ऐसी थी कृष्णाजी की वैचारिक ताकत। आज ऐसे लोग उंगलियों पर गिने-चुने रह गए हैं, जो जितनी सच्चाई और प्रतिबद्धता से लिखते हैं, उतनी ही सच्चाई से अपने आदर्शों को जीते भी हैं। वर्ना बड़े-बड़े लेखकों का भी हाल ये है कि किसी तरह सम्मान, पुरस्कार या सरकारी अकादमियों में पद का जुगाड़ हो जाए और नवोदित लेखक उनके चरणस्पर्श कर उन्हें महान होने का यकीन दिलाते रहें।

2010 में कृष्णाजी ने पद्म भूषण सम्मान यह कहकर इंकार कर दिया था कि ‘एक लेखक के तौर पर मुझे सत्ता प्रतिष्ठान से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।’ 2002 में बेबी हालदार की किताब ‘आलो आंधारि’ प्रकाशित हुई। कम उम्र में विवाह, बच्चे, जीवनयापन के लिए घरों में झाड़ू पोंछे का काम करने से लेकर लेखिका बनने का दारूण सफ़र बेबी हालदार की इस आत्मकथात्मक किताब में दर्ज है। बेबी के जीवनसंघर्ष को पढ़कर कृष्णाजी खुद उनसे मिलने गईं। एक स्थापित, मशहूर लेखिका का एक नवोदित लेखिका के लिए ऐसा व्यवहार आज के वक्त में अजूबा ही है। इन दोनों की भेंट को शायद एक युग की स्त्री शक्ति की दूसरे युग की स्त्री शक्ति से मुलाकात भी कहा जा सकता है। ऐ लड़की, मित्रो मरजानी, डार से बिछड़ी, जिंदगीनामा उनकी तमाम रचनाएं स्त्री विमर्श का नया मुहावरा गढ़ती हैं। लेकिन उनका लेखन केवल स्त्री विमर्श के दायरे में कैद नहीं रहा, यह उनकी संस्मरणात्मक किताब हम हशमत के तीनों खंडों को पढ़कर समझा जा सकता है।

पुरुष-सत्ता द्वारा बनाए असहिष्णु साहित्य-समाज में एक पुरुष का अनुशासनीय रूप धरकर कृष्णा जी ने ‘हशमत’ की निगाह को वह ताकत दी है कि जिसे सिर्फ पुरुष रहकर कोई मात्र पुरुष-अनुभव से सम्भव नहीं कर सकता, न ही कोई स्त्री, स्त्री की सीमाओं को पार किए बगैर इस मानवीय गहनता को छू सकती है। ऐसा पाठ साहित्य और कलाओं में अर्द्धनारीश्वर की रचनात्मक सम्भावनाओं की ओर इंगित करता है। वे कहती हैं- मेरे आसपास की आबोहवा ने मेरे रचना संसार और उसकी भाषा को तय किया। जो मैंने देखा, जो मैंने जिया, वही मैंने लिखा, हर मुमकिन बेबाकी के साथ। बिना ये सोचे कि वो पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे। लेखकों की दुनिया भी पुरूषों की दुनिया है. लेकिन जब मैंने लिखना शुरू किया तो छपा भी और पढ़ा भी गया। बेशक कृष्णाजी पढ़ी गईं और आगे भी खूब पढ़ी जाती रहेंगी। क्योंकि उनकी रचनाओं में उनके विचारों को पढ़ने के साथ-साथ पाठक की अपनी दृष्टि भी विकसित होती है कि वह यथास्थितिवाद से पार देखने की कोशिश कर सके।

कृष्णाजी ने एक बार कहा था- मैं उस सदी की पैदावार हूँ जिसने बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ छीन लिया। यानी एक थी आज़ादी और एक था विभाजन। मेरा मानना है कि लेखक सिर्फ़ अपनी लड़ाई नहीं लड़ता और न ही सिर्फ़ अपने दु:ख-दर्द और ख़ुशी का लेखा-जोखा पेश करता है। लेखक को उगना होता है। भिड़ना होता है हर मौसम और हर दौर से। नज़दीक और दूर होते रिश्तों के साथ, रिश्तों के गुणा और भाग के साथ। इतिहास के फ़ैसलों और फ़ासलों के साथ। जीवन को और लेखक के जीवन को इतने सरल तरीके से अब भला कौन समझाएगा।