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29.01.2019

छत्तीसगढ़ की नव निर्वाचित सरकार द्वारा इंस्पेक्टर कल्लूरी की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) और आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) के महानिरीक्षक के पद पर नियुक्ति से हम स्तब्ध और निराश हैं। एसआरपी कल्लूरी के पूरे सेवाकाल को अगर हम देखें तो वह बिना किसी डर और बेशर्मी के साथ किये गए अनगिनत मानवाधिकारों के उल्लंघन से भरा हुआ है। उनके काम का ट्रैक रिकॉर्ड यह साफ दिखाता है कि एक पुलिस अफसर होने के बावजूद उनके मन में कानून के शासन के लिए कोई सम्मान नहीं है।

उनके नेतृत्व में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा किये गए अभियानों में कई फर्जी मुठभेड़, महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर यौन हिंसा, नकली आत्मसमर्पण, आगजनी, लूटपाट, फ़र्ज़ी गिरफ्तारियां और जबरन विस्थापन शामिल हैं। वास्तव में, माओवादियों से लड़ने का “कल्लूरी तरीका” गैरकानूनी, अनुत्पादक रहा है जिसके चलते पुलिस और सरकार के ऊपर जो मूल विश्वाश जनता को होना चाहिए वह ख़त्म हो गया है।

यह प्रमाणित है कि श्री कल्लूरी ने न केवल इस तरह के अभियानों का नेतृत्व किया, बल्कि उनमें भाग भी लिया। सन 2007 में कल्लूरी जब बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक थे तब उन पर आरोप लगा था कि उनहोंने सरगुजा जिले में एक आदिवासी महिला के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया था। सन 2011 में भी जब कल्लूरी दंतेवाड़ा के एसएसपी थे तब ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली के गाँवों का आगजनी और लूटपाट, महिलाओं के साथ बलात्कार और गांव वालों की हत्याओं में उनकी सीधी भूमिका के लिए उन्हें दंतेवाड़ा से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया था। सी.बी.आई. दस्तावेज़ जो लीक हुए थे तद्मेतला गाँव को तेहेस नेहेस करने में कल्लूरी की सीधी भागीदारी दर्शाता है,एवं खुद भी कल्लूरी ने इस घटना में अपनी मुख्य भूमिका को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया है. 2017 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा दक्षिण छत्तीसगढ़ में बढ़ते मानवाधिकारों के उल्लंघन में और सामाजिक एकता वगैरह जैसे समूहों की गतिविधियों में जब कल्लूरी की प्रत्यक्ष भूमिका का संज्ञान लिया गया तब छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उन्हें आईजी बस्तर के पद से हटा दिया गया।

लोगों की आवाज़ों को दबाने के लिए कल्लूरी द्वारा सामाजिक एकता मंच जैसे समूहों का गठन और उपयोग करने की रणनीति सामाजिक ताने-बाने और कई जिंदगियों को नष्ट करने में कारगर रही। सलवा जुडूम के खिलाफ चल रहे मामले में 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था की माओवादियों के खिलाफ लड़ने में आदिवासी युवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और इस प्रमुख वजह से उच्च न्यायालय द्वारा सलवा जुडूम को असंवैधानिक बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया गयाथा। न्यायालय का मानना था की ऐसी नीति आदिवासी समाज को विभाजित और नष्ट कर देगी। निर्णय के पैरा 17-18 में कहा गया है कि “ऐसी भ्रामक नीतियां, यद्यपि कुछ नीति निर्माताओं द्वारा जोर-शोर से पेश की जाती हैं, हमारे संविधान की दृष्टि और अनिवार्यता के विपरीत हैं …” निर्णय यह भी कहता है कि माओवादियों या माओवादी सहानुभूतिदाताओं की पहचान करने के काम में स्थानीय निर्दोष आदिवासियों की माओवादी या उनके सहानुभूतिदाताओं के रूप में ब्रांडिंग हो सकती है । यह निश्चित रूप से उन गाँवों में माहौल को खराब कर देगा और निर्दोष लोगों के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की स्थितियों को जन्म देगा, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के खिलाफ और अधिक स्थानीय लोग हथियार उठाएंगे।(पैरा 51) एसआरपी कल्लूरी ने सार्वजनिक रूप से इस दृष्टिकोण से अपनी असहमति जताते हुए दावा किया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गुमराह किया है और खुल कर इस नीति के प्रयोग का समर्थन कियाऔर बस्तर में डी आर जी फाॅर्स का उपयोग बढ़ाया गया। डी.आर.जी में, कल्लूरी के शब्द में, वो लोग है जो की “निचले कैडर के पूर्व नक्सली, पूर्व में माओवादी सहानुभूति रखने वाले, सलवा जुडूम के दौरान विस्थापित हुए ग्रामीण, जो मिट्टी के पुत्र कहे जाते हैं, विद्रोहियों से अपनी खोई हुई भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए दृढ़ता से भावुक हैं”. यह पूर्ण तरीके से उच्च न्यायालय के निर्णय में कही गयी बात के खिलाफ है.

कल्लूरी जिन नीतियों और तरीकों के तरफ़दार हैं उसकी वजह से ग़ैर-जवाबदेही और शक्ति के दुरुपयोग का जो माहौल बना वह उनके कार्यकाल ख़तम हो जाने के बाद भी नहीं सुधरा। जनतंत्र के समर्थन की कोशिशों के प्रति उन्होंने हमेशा दु्र्भावना भरी प्रतिशोध की नीति अपनाई और खुली आलोचनाओं पर उनकी प्रतिक्रिया जनतांत्रिक तो बिलकुल भी नहीं रही, बल्कि कई बार तो सामान्य शालीनता की सीमाएं भी लांघ गई। उनके कार्यकाल में जिसने भी सांवैधानिक अधिकारों को बचाने की कोशिश की उन्हें उलटे-सीधे नाम देकर, उनके बारे में अफ़वाहें फैला कर, उनके खिलाफ़ मानहानि के हथकंडे अपना कर और उनपर हमले करवा कर उन्हें चुप कराने की कोशिशें की गईं। ऐसे तानाशाही तरीकों का बुरा असर बहुत समय तक बना रहता है और जनता के मन में हमेशा के लिए डर और शंकाएं बैठ जाती हैं।

उनका अपराध सिर्फ हिंसा फैलाना और कई अवसरों पर ख़ुद क़ानून तोड़ना नहीं है, उन्होंने पुलिस के बारे में सारे बुरे ख़यालों को सही साबित कर के पुलिस नाम की पूरी संस्था को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचाया है। एक पुलिस वाले से अपेक्षित होता है कि वह सच्चा, ईमानदार और क़ानून का पालन करने वाला इंसान हो। सबको दिखता है कि ये ख़ूबियाँ कल्लूरी के अंदर दूर-दूर तक नहीं हैं। अगर लोग पुलिस पर भरोसा करना छोड़ देंते हैं, और अगर पुलिस ख़ुद क़ानून तोड़ने वाली संस्था बन जाती है, तो लोगों के सांवैधानिक जनतंत्र से मुँह मोड़ लेने की और भी वजहें खड़ी हो जाती हैं ।

यह मुनासिव है कि जिनको अहम् ज़िम्मेदारी में पद्दोनित किया जाता है उनका ट्रैक रिकॉर्ड बेहद शानदार हो और उनपर एक सामूहिक विश्वास की भावना हो. हम कांग्रेस सरकार से पूछते हैं कि श्री कल्लूरी की सेवा में ऐसा क्या है कि उन्हें यह पुरस्कार दिया जा रहा है? हमें स्मरण है कि जब कांग्रेस नेता जब विपक्ष में थे, तब कल्लूरी के कार्यो की उन्होंने कई बार घोर निंदा की थी. जो हम देख रहे है, हमारे अनुसार एक लगातार चलता आ रहा कल्लूरी पर एक राजनैतिक संरक्षण का प्रतीक है जिसके करणवश ऐसे घोर अपराधों से चिन्हित होने के बावजूद उनकी करियर में बारम-बार पदोन्नति हो जाती है. एक जगह हो रहा अन्याय, हर जगह के न्याय के लिए खतरा है। अधोहस्ताक्षरों में पत्रकारिता, कानून, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, छात्र, मानवाधिकार कार्यकर्ता, नागरिक समाज समूहों के सदस्य और अन्य क्षेत्रों के पेशेवर लोग हैं। उनमें से कई लोगों ने कल्लूरी के नेतृत्व में पुलिस द्वारा अपनाई जाने वाली प्रतिशोध की हरकतों का सामना किया है। हर एक अधोहस्ताक्षरों के बदले कई आदिवासी ग्रामीण है जिनको घोर छति पहुची है और वे इस पत्र को और भी स्वेच्छापूर्वक हस्ताक्षरित करेंगे. न्याय और निष्पक्षता के दृष्टिकोण से हम सरकार से मांग करते है की एक अव्काषित न्यायधीश के नेत्रित्व में एक एस. आई. टी. का गठन कर, श्री कल्लूरी के उन सभी अपराधों पर तहकीकात करे, जिनमें उनको बार बार दोष दिया गया है जब वे उत्तर और दक्षिण छत्तीसगढ़ में नियुक्त थे. इन सभी प्रकरणों के तहत, उनको तत्काल निलंबित किया जावे जब तक तहकीकात निष्कर्षित न होती है.

हस्ताक्षर कर्ता 

1. अर्धेंदु सेन, IAS (retd) पूर्व मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल
2. अमिताभ पांडे, IAS (retd) पूर्व सचिव, राष्ट्रीय एकता परिषद
3. जी. बालगोपाल, IAS (retd)
4. एम.जी. देवसहायम, IAS (retd)
5. वी. रमणी , IAS (retd) पूर्व निदेशक, YASHADA
6. डॉ। केएस सुब्रमण्यम, IPS (retd) दिल्ली
7. सी बालाकृष्णन, IAS (retd) पूर्व सचिव कोयला, भारत सरकार
8. सुंदर बुर्रा, IAS (retd)
9. केशव देसिरजू, IAS (retd) पूर्व स्वास्थ्य सचिव, भारत सरकार
10. जे. हरिनारायण, IAS (retd), पूर्व मुख्य सचिव आंध्र प्रदेश
11. सुमंत्र गुहा, IAS (retd)
12. केपी फेबियन IFS (retd) इटली में पूर्व राजदूत
13. अरुण कुमार IAS (retd)
14. आभा भैया, जगोरी (ग्रामीण), एचपी
15. प्रोफेसर सुजाता पटेल, भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान, शिमला
16. रितु मेनन, प्रकाशक और लेखक, दिल्ली
17. नंदिता गांधी, अक्षरा, मुंबई
18. पामेला फिलिप, पत्रकार और लेखक, दिल्ली
19. रितु दीवान, नारीवादी अर्थशास्त्री, मुंबई
20. गीता सेशु, पत्रकार, मुंबई
21. डॉ. पांचाली रे, जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता
22. एन सरोजिनी, एसएएमए, दिल्ली
23. पूर्णिमा गुप्ता, दिल्ली
24. वर्जीनिया सालदान, मुंबई
25. तरंगिनी श्रीरामन, टीआईएसएस, मुंबई
26. हसीना खान, बेबाक कलेक्टिव, मुंबई
27. डॉ. वीणा पूनाचा, एसएनडीटी विश्वविद्यालय
28. डॉ. मैरी जॉन, महिला विकास अध्ययन केंद्र, दिल्ली
29. रूनु चक्रवर्ती, नारीवादी कार्यकर्ता, दिल्ली
30. गैब्रिएल दिएत्रिच, एनएपीएम और पेनुरिमई इयक्कम, मदुरै
31. राधिका खजुरिया
32. भारत की पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता, इंदिरा जयसिंह, दिल्ली
33. वंदना महाजन, नारीवादी कार्यकर्ता, बैंगलोर
34. लारा जेसानी, मुंबई
35. लेना गणेश, नारीवादी कार्यकर्ता
36. SAHELI, दिल्ली
37. वाणी सुब्रमण्यम, फिल्म-निर्माता, दिल्ली
38. डॉ. साधना आर्य, सहेली, दिल्ली
39. अनुराधा बनर्जी, सहेली, दिल्ली
40. अंजलि जोशी, सहेली, दिल्ली
41. श्रद्धा चिकरूर, पीएचडी उम्मीदवार, हैदराबाद विश्वविद्यालय
42. विमोचन, बैंगलोर
43. लक्ष्मी कृष्णमूर्ति, अलारिप्पू, बैंगलोर
44. चरणिका शाह, क्वीर नारीवादी कार्यकर्ता, मुंबई
45. LABIA, मुंबई
46. अनुराधा पाती, विकास विशेषज्ञ और उद्यमी, बैंगलोर
47. सुजाता गोटुसकर, श्रम अधिकार कार्यकर्ता, मुंबई
48. सोमा के.पी., शोधकर्ता और भूमि अधिकार कार्यकर्ता, दिल्ली
49. आशिमा रॉय चौधरी, सहेली, दिल्ली
50. अमृता शोधन, स्वतंत्र शोधकर्ता, हांगकांग
49. डॉ. मीरा शिवा, जन स्वस्थ्य आन्दोलन, दिल्ली
52. ऋचा औषिध्या, जन चेतना संगठन, राजस्थान
53. मीना सेशु, SANGRAM, महाराष्ट्र
54. डॉ. एन इंदिरा, स्वतंत्र शोधकर्ता, हैदराबाद
55. मालिनी घोष, नारीवादी कार्यकर्ता, दिल्ली
56. सीमा कुलकर्णी, मकमा
57. अर्शी कुरैशी, कश्मीर महिला सामूहिक
58. निति सक्सेना, AALI
59. नत्था पहलंग, थामा यू रंगली-जूकी, शिलांग
60. प्रो अर्चना प्रसाद, जेएनयू
61. सोनी सोरी
62. बेला भाटिया, अधि. और सामाजिक वैज्ञानिक
63. राजीव धवन, वरिष्ठ अधिवक्ता, भारत के सर्वोच्च न्यायालय
64. कल्याणी मेनन सेन
65. शालिनी गेरा, अधिवक्ता, बिलासपुर उच्च न्यायालय
66. निशा बिस्वास
67. फ्रेनी मैनक्शा, पत्रकार
68. पियोली स्वातीजा, अधिवक्ता, भारत का सर्वोच्च न्यायालय
69. राधिका चितकारा, स्वतंत्र कानूनी शोधकर्ता
70. श्रेया संगाई
71. मधुर भारतीय, वकील, क्विल फाउंडेशन
72. गुनीत कौर, एडवोकेट, दिल्ली
73. मीरा संघमित्रा
74. अनुपमा पोटलुरी
75. बलजीत कौर, QUILL फाउंडेशन
76. अरित्रा भट्टाचार्य, स्वतंत्र पत्रकार
77. ईशा खंडेलवाल, अधिवक्ता
78. कृतिका, गवर्नमेंट लॉ कॉलेज मुंबई
79. निकिता सोनवणे
80. अरुंधति विश्वनाथ, बैंगलोर
81. करुणा डी.डब्ल्यू., चेन्नई
82. सारा जैकबसन
83. पद्मजा शॉ
84. दुनू रॉय
85. पूजा, स्वतंत्र कानूनी शोधकर्ता, पटना
86. शोभा आर., मानवाधिकार कार्यकर्ता
87. अतीन्द्रियो चक्रवर्ती, कानूनी शोधकर्ता, कोलकाता
88. निकिता अग्रवाल, अधिवक्ता, बिलासपुर उच्च न्यायालय
89. रोसमम्मा थॉमस, पुणे
90. शैलजा शर्मा, वकील
91. श्रीमोई नंदिनी घोष, वकील
92. उमा चक्रवर्ती
93. किरण शाहीन
94. शारण्या नायक
95. कविता कृष्णन
96. कामायनी बाली महाबल
97. विद्या ए.
98. शिवानी तनेजा
99. जेनी सल्फाथ
100. शिखा पांडे, अधिवक्ता
101. चांदनी चावला
102. मनस्वी आशेर, हिमाचल प्रदेश
103. कार्तिक बिट्टू कोंडैया
104. सोहिनी शोएब
105. तन्मय निवेदिता
106. कल्याणी
107. फेलिक्स पैडल
108. काव्या चौधरी
109. अरुंधति ध्रुव
110. नंदिनी राव, नई दिल्ली
111. नंदिनी सुंदर
112. मधुश्री बसु, डांसर, चेन्नई
113. आलोक लड्ढा, चेन्नई गणितीय संस्थान
114. शबनम हाशमी, सामाजिक कार्यकर्ता, अनहद
115. अर्जुन श्योराण, अधिवक्ता, राष्ट्रीय सचिव, PUCL
116. भामती एस., फिल्म निर्माता
117. दीपिका, जन स्वास्थ्य अभियान, छत्तीसगढ़
118. त्रिष्णा सेनापति, कॉर्नेल विश्वविद्यालय
119. तारु डालमिया, नई दिल्ली, संगीतकार
120. मनीषा सेठी, दिल्ली
121. ओशिक सिरकार, कानूनी अकादमिक
122. उमा वी. चंद्रू, बैंगलोर
123. मानसी पिंगल
124. अजिता, डब्ल्यू.एस.एस.
125. रिद्धि पांडे, छात्र, स्नातक संस्थान, जिनेवा
126. सुरत्नो बासु
127. निधि जोशी
128. ऋषिका सहगल
129. सास्वती घोष, कोलकाता
130. कल्याणी बडोला
131. मालिनी सुब्रमण्यम, पत्रकार
132. स्टेन स्वामी, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, रांची, झारखंड
133. सौरव दत्ता, पत्रकार, दिल्ली
134. अभिनाश डी.सी.
135. कलादास डेहरिया, रेला कोल्लेक्टिव
136.ममता डाश
137. शबनम सेनगुप्ता
138. प्रियंका शुक्ल
139. अजय टी.जी.
140. पद्मजा शॉ
141. वसंता कुमारी
142. पी. पावनी
143. रिंचिन
144. डॉ. लाखन सिंह  पीयूसीएल छत्तीसगढ़

145. शरन्य नायक, कोरापुट
146. विकास दुबे, IIT कानपूर
147. राष्ट्रीय दमन और यौन शोषण के खिलाफ महिलाएं (WSS)
148. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ
149. जन जागरण संगठन
150. लोक स्वातंत्र्य संगठन

151. एडवोकेट प्रियंका शुक्ला

152. उत्तम कुमार ,संपादक दक्षिण कोसल.

153. अर्जुन सिंह ठाकुर, राष्ट्रीय महासचिव आंबेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया

 

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