25.01.2019

(आमुखः भारत एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक गणतंत्र होने की प्रतिज्ञा ली है। परन्तु दुख की बात तो यह है कि वर्तमान राजनीतिक हालात में इन मूल्यों को कमजोर किया जा रहा है। लगभग 20 बुद्धिजीवी, प्रोफेषनल्स और कार्यकर्ता, जो गरीबो और पिछड़ों के मौलिक अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं और जो संवैधानिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए प्रतिबद्ध हैं, उन्हें ‘षहरी नक्सली’ बताकर परेषान किया जा रहा है। उनके घरों तथा दफ्तरों पर छापेमारी की गयी, उनके इलेक्ट्रानिक उपकरणों को जब्त किया गया तथा उनके विरूद्ध गंभीर आपराधिक मुकदमें दर्ज किए गए हैं। इनमें से कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तो पहले ही गिरफ्तार किए जा चुका है और कुछ अन्य को किसी भी समय गिरफ्तार किए जा सकता है।

मैं, स्टेन स्वामी, भी इस केस में एक ‘सस्पेक्ट’ बताया जा रहा हॅंू। मेरे निवास पर पुलिस की छापेमारी 28 अगस्त, 2018 को की गयी और चार महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस ने मेरे खिलाफ कोई भी आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल नहीं किया है। जब मैं मुम्बई उच्च न्यायालय में मेरे खिलाफ चल रहें एफ.आई.आर. को रद्द करने के लिए आवेदन किया तो मेरे आवेदन को न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया। इसके बदले में न्यायालय ने बिना किसी समय-सीमा का निर्धारण किए, मेरे खिलाफ जाॅंच जारी रखने के लिए पुलिस को अधिकृत कर दिया है कि यदि मैंने विधि-विरूद्ध क्रियाकलाप अधिनियम के अंतर्गत कोई अपराध कारित किया है, तो मेरे विरूद्ध उचित कानूनी कार्यवाही किया जाए। यह वास्तव में पुलिस के लिए एक खुला प्रस्ताव है!

इस केस के अभियुक्तों ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन किया है। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालय पुलिस की दलीलों के अनुसार चल रही है तथा अभियुक्तों के कथनों पर कोई संज्ञान नहीं ले रही है।

यहाॅं मैं सभी लोकतंत्र-पसंद व्यक्तियों, संगठनों, समूहों, आंदोलनों और साधारण नागरिकों से अपील करता हॅंू कि वे इस परिस्थिति के विरूद्ध अपनी आवाज उठाएं। (स्टेन स्वामी)
इस सम्बन्ध में निम्नलिखित विचारों को, यदि इनका कोई मूल्य है, तो ध्यान मेें लिया जाना चाहिएः

1) न्यायाधीष पी.बी.सावंत, जो 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगाॅंव ‘एलगार परिषद’ के कार्यक्रम के आयोजक थे, ने अपने एक साक्षत्कार में इस बात को प्रमाणित किया है कि ‘‘वर्षों से ये दलित, राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता भीमा कारेगाॅंव जा रहे हैं और आज तक कोई घटना नहीं घटी। ऐसा पिछले साल ही क्यों हुआ? हमारे स्रोत यह बताते हैं कि दो लोग (भिडे और एकबोटे) कम से कम दो महीने पहले से इसके लिए काम कर रहे थे क्यांेकि उन्हें पता था कि इसके 200वें सालगिरह पर यहाॅं आयोजन होने जा रहा है। यह सरकार हिंदुत्ववादी ताकतों को बचाना चाहती है। यह लगातार हिंदुत्ववादी तत्वों, जिन्होंने भीमा कारेगाॅंव में हिंसा फैलाया, को बचाना चाहती है….। इस कार्यक्रम में कोई भी माओवादी षामिल नहीं हुआ था। दलित या प्रगतिषील राजनीतिक कार्यकर्ताओं को केवल इसलिए गिरफ्तार किया गया है क्योंकि उन्होंने इस मामले में सरकार की आलोचना की है। (हफपोस्ट में पवन दहत-समाचार दिनांकित 30.12.18)
इस केस के जाॅंच-अधिकारी तथा न्यायालय, पूर्व न्यायाधीष के उपरोक्त बयान पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं? यह चिंता का विषय है।
2) इस घटना से सम्बन्धित तथ्यों की जाॅंच की जा चुकी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है, ग्रामीण पुलिस महानिरीक्षक श्री विष्वास नागारे पाटिल के आदेष पर एक जाॅच-टीम द्वारा किया गया जाॅच है, जिसके एक सदस्य पुणे के पूर्व मेयर भी थे। इस टीम द्वारा की गई जाॅच की रिपोर्ट 20 जनवरी, 2018 को प्रस्तुत की गयी, जिसमें इस बात का खुलासा हुआ कि वास्तव में सम्भाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी ताकतों ने अंबेदरवादियों पर आक्रमण की यह योजना बनाई थी।

इस जाॅंच रिपोर्ट के अवलोकन से साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा रची गई निम्न कारगुजारियाॅं प्रकाष में आती हैंः-

1. 16 दिसम्बर, 2017 को कौस्तुभ कास्तुरे नाम के व्यक्ति ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया कि 1 जनवरी, 2018 को दंगा होगा। यह व्यक्ति सम्भाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे का समर्थक है।
2. 30 दिसम्बर, 2017 को मिलिंद एकबोटे भीमा कारेगाॅंव में एक बैठक की जिसमें 1 जनवरी, 2018 को एक काला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया और पूरे इलाके में बंद को सफल बनाने का आह्वान किया गया।
3. 29 दिसम्बर, 2017 को गोविंद महार के पवित्र स्थल को, जिन्होंने षिवाजी महाराज के पुत्र सम्भाजी महाराज के मृत अवषेष की अंतिम क्रियाकलाप करने का साहस किया था, अपवित्र किया गया। इस कारण वादु बुद्रुक तथा आस-पास के इलाकों में दंगे की स्थिति पैदा हो गयी। हाॅंलाकि सभी गाॅंववासियों ने जिम्मेदारी से काम करते हुए मामले में षांति कायम रखा। यद्यपि 30 दिसम्बर, 2017 तक वादु बुद्रुक तथा आस-पास के इलाकों में षांति व्यवस्था कायम कर ली गई थी, फिर भी सम्भाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे ने गाॅववासियों को भड़काने का काम किया।
4. 30 दिसम्बर, 2017 को सोषल मीडिया पर एक संदेष प्रसारित किया गया कि सम्भाजी भिडे ने वादु गाॅंव में एक जनवरी, 2018 को एक बैठक करेंगे, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को षिरकत करनी चाहिए।
5. 31 दिसम्बर, 2017 को प्रदीप कंद, अनिल कंद और गनेष कंद नाम के व्यक्ति होटल संचालकों को धमकी दी थी कि वे 1 जनवरी, 2018 को अपना होटल बंद रखेंगें।
6. इलाके की औरतें को पहले ही 1, जनवरी, 2018 को दंगे होने की जानकारी मिल गई थी। टंटा मुक्ति संगठन के अध्यक्ष वैभव यादव ने घटना के पहले वाली रात को ही अपने दुकान में लाठी और तलवार इकट्ठा करके रख लिया था।
7. 31 दिसम्बर, 2017 की रात को अचानक एक पत्र भीमा कारेगाॅंव के निकट पुलिस थाने में भीमा कोरगाॅव ग्राम पंचायत द्वारा दिया गया कि 1 जनवरी, 2018 को बंद का आयोजन किया जाएगा। (निहाल सिंह राठौर, 6 जनवरी, 2018)
बांबे उच्च न्यायालय पुलिस की कही गई बातों को महत्व देने से पहले उसने पुलिस से उपरोक्त रिपोर्ट की सच्चाई के बारे में क्यों नही पूछा?
3) युद्ध स्मारक के तरफ जा रहे दलित तीर्थयात्रियों पर हुए हमलों को लेकर एक सप्ताह के अंदर पुणे पुलिस द्वारा कम से कम 22 प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गयी, जिसमें अनिता सवाले का प्रथम सूचना रिपोर्ट भी षामिल है। राज्य सरकार ने पुणे कोर्ट के समक्ष कहा है कि इस मामले में कुल 1400 लोग संदेह के घेरे में हैं और इसमें करीब 1.5 करोड़ रूपये की सम्पत्ति का नुकसान हुआ है। अनिता सावले ने पुलिस के समक्ष की गई अपनी षिकायत में षिव जागर प्रतिष्ठान के अघ्यक्ष मनोहर भिडे, हिंदु जागरण समिति के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे तथा ‘सवर्ण साथीदार’ को नामित किया है। (कारवाॅं, 14 सितंबर, 2018)
जहाॅं तक मुझे पता है, किसी भी न्यायालय ने उपरोक्त प्रथम सूचना रिपोर्टों पर कार्यवाही करने के लिए पुलिस को कोई निर्देष नहीं दिया है। यह कैसी विचित्र बात है कि एकमात्र एफ.आई.आर. के आधार पर देष भर से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और गरीबों के हक में काम करने वाले कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है, जबकि उपरोक्त 22 एफ.आई.आर. के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गई है।
यह तो और भी विचित्र बात है कि न्यायालय भी इसका अभी तक कोई संज्ञान नहीं लिया है।
4) पुणे पुलिस द्वारा मेरे निवास पर 28 अगस्त, 2018 को की गई छापेमारी गैरकानूनी और अमानवीय थी। दोनों तलाषी आदेष तथा जाॅंच के संदर्भ में रिपोर्ट मराठी भाषा में था, जिसे मैं नहीं समझता हॅंू।
पुणे पुलिस द्वारा मेरे आवास पर उपरोक्त गैरकानूनी तलाषी के समय नामकुम, झारखंड थाने की पुलिस भी मौजूद थी। जब मैंने तलाषी वारंट दिखाने के लिए कहा तो पुलिस ने एक तलाषी ओदष दिखाया। यह मराठी भाषा में था जिसे मैं नहीं समझता हॅंू। तब मैं उन्हें तलाषी आदेष को हिन्दी या अंग्रेजी में अनुवाद करके देने की माॅंग की। पुणे पुलिस ने इस पर कहा कि यह संभव नहीं था क्योंकि तलाषी तुरन्त लिया जाना था। इसके बाद वे जबरदस्ती मेरे कमरे में घुस गए और तीन घंटे तक उन्होंने मेरे कमरे की हर चीज की गहन तलाषी ली। उन्होंने मेरे कम्प्यूटर, टेबलेट, कैमरा, मोबाइल और सीडी को जब्त कर लिया।
इसके बाद उन्होंने जब्त सामानों की एक रिपोर्ट तैयार की जो मराठी में था और उस पर मुझे दस्तखत करने का दबाव डाला। इस पर मैं मराठी भाषा में तैयार तलाषी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। तब मेरे वकीलों के साथ बहस-मुबाहस के बाद पुणे पुलिस ने बाद में इसका हिन्दी अनुवाद देने का वादा किया। तब मैं अपने वकीलों के सुझाव पर तलाषी रिपोर्ट पर अपना हस्ताक्षर किया। स्थानीय पुलिस द्वारा तीन दिन बाद मुझे तलाषी रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद दिया गया। इस प्रकार यह पूरी तलाषी प्रक्रिया गैरकानूनी थी।
पुणे पुलिस तलाषी रिपोर्ट की गवाह के तौर पर दो साक्षियों को पुणे से लायी थी जो कि पुनः गैरकानूनी है। तलाषी के सम्बन्ध में कानून यह है कि दो स्थानीय और सम्मानित व्यक्ति के समक्ष तलाषी लिया जाना चाहिए। लेकिन उपरोक्त तलाषी के गवाह पुणे पुलिस द्वारा पुणे से लाये गए दो व्यक्ति बने। यह कानून का घोर उल्लंघन है और मेरे साथ घोर अन्याय है।
अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने वालों के खिलाफ पूरे देष में छापेमारी की गई। लेकिन इसके लिए स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। यह पूरी तरह से गैर कानूनी था।

5) पुलिस अभिरक्षा में टार्चरः अरूण फरेरा जो इस मामले में एक अभियुक्त हैं को पुलिस अभिरक्षा में टार्चर किया गया।

‘‘अरूण फरेरा ने न्यायालय के समक्ष यह कहा कि पूछताछ के नाम पर पुलिस अभिरक्षा में उन्हें पीटा गया। उन्होंने बताया कि चार नवम्बर को लगभग चार बचे षाम को जाॅच अधिकारी षिवाजी पवार द्वारा उन्हें 8-10 घूसे मारे गये। 5 नवम्बर को उन्हें ससून हस्पताल ले जाया गया जहाॅं उनका मेडिकल परीक्षण किया गया। मेडिकल परीक्षण में उनके आॅंख के पास चोट के निषान पाये गए।श् (सुष्मिता, सबरंग न्यूज, दिनांकित 6 नवम्बर, 2018)।
यह मानवाधिकार उल्लंघन का एक गंभीर मामला है। अभी पिछले ही साल जब संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाधिकार परिषद दुनियाॅ के देषों को टार्चर के विरूद्ध समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए अभियान चलाया था तो भारत के प्रतिनिधि ने बड़े जोर-षोर से कहा था कि ‘‘टार्चर का विचार भारत के लिए पूरी तरह पराया है!’’ इस आधार पर भारत ने इस पर अपना हस्ताक्षर नहीं किया। जबकि यह सभी जानते हैं कि भारत में कैदियों से संस्वीकृति के लिए पुलिस उनका टार्चर करती है। यहाॅं तक कि ऐसे महत्वपूर्ण लोग भी जो अपना पूरा जीवन कमजोर और उत्पीड़ित समुदाय की भलाई के लिए काम करने में खपाया है उन्हें भी टार्चर का सामना करना होता है। यह सर्वोच्च न्यायालय का भी उल्लंघन है जिसका निर्देष है कि ‘‘अभिरक्षा में उत्पीड़न मानवीय गरिमा के खिलाफ है। इससे व्यक्ति केे आत्म-सम्मान को चोट पहॅंुचती है और इससे उसका व्यक्तित्व घायल होता है।’’ (डी.के.बसु केस)
लेकिन यह कम विचित्र बात नहीं है कि पुणे जिला न्यायालय ने उसके समक्ष पीड़ित द्वारा यह बताये जाने पर कि उसे अभिरक्षा में टार्चर किया गया है, न्यायालय ने इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही या जाॅंच का आदेष नहीं दिया। मानवाधिकार के इस घोर उल्लंघन पर न्यायालय की चुप्पी सबसे ज्यादा कष्टदायक बात है।

मैंने उपरोक्त परिस्थितियों पर पूरी गहनता से विचार किया हॅंू और इसके लिए चिंतित हॅंू। कई प्रशनों को उठाया हॅंू। उम्मीद है कि इनका जवाब मिलेगा।
(इस अपील को गणतंत्र दिवस के अवसर पर जारी किया जा रहा है जिस दिन भारत ने समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक देष बनने का संकल्प लिया था।)

**