|| कब्र को किस तरह कहेगा घर ||

एलन कुर्दी से कोई पूछेगा घर कहाँ है
भूख से बिलबिलाते हुए उठेगा
और एक विस्फोट हो जाएगा
उसके हृदय में

अपनी मासूमियत के चिथड़ों को समेटते हुए
वह बनाएगा घर
जिसमें भरी होगी बारूद की दुर्गंध

वह किसी को नहीं बता पाएगा
अपने घर का पता
जिसमें दफ्न हैं
माँ-पिता-भाई-बहन और न जाने कितने उसके अपने

भला कब्र को
किस तरह से कहेगा वह अपना घर

सत्ता और आतातायियों के दुःस्वप्न से घिरा
एक मासूम बच्चा
फिर सो जाएगा हमेशा के लिए।

(सीरिया संकट के बाद समुद्र के किनारे रेत में पड़ा मिला एक बच्चा जिसका नाम एलन कुर्दी है, उसका फोटो मीडिया में बहु प्रचारित है)

|| यही करता रहा है हर बार ||

मैं एक रचनाकार
मेरे पास सिर्फ मेरा वजूद
जिसमें शामिल सब मेरे अपने
मेरे अपने मेरी ताकत

तुम एक राजनीतिज्ञ
तुम्हारा लक्ष्य सिंहासन
सिंहासन को चाहिए प्रजा
प्रजा यानि मैं और मेरे अपने

तुमने एक चमक भर दिया मेरे वजूद में
इस चमक में चौंधियाया फिरता रहा मैं
देश-गांव-जवार
और तुम्हारे कोड़ों से छिलती रही
मेरे अपनों की पीठ

अपनों का दर्द
अपनों तक पहुँचता ही है
सो बिलबिलाने लगा मैं
अपनों के दर्द से
देखा मेरे वजूद में भरी हुई तुम्हारी चमक
दुम की तरह उग रही थी मेरे पीछे

इससे पहले कि दुम उग जाए
और हिलाने की आदत पड़ जाए
मैं अपने इस चमकदार वजूद को लौटा रहा हूँ
स्वतंत्र हो रहा हूँ
दुम की संस्कृति से

मेरी स्वतंत्रता
मनुष्ता से भरे समाज में
लौटना है

जहां खड़ा होकर चिल्लाउंगा
नहीं…बस अब और नहीं
और भर भरा कर ढह जायेंगे
तुम्हारे सिंहासन और राजमहल

तुम दूरबीन लेकर खोजते फिरोगे दुम
और वे मुट्ठियों की शक्ल में तने होंगे
तुम्हारे खिलाफ़

बौखला जाओगे तुम
छोड़ दोगे मुझ पर अपने कुत्ते
शताब्दियों से यही करते आए हो

नोंचा-खसोटा जाता रहूँगा
और लौटाता रहूँगा सारे सम्मान और पुरस्कार
जिनपर तुम्हारी सत्ता की मुहर है

सावधान शहंशाह
मैं लौटा रहा हूँ
वह सब कुछ जो तुमको सुरक्षित करता है

उम्मीद को फांसी के फंदे से
बचाकर रख दिया है
शब्दों के बंकर में
भावों की खोह बनाकर
जिसकी पहरेदारी कर रही है संवेदना

रचनाकार
यही करता रहा है हर बार ।

|| एक जनवरी की आधी रात को ||

एक ने
जूठन फेंकने से पहले
केक के बचे हुए टुकड़े को
सम्भालकर रख लिया किनारे

दूसरा जो दारू के गिलास धो रहा था
खगांल का पहला पानी अलग बोतल में
इकट्ठा कर रहा था

तीसरे ने
नववर्ष की पार्टी की तैयारी करते समय
कुछ मोमबत्तिायाँ और पटाख़े
अपने ज़ेब के हवाले कर लिए थे

तीनों ने एक जनवरी की आधी रात को

पटाख़े इस तरह फोड़ें
जैसे लोगों ने कल जो मनाया
वह झूठ था
आज है असली नववर्ष

दारू के धोवन से भरी बोतलों का
ढक्कन यूँ खोला
जैसे शेम्पेन की बोतलों के ओपेनर
उनकी ज़ेबों में ही रहते हैं

जूठे केक के टुकड़े खाते हुए
एक दूसरे को दी
नववर्ष की शुभकामनाएँ

पीढिय़ों से वे सारे त्यौहार
इसी तरह मनाते आ रहे हैं
कलैण्डर और पंचाँग की तारीख़ों को
चुनौती देते हुए।

|| बम विस्फोट ||

जले हुए मांस की बदबू से
उबकाई आ रही है
एक भी शरीर नहीं है सलामत
हाथ-पाँव बिखरे हुए हैं चारो तरफ़
सन्नाटा की सांय-सांय में
दर्द और भय की चीख़ गूँज रही है
अभी-अभी हुआ है
यहाँ पर बम विस्फोट

कितने लोग मारे गए
किसी को पता नहीं
दूरदर्शन से सरकार तक
सबके आकड़े अलग-अलग

बम विस्फोट के बाद सदियों तक
लोग मरते रहते हैं
ऐसे में सही आकड़ों की उम्मीद झूठी है

इस विस्फोट के ठीक पहले
सामने की दुकान पर खड़े युवक ने
अपनी प्रेमिका को आइसक्रीम थमाते हुए
कहा था – अब शादी कर लेते हैं
शादी का जोड़ा चिथड़े में बदल गया

एक माँ सड़क की तरफ़ भागते अपने तीन बरस के बच्चे को
पकड़ने के लिए लपकी ही थी कि हुआ धमाका
न जाने कहां उड़ गयी माँ और बच्चे का अता-पता नहीं
पिचके हुए टीन के डब्बे के पास पड़ा है
बच्चे की तरफ बढ़ा माँ का हाथ

उस लड़की की आवाज़ घुट गयी हमेशा के लिए
विस्फोट की जद में घुसने ही वाली थी

लाल बत्ती और सायरन के आतंक में
विस्फोट की भयावहता बढ़ती जा रही है

सरकारी अमला लगा है
सबूत जुटाने में
और सबूत नष्ट करने में भी

पूरे देश के दूरदर्शन चैनलों पर हाहाकार मचा है
विस्फोट का आकलन हो रहा है
कहीं कोई सत्य नहीं है

सत्य सिर्फ इतना कि
विस्फोट के मुहावरे में चिथड़े बचते हैं
जिनका आकलन कभी नहीं हो सकता

चिथड़ों पर किसी भी करीगर की
तुरपाई काम नहीं आती
एक बार चिथड़ा हो गया तो हमेशा ही चिथड़ा

विस्फोट के बाद हमेशा के लिए
चिथड़ें में बदल जाती हैं जगहें।

*|| अपनी अकर्मण्य दुनिया में ||

हफ़्ता देने के लिए पैसे नहीं हैं
पिट रहा है ठेलेवाला
अंदर तक तमतमा गया मैं

पुलिसवाले का कॉलर पकड़कर
उसी के डण्डे से पीटते हुए उसे
मन ही मन समझाया
वर्दी की जिम्मेदारी

कर्मण्यता की इस सुन्दर कल्पना से बाहर आते ही
पुलिसवाले से नज़र बचाते हुए
निकल गया किनारा कसते

कोसता रहता हूँ अपने आप को
क्यों नहीं बदल पाया
अपनी कल्पना को यथार्थ में

बस में खड़ी लड़की को बार-बार धकियाते और
उसके अंगों पर हाथ फेरनेवाले गुण्डे लड़के को
लगाना चाहता हूँ एक झन्नाटेदार झापड़
कसमसाता हूँ मन ही मन
बहुत हिम्मत जुटाकर सिर्फ इतना कह पाया
भाई साहब ठीक से खड़े रहिए

आग बरसाती आंखें गड़ाकर मुझ पर
गालियों की झड़ी लगा देता है वह
लड़की और भी सहम जाती है

अपनी इस कमजोरी पर तरस खाते हुए
करवट बदलता रहता हूँ
रात भर

कानफाड़ू शोर की तरह गाना बजाते हुए
लहराती हुई गाड़ी पर सवार बदमाशों का झुण्ड
गुज़र रहा है पास से
रोककर उनसे कहना चाहता हूँ
जिन पैसों पर ऐश कर रहे हो तुम
उनमें तुम्हारे पसीने की गंध नहीं है
तुम्हारी आंखों में उतरा हुआ लाल नशा
मौत का नशा है
हाथ उठाता हूँ उनको रोकने के लिए
और टाटा कर देता हूँ
दुबक जाता हूँ सड़क किनारे

उनका शोर गूँजता रहता है कानों में
बेचैन होकर टहलता हूँ कुछ देर तक
और घर आकर सो जाता हूँ
दोनों कानों पर हाथ रखकर

अच्छे दिनों की घोषणा करनेवालों के माइक को पकड़ कर
जोर से चिल्लाना चाहता हूँ
देशवासियों यह हमारे समय का सबसे बड़ा झूठ है

स्वांग की तरह लगती है
मेरी यह उत्तेजना
मन ही मन स्वीकार कर लेता हूँ
इस माइक को पकड़ने का अधिकार
मुझे नहीं
चैनल बदलकर देखने लग जाता हूँ
कमेडी शो

एक भयानक अट्टाहास
मेरा मजाक उड़ाता रहता है निरंतर
जिसको टाल कर
शुतुरमुर्ग की तरह दौड़ता रहता हूँ
अपनी अकर्मण्य दुनिया में
जहाँ ग्लानि, असमर्थता और स्वार्थ के कीड़े बज-बजा रहे हैं
और खून का लोहा पानी में बदल रहा है।

|| प्रेम की भट्टी ||

लोहे से बनती है मशीन
और मनुष्य भी

नसों का जटिल तंत्र
जुड़ता है दिल से
जिसके धड़कने से बहता है
नसों में लोहा
रक्त कर्णिकाओं पर सवार लोहा
मनुष्य के पूरे शरीर में दौड़ता रहता है

जब तक दौड़ता रहता है लोहा
चलता रहता है मनुष्य मशीन की तरह

मनुष्य मशीन की तरह
ठोस और कठोर नहीं होता कभी भी

मशीन की तरह चलते हुए मनुष्य में
प्रेम की भट्टी जलती रहती है
जो लोहे को बदलती रहती द्रव्य में

जिस दिन बुझ जाती यह भट्टी
मनुष्य मशीन में बदल जाता है
ठोस और कठोर ।

*|| वही सब कुछ, वही ईश्वर ||*

एक समय मे
सच, सच होता था
और झूठ, झूठ

फिर झूठ, सच में घुल गया
और सच, झूठ में

सच-झूठ घुल-मिल कर
शाश्वत में बदल गए
शाश्वत बहुत चमकदार था
इतना चमकदार कि उसके सामने
सूरज बुझता हुआ अंगारा

खूब सत्संग हुए
रचे गए शोधग्रंथ
विशेषज्ञों ने घोषणा कर दी
इतना चमकदार तो सिर्फ ईश्वर ही हो सकता है

शाश्वत ईश्वर हैं
ईश्वर सनातन है

दूसरे समय में
ज्ञान की पराकाष्ठा ने करवट बदली
चेतना प्रज्वलित हुई
शाश्वत कुछ नहीं होता है
कुछ नहीं होना
ईश्वर होना है
ईश्वर होना ही
सनातन होना है

तीसरे समय में
सनातन घण्टे की तरह बज रहा है
सब तरफ जय-जयकार का शोर है
शोर के आवरण में छुपी है
तर्कहीन आस्था

परम स्वार्थ का पर्याय
कृपा का झीना पर्दा
या परम शून्य
क्या है आस्था

मौन, मौन ही श्रेष्ठ उत्तर
मौन यानि कुछ नहीं
जो कुछ नहीं
वही सब कुछ
वही ईश्वर ।

० प्रदीप मिश्र
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० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले