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पुस्तक मेला अभी खत्म हुआ है। किताबों की तिलिस्मी दुनिया अब मेले से निकलकर हमारे साथ हमारे घरों में आ गई है। ढेर सारी नई किताबें अपने पढ़े जाने की प्रतीक्षा में हैं। आइये आज अनुवाद में किताबों के ही विषय में कुछ मराठी से अनूदित कविताएँ पढ़ते हैं। इन्हें हमने *समालोचन ब्लाग* से लिया है और अनुवाद स्वयं कवि का है.

|| प्रफुल्ल शिलेदार की कविताएँ ||                                               

लेखक की आत्मकथा से किताबों के बारे में कुछ टिप्पणियाँ

1

किताबें
मुझे ढूंढती चली आती हैं      
भीतर से आस रहती है उन्हें
मुझ से मिलने की

पुराने दोस्त की तरह
मुझे ढूंढने की 
बहुत कोशिश करती रहती हैं
किसी पल आखिरकार मेरा पता पाकर
सामने आकर ख़ड़ी होकर
इत्मिनान से ताकती रहती हैं

मै उन्हें कब पढूंगा
इसकी राह देखती हैं
उन्हें पढ़े जाने की
कोई जल्दी नहीं होती

कभी कभार मैं 
हैरानी  से
उनकी ओर देखता हूँ
बस यही काफी होता है उनके लिए  

हाथ में लेता हूँ
तो दिल धड़कने लगता है किताबों का
आँखों में चमक सी छा जाती है

पढ़ने लगता हूँ तो
साँसे थाम लेती हैं
मेरी एकाग्रता
भंग होने नहीं देतीं

आधा पढ़कर रख देता हूँ
फिर भी मायूस न होकर
मैं उन्हें फिर से कब उठा लूँगा
इस की राह देखती हैं

पूरी पढ़ी जाने के बाद  
किताबें थक जाती हैं
भीतर ही भीतर सिमटकर
सोचती रहती हैं
मुझ पर
क्या असर हुआ होगा

2

जैसे भेस बदलना
बस वैसे ही
भाषा बदल कर
किताबें
दुनियाभर की सैर करती रहती हैं

कई सारी लिपियों के अक्षर
अपने बदन पर
गोदती हैं

सारी सीमाएं लाँघ कर
हवा के झोंके जैसी
मस्ती में  
चारों ओर घूमती रहती हैं

3

किताबों का
अपना रूप होता है
बंद आँखों से भी
छूने के बाद
उसका अहसास होता है

गंध होती है
उनके आने से पहले
वह महकती चली आती है

मुखपृष्ठ के मुखौटे
चेहरे पर रख कर
किताबें आया करती हैं
हर पन्ने का दरवाजा
खुला रखती हैं

कहीं से भी
किताबों में
प्रवेश किया जा सकता है 

4

पहली बार हाथ में आयी
नयी किताब
बाद में घुल मिल जाती है
इस हाथ से उस हाथ में
घूमते भटकते
छीजती जाती है

पहले तो
उसके शुरुआत के पन्ने
गल जाते हैं
बाद में
आखिरी पन्ने झड जाते हैं
और अंत में
तो वह किताब ही
कहीं गुम हो जाती है

नई पुस्तक खरीदने के बावजूद
उस प्रति की यादें
मन से हटती नहीं

किताबें बूढ़ी होती जाती हैं
डंठल से उनके पत्ते
छूटने लगते हैं

तब उन्हें
नर्मदिली से
उठाकर रखना पड़ता है
बूढ़े बाप जैसा
सम्हालना पड़ता है

5

आंखे मूंदकर
किसी किताब की
मन में इच्छा धरना

और आंखे खोलने के बाद
तुरंत उस किताब का
आँखों के सामने होना

ऐसा तो आजकल कई बार होते रहता है
लेकिन पहले किताबें
सिर्फ दुर्लभ ही नहीं
कीमती जवाहिरों जैसी होती थीं

अभी अभी चार शताब्दियाँ पहले
होमिलीज की एक प्रति खरीदने के किये
दो सौ बकरियां और दो बोरे अनाज
देने पड़ते थे

किताबों को पास में रखना
किसी ऐरे गैरे का
काम नहीं था

उधर किताबें
सरदार उमराव
रईसों अमीरों के पास
या फिर किसी मठ में या
पीठ में होती थीं

और इधर तो 
सर पर पक्की चोटी बांधकर
वज्रासन में बैठती थीं

बहुत करीब जाने पर
बदले में सीधे अंगूठा काटकर
मांगती थीं

6

किताबें
लिखी जा रही हैं
सदियों से
कौन जाने कब से
ये छपती जा  रही हैं

नौवी सदी में
वांग चे की छापी हुई किताब
अब भी है ब्रिटिश म्यूजियम में

पंद्रहवी सदी का ग्युटेनबर्ग बाइबल
मैंने अपनी आँखों से देखा है
एलिज़ाबेथियन मेज पर
बंद कांच की संदूक में रखा हुआ
लायब्ररी ऑफ़ कांग्रेस में

मृग शावक की
या पशु भ्रूण की
कोमल महीन चमड़ी को
गुलाबी जामुनी पीले नीले हरे
रंग से सिझाकर बने वत्स पत्रों पर
लिखीं गईं किताबों को
दूसरे हेनरी की रॉयल लाइब्ररी से
लाइब्ररी ऑफ़ पेरिस में
देखकर हैरान हो गया

7

किताबें
लिखी गई
कपडे पर
पेड़ की छाल पर
रेशमी वस्त्रों पर
सींगों पर
सीप पर
चावल के दाने पर

गोद ली पूरे बदन पर
खरोंच दी
कारागार की दीवारों पर

पांच सहस्राब्दियां पहले
अपौरुषेय पुस्तके
आवाज के खम्बों ने थामें
बरामदे में रहती थीं
वैशम्पायन की अंजुली से
याज्ञवल्क्य  के हाथों में
नवजात बालक की तरह
सौपी गईं

किताबें सीसें की थीं
पक्की भुनी हुई ईटों की थीं
नाइल के किनारे पाए जानेवाले
पपायरस पर भी
लिखी गईं किताबें 

पपायरस न मिलने पर
चर्मपटों पर
लिखी गईं किताबें

काल के
किसी भी ज्ञात कोने में
कोई किताब
मिल ही जाती है
असल में
किसी किताब के कारण ही
वह कोना
उजाला हुआ होता है 

8

डर जितना आदिम है
उतनी ही आदिम होगी
किताबें

आग पर
काबू पाने का आनंद
इन्सान ने
लिख कर ही
अभिव्यक्त किया होगा

पत्थर से पत्थर पर  
आग ही नहीं
संकेत चिन्ह भी
बनाये जा सकते हैं
इस बात का पता
उसे उसी वक्त लगा होगा

9

किताबें
पहली बार
धर्मग्रंथों के रूप में आईं
क्या इसीलिए
किताबों के बारे मे अभी भी
मन में इतना सम्मान है

सभी पवित्र कथन
किताबों से आये हैं
पर सभी किताबें
उन वचनों जैसी
पवित्र नहीं होतीं

धर्म के
विचारों के
इंसानियत के भी
खिलाफ होने का विष
उनमे उबलता दिखता है
तब किताबे
परायी सी लगती है

10

किताबें

अचानक

कगार तक

धकेलती जाती हैं

चाकू से भी

नुकीली होती हैं

ठन्डे दिमाग से

दिमाग फिरा देती है

फसाद में

पत्थर लाठी सांकल सलाखें

बन जाती हैं

छुरामारी में

चाकू का काम करती हैं

दंगे में

पत्थर की पाटी होकर

रस्ते में

गिरे हुए के  

सिर को

कीचड़ में बदल देती हैं

जलाने में

पलीता

या पेट्रोल बम

हो जाती हैं

चारमिनार की छाँव में

भरी राह में

बदन पर

तेजी से चलने वाले वार

बन जाती हैं

एके फोर्टी सेवेन से

हर मिनट को

छह सौ राउंड की गति से

छाती में दागी जाने वाली

आस्तिक गोलियां बन जाती हैं

दिन दहाड़े

बाजार में पकड़कर

सिर पर टिका

पिस्तौल हो जाती हैं

बीच रात

घर के सामने इकठ्ठा भीड़  से

पत्थर बन कर

सरसराते हुए फेंकी जाती हैं

आधी रात

फोन पर धमकियाँ देती हैं

रंगमंच उछाल देने वाला

दीवानगी भरा प्रेक्षागार बन जाती हैं.

**

कवि एवं अनुवादक : *प्रफुल्ल शिलेदार*

साभार समालोचन से

⭕ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा*

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