शहीद रोहित वेमुला (1986 -2016) ………  आज उनकी 3री बरसी है : ज़ुलैख़ा जबीं

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अपनी आख़िरी सांस लेने से पहले रोहित ने हम सब (जो ज़िंदा हैं) के नाम एक ख़त लिखा था- जिसमें उन्होंने अपने प्यार, चाहत, मिशन और कम्पेशन को हम सबके साथ साझा किया था. बेशक उन्होंने अपनी मौत की ज़िम्मेदार किसी पे नहीं डाली है – लेकिन एक PHD करता हुआ ग़रीब (दलित) छात्र सात महीने पहले से रोक दी गई अपनी फ़ेलोशिप (1,75000 लाख) की रक़म दिलाने की हमसे गुज़ारिश करता है और ये भी कि “रामजी” (जिनका रोहित क़र्ज़दार था ) को 40 हज़ार रु लौटाने का हुक्म अपने क़रीबियों को दे जाता है. उस रोहित वेमुला का वो पहला और आख़िरी ख़त हम सभी को पुरे ध्यान से, ठहर- ठहर कर पढ़ना चाहिए। ख़त की लिखावट के पीछे की सच्चाई को ढूँढना और बाहर लाना होगा।

हमें जानना होगा ख़ूबसूरत ज़हनोदिल के मालिक, सितारों से बातें करने वाले, क़ुदरत और उसके हर जीव से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले, बेहतर दुनियां गढ़ने का ख़ाब बुनने वाले उस सांवले सलोने रोहित वेमुला को. हमें पहचानना होगा तालीम के उच्च संस्थानों पे क़ाबिज़, ब्राह्मण ठेकेदारों ( जो सीधे सीधे रोहित के क़ातिल भी हैं) और मुल्क की बर्बर वर्णवादी व्यवस्था के मठाधीशों को जिन्होंने हमारी आने वाली नस्लों को गुलामी की ज़ंजीरों में जकड देने की सुपारी उठायी है……अपने बहादुर शहीद रोहित को सलाम करते पढ़ते हैं उनका वो ख़त जो हम सबके नाम है —

गुड मॉर्निंग,

आप जब ये पत्र पढ़ रहे होंगे तब मैं नहीं होऊंगा. मुझ पर नाराज मत होना. मैं जानता हूं कि आप में से कई लोगों को मेरी परवाह थी, आप लोग मुझसे प्यार करते थे और आपने मेरा बहुत ख्याल भी रखा. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. मुझे हमेशा से खुद से ही समस्या रही है. मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच की खाई को बढ़ता हुआ महसूस करता रहा हूं. मैं एक दानव बन गया हूं. और मैं अतिक्रूर हो चला.
मैं तो हमेशा लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सेगन की तरह और अंततः मैं सिर्फ यह एक पत्र लिख पा रहा हूं… मैंने विज्ञान, तारों और प्रकृति से प्रेम किया, फिर मैंने लोगों को चाहा, यह जाने बगैर कि लोग जाने कब से प्रकृति से दूर हो चुके. हमारी अनुभूतियां नकली हो गई हैं हमारे प्रेम में बनावट है. हमारे विश्वासों में दुराग्रह है. इस घड़ी मैं आहत नहीं हूं, दुखी भी नहीं, बस अपने आपसे बेखबर हूं.

एक इंसान की कीमत, उसकी पहचान एक वोट… एक संख्या… एक वस्तु तक सिमट कर रह गई है. कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में, जीने में, कभी भी एक व्यक्‍ति को उसकी बुद्धिमत्ता से नहीं आंका गया. इस तरह का खत मैं पहली दफा लिख रहा हूं. आखिरी खत लिखने का यह मेरा पहला अनुभव है. अगर यह कदम सार्थक न हो पाए तो मुझे माफ कीजिएगा.

हो सकता है इस दुनिया, प्यार, दर्द, जिंदगी और मौत को समझ पाने में, मैं गलत था. कोई जल्दी नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता था. एक जिंदगी शुरू करने की हड़बड़ी में था. इसी क्षण में, कुछ लोगों के लिए जिंदगी अभिशाप है. मेरा जन्म मेरे लिए एक घातक हादसा है. अपने बचपन के अकेलेपन से मैं कभी उबर नहीं सका. अतीत का एक क्षुद्र बच्चा.
इस वक्त मैं आहत नहीं हूं… दुखी नहीं हूं, मैं बस खाली हो गया हूं. अपने लिए भी बेपरवाह. यह दुखद है और इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं. लोग मुझे कायर कह सकते हैं और जब मैं चला जाऊंगा तो स्वार्थी, या मूर्ख भी समझ सकते हैं. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे क्या कहा जा रहा है. मैं मौत के बाद की कहानियों, भूतों या आत्माओं पर विश्वास नहीं करता. अगर किसी बात पर मैं विश्वास करता हूं तो वह यह है कि मैं अब सितारों तक का सफर कर सकता हूं. और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूं.

जो भी इस खत को पढ़ रहे हैं, अगर आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, तो मुझे सात महीने की फेलोशिप‌ मिलनी बाकी है जो एक लाख और 75 हजार रुपये है, कृपया ये कोशिश करें कि वह मेरे परिवार को मिल जाए. मुझे 40 हजार रुपये के करीब रामजी को देना है. उसने कभी इन पैसों को मुझसे नहीं मांगा, मगर कृपा करके ये पैसे उसे दे दिए जाएं.

मेरी अंतिम यात्रा को शांतिपूर्ण और सहज रहने दें. ऐसा व्यवहार करें कि लगे जैसे मैं आया और चला गया. मेरे लिए आंसू न बहाएं. यह समझ लें कि जिंदा रहने की बजाय मैं मरने से खुश हूं.

परछाइयों से सितारों तक’

उमा अन्ना, मुझे माफ कीजिएगा कि ऐसा करने के लिए मैं आपके कमरे का इस्तेमाल कर रहा हूं.
एएसए (आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन) परिवार के लिए, माफ करना मैं आप सबको निराश कर रहा हूं. आपने मुझे बेहद प्यार किया. मैं उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहा हूं.
आखिर बार के लिए.

जय भीम

मैं औपचारिकताएं पूरी करना भूल गया. मेरी खुदकुशी के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है. किसी ने ऐसा करने के लिए मुझे उकसाया नहीं, न तो अपने शब्दों से और न ही अपने काम से.

यह मेरा फैसला है और मैं अकेला व्यक्ति हूं, जो इस सबके लिए जिम्मेदार है. कृपया मेरे जाने के बाद, इसके लिए मेरे मित्रों और शत्रुओं को परेशान न किया जाए”.

ख़याल रहे रोहित वेमुला को अभीतक इंसाफ़ नहीं मिला है और ये भी के अपने ख़त के ज़रिए रोहित बतौर नागरिक, भारतीय (लोकतंत्र) राजनीति की तरफ़ जो इशारा करते हैं वो ग़ैर ज़रूरी भी नहीं है.और ये भी के दलित दमित ग़रीब अल्पसंख्यक वंचित तबक़े नागरिक नहीं, (इंसान तो बिल्कुल नहीं) हाड़मांस के सिर्फ़ वोट बैंक हैं-मारक नज़रिया है.
रोहित वेमुला डा अंबेडकर को आदर्श मानकर उनके ख़ाबों की दुनिया बनाने की कोशिश में लगे थे. इसीलिए ग़लत को ग़लत कहकर विरोध करने का जिगर भी रखते थे. भगतसिंह की तरह उन्होंने अपनी मौत का चुनाव किया. ख़ुद ही फंदा बनाया और….!!शायद उनकी मंशा रही हो, भारत के युवा आंदोलित,संगठित होकर देश और समाज बदलने को अग्रसर हों उठेंगे. लेकिन बर्बर जातिवादी वर्न आधारित भारत में ऐसे मासूम जज़्बातों के लिए कोई जगह नहीं है…..
लेकिन फ़िर भी रोहित वेमुला “क्रांति बीज” सींच गए हैं… फ़सल तो लहलहाएगी ही….

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