सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण :  संजीव खुदशाह

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17.01.2019

जब से सवर्णों को 10% आरक्षण का मामला आगे बढ़ा है और जल्दबाजी में संविधान संशोधन और आरक्षण का बिल पास किया गया, यह घटना हैरान करने वाली है। समझ नहीं पा रहा हूं कि इस लेख की शुरुआत कहां से करूं। बहुत सारे लोग इस घटना से प्रतिक्रिया विहीन हो गए हैं। कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे हो गया। राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरी हो सकती है। इस बिल को समर्थन देने के लिए। लेकिन बहुत सारे प्रश्न इस बिल के साथ में खड़े हो रहे हैं। सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या भाजपा को सवर्ण आरक्षण बिल से फायदा मिलेगा? जिस मकसद से भाजपा ने आरक्षण बिल को आनन-फानन पास करवाया है।

यह तो तय है कि आरक्षण बिल सवर्णों को मिले या ना मिले। सवर्ण हमेशा से भाजपा का वोटर रहा है। 10% बिल के बाद भी वह भाजपा का सपोर्टर रहेगा उसका वोटर भी रहेगा। इससे भाजपा को बहुत ज्यादा लाभ होते हुए नहीं दिख रहा है।
हां यह बात तय है कि गैर सवर्णों से भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है। क्योंकि यदि 12 से 15% स्वर्ण भारत में हैं। तो 85% जनता इस बिल के कारण या तो आहत है या फिर विरोध में है।
आइए हम 10% आरक्षण बिल के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हैं।

संविधान के मुताबिक आरक्षण क्या है?

मैं बता दूं कि आरक्षण जो संविधान की मंशा के अनुरूप एससी एसटी और ओबीसी को दिया गया था। इसका जन्म दरअसल आजादी के पहले मिले हुए कम्युनल अवॉर्ड से हुआ.

उसके बाद पूना पैक्ट में पारित कंडिकाओं के अनुरूप संविधान में आरक्षण शामिल किया गया। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में अछूत जातियों में प्रतिनिधित्व के सवाल को लेकर मुद्दा उठाया गया था। जिसे स्वीकार करते हुए कम्युनल अवार्ड की घोषणा की गई और जिस पर गांधी का अनशन फिर पूना पैक्ट और इसके बाद संविधान में आरक्षण की धाराएं जोड़ी गई।

आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम कभी भी नहीं रहा है।

बता दू इन सारे पहलू में आरक्षण कहीं पर भी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। यह दरअसल छोटी-छोटी पिछड़ी सामाजिक रूप से दलित पतित जातियों को विभिन्न सरकारी पदों में हिस्सेदारी या प्रतिनिधित्व के रूप में जोड़े जाने का प्रयास था। ताकि उन्हें मुख्यधारा मे लाया जा सके.

आरक्षण के बारे में संविधान का मत निम्नलिखित है.

1 आरक्षण एक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है।
2 आरक्षण सामाजिक प्रतिनिधित्व पर आधारित है।
3 संविधान में आरक्षण पूना पैक्ट के समझौते के अनुसार दिया गया है।
4 आरक्षण धर्म ग्रंथों के अनुसार दमित छुआछूत के शिकार हुए लोग और समाज के हाशिए के लोगों को दिया गया जिन्हें कभी भी किसी प्रकार का कोई सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं था।

डॉ अंबेडकर ने प्रतिनिधित्व के सवाल को लेकर बात रखी थी उनका कहना था कि 10 से 12% सवर्णों का 90% संसाधनों में कब्जा है वे तमाम सरकारी विभागों में चाहे न्यायपालिका हो चाहे मंत्रालय हो चाहे कर्मचारी हो तमाम जगह वही हैं और दलित आदिवासी पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व इन क्षेत्रों में बहुत ही कम है। दरअसल इसलिए आरक्षण की व्यवस्था का उन्होंने प्रावधान रखा था। आजादी के बाद से 49.5 परसेंट आरक्षण दिए जाने के बावजूद सवर्ण जो ऊंचे पदों में विराजमान हैं उन्होंने किसी ना किसी प्रकार से इस आरक्षण को लागू होने नहीं दिया। आइए जानते हैं कि वह किस प्रकार इस आरक्षण को शत प्रतिशत लागू होने से रोके रहे हैं।
1 आरक्षण का रोस्टर बनाने में गड़बड़ी रोस्टर छोटे संख्या में बनाया गया है या विभाग बार या विभाग के बजाय उपविभाग बार बनाया गया ताकि रक्षित पदों की संख्या कम होती जाए।
2 तमाम यूनिवर्सिटी से लेकर के बड़े पदों में योग्य उम्मीदवार नहीं है कहकर पद को खाली रखा गया या फिर सवर्णों के द्वारा भर दिया गया जो कि पूरी तरीके से गैरकानूनी है प्रतिनिधित्व के सवाल में योग्यता कोई मायने नहीं रखता है।
3 बैकलॉग को जानबूझकर नहीं भरा गया या उसकी भर्तियां नहीं निकाली गई ताकि कोई आरक्षित वर्ग का व्यक्ति पदस्थ ना हो पाए।
4 आरक्षण जनसंख्या के अनुपात में दिया जाना था। एससी और एसटी को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया गया लेकिन मनुवादी मानसिकता के जजों ने इसे 50% पर रोक दिया। जबकि नियमानुसार ओबीसी को 52% आरक्षण मिलना चाहिए था लेकिन उन्हें 27% ही आरक्षण दिया गया यह आरक्षण प्रतिशत संविधान की भावना के विपरीत था।
5 इलाहाबाद के हाईकोर्ट ने तो जनरल कैटेगरी में आरक्षित वर्गों का प्रवेश ही रोक दिया यानी यानी 12% सवर्णों के लिए 50% सीट आरक्षित कर दिया।

6 जाति प्रमाण पत्र में रोड़े लगाए गए संविधान की भावना के विपरीत जाति प्रमाण पत्र को बेहद कठिन बना दिया गया। sc/st जाति प्रमाण पत्र के लिए 1950 के पूर्व के दस्तावेज मांगे जा रहे है, जबकि एक सफाई कामगार एक बहुत ही दलित व्यक्ति के लिए पुराने दस्तावेज उपलब्ध कराना बहुत ही मुश्किल है। इसीलिए वह जाति प्रमाण पत्र नहीं बना पाता है। इस प्रकार करीब 50% दलितों को आरक्षण से महरूम रखा गया है।

10% सवर्ण आरक्षण देने का मकसद क्या हो सकता है?

यह प्रचारित किया जा रहा है कि राजनीतिक मकसद से 10% सवर्णों को आरक्षण दिया गया ताकि एट्रोसिटी एक्ट लागू करने पर नाराज हुए सवर्णों को खुश किया जा सके। लेकिन इसके कई पहलू भी हैं यह खुले तौर पर संविधान संशोधन करने के लिए उनकी जो मंशा रही है उस का यह प्रयोग भी है। कि वह किस प्रकार से संविधान की मूल भावनाओं के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। यदि यह प्रयोग सफल होता है और दोबारा भाजपा सत्ता में आती है तो पूरे संविधान को बदला जा सकता है।
सवर्णों को 10% आरक्षण देना यानी जनरल केटेगरी जिसमें एससी एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक भी भाग्य आज़मा सकते हैं। उसमें से यानी 50 परसेंट से दस परसेंट कम करके 40 परसेंट कर देना है।

आज आप देख सकते हैं कि कोई भी सवर्ण मैला उठाने के लिए सीवर लाइन में नहीं उतरता है ना ही रिक्शा चलाता हुआ दिखता है। ना ही पशुओं के चमड़े उतारने का घिनौना काम करता है। सामाजिक रूप से शोषित और पीड़ित भी नहीं है। सवर्णों का सम्मान कभी भी गरीबी के कारण कम नहीं हुआ है ना ही उनका कभी सामाजिक शोषण हुआ है।

यदि प्रतिनिधित्व के सवाल को लेकर भी देखा जाए तो वे अपने प्रतिशत के अनुपात में कई गुना ज्यादा प्रतिनिधित्व विभिन्न क्षेत्रों में रखता है। ऐसी स्थिति में सवर्णों को 10% आरक्षण देने का मतलब होता है कि वास्तविक दबे कुचले पिछड़े लोगों को और शोषण गुलामी की कगार में लाकर खड़ा कर देना। खासकर ऐसे वक्त जब किसी ना किसी प्रकार से दलितों पिछड़ों के आरक्षण को कमजोर किया जा रहा है।

महिला आरक्षण विधेयक पर सवाल

सवर्णों का आरक्षण विधेयक उस समय आनन-फानन में पास किया गया जब इससे ज्यादा जरूरी महिलाओं का 33% आरक्षण विधेयक 4 साल से संसद में लंबित है यह इस बात को बताता है कि तत्कालीन सरकार की भावना क्या है वह महिलाओं के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझती है।

ऐसे समय जब तमाम बड़े मुद्दों पर काम करने की जरूरत है चाहे शिक्षा गरीबी बेरोजगारी या फिर स्वास्थ्य का मामला हो। भारत लगातार संप्रदायिक मुद्दों से जूझ रहा है, और आपसी सामाजिक सौहार्द्रता पर कड़वाहट बढ़ रही है। ऐसे समय में सवर्णों द्वारा आरक्षण की मांग किए बिना उन्हें 10% आरक्षण देना रहस्यमय है। यह प्रश्न मुंह बाए खड़ा है क्या जो *सवर्ण आरक्षण को देश के पिछड़ेपन का आधार बताता रहा है। आरक्षित वर्गों को जलील करता रहा है। क्या वह इस आरक्षण को स्वीकार कर पाएगा।

संजीव खुदशाह ,लेखक एवं विचारक 

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