छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद निर्दोष आदिवासी जल्द रिहा होंगे:  उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल

14.01.2019

छत्तीसगढ़ की जेलों में नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों के प्रकरणों पर पुनर्विचार के लिए कांग्रेस की सरकार नई कमेटी बनाने पर विचार कर रही है। जानकारी के अनुसार यह कमेटी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में काम करेगी। कमेटी में रिटायर डीजीपी समेत पांच या इससे अधिक विशेषज्ञ रखे जाएंगे। राज्य सरकार जल्द ही कमेटी का खाका तैयार कर लेगी उसके बाद कमेटी नक्सल मामलों पर पुनर्विचार के लिए बिंदु तय कर प्रकरणों पर सुनवाई करेगी। भाजपा सरकार में नक्सल मामलों पर पुनर्विचार के लिए निर्मला बुच कमेटी बनाई गई थी लेकिन कमेटी आगे कार्य नहीं कर पाई। विदित हो कि 21 अप्रैल 2012 को सुकमा जिले के मांझीपारा गांव से कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का माओवादियों ने अपहरण कर लिया था। सरकार और माओवादियों के मध्यस्थों के बीच लिखित समझौते के बाद तीन मई को कलेक्टर को रिहा किया गया था।

 

बातचीत के लिए माओवादियों ने डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा व प्रोफेसर हरगोपाल को मध्यस्थ बनाया था, जबकि राज्य सरकार ने मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच व छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा को अधिकृत किया था माओवादियों और सरकार के मध्यस्थों के बीच लिखित समझौते के बाद तीन मई 2012 को माओवादियों ने कलेक्टर को रिहा कर दिया था। सितंबर 2014 तक बुच कमेटी ने आठ बैठकें करके 650 से अधिक मामलों पर विचार किया था 350 से अधिक मामलों में जमानत का विरोध नहीं करने की अनुसंशा की थी। भाजपा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट के साथ हलफनामा दिया था। बताया जाता है कि कम से कम 131 मामले ऐसे हैं, जो इस हाई पावर कमेटी की अनुशंसा और राज्य सरकार के हलफनामे के बाद भी अदालत में अटके पड़े थे।

 

मानवाधिकार पर कार्य करनेवालों का दावा है कि छत्तीसगढ़ के जेलों में तीन हजार से अधिक निर्दोष आदिवासी बंद हैं लेकिन डेढ़ साल में यह हाई पावर कमेटी दो सौ मामले भी नहीं पेश कर पाई थी। कमेटी की अध्यक्ष निर्मला बुच का कहना था कि उनका कार्य केवल अनुशंसा करना है और निर्णय लेना अदालतों का कार्य है। लेकिन संवैधानिक मामलों के जानकार कहते हैं कि कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है और अगर सरकार के हलफनामे पर अदालत जमानत नहीं दे सकती तो सरकार इस मामले में राज्यपाल को हस्तक्षेप करने के लिए कह सकती है और ऊपरी अदालतों में जा सकती है। उसके बाद भी जेलों में बंद आदिवासियों को जमानत नहीं मिल पाई थी।

 

दक्षिण कोसल ने 2015 में ‘जेल एक भयावह दुनिया’ आवरण कथा में खुलासा किया गया था कि छत्तीसगढ़ की जेलों में गरीब लाचार कैदी इस कत्लगाह में बदतर जीवन जीने को मजबूर हैं। खाने-पीने की अव्यवस्था उठने बैठने तक की पाबंदी और यहां तक कि रसूखदार कैदियों की गुलामी तक करनी पड़ रही है। छत्तीसगढ़ की जेलों में हजारों की संख्या में आदिवासी भरमार रखने, नक्सलियों को सहयोग करने के आरोप में बंद है। उनके खिलाफ राज्य सरकार जन सुरक्षा अधिनियम तथा यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत कार्रवाई कर उन्हें भय व मौत के आगोश में जीने के लिए मजबूर कर दिया हैं। पीपुल्स यूनियन फार डैमोक्रैटिक राइट्स, दिल्ली की मार्च 2015 की रपट के अनुसार मई 2014 में केंद्रीय सरकार के समक्ष रखी गई रपट के पृष्ठ 356 पर लिखा है कि ‘बड़ी संख्या में आदिवासी कई-कई वर्षों से जेलों में इसीलिए पड़े हैं क्योंकि उन पर चल रहें मुकदमें अभी तक लंबित हैं…पहली प्राथमिकी दर्ज होने के बाद उनके खिलाफ हिंसा के अन्य मामलों में और प्राथमिकियां दर्ज कर दी जाती है।

 

नक्सल अपराधों में अभियुक्त व्यक्तियों को जमानत मिलना बहुत मुश्किल होता है, जिसके कारण वे लम्बे समय तक जेलों में सड़ते रहते हैं। मुकदमे इसीलिए खिंचते चले जाते हैं क्योंकि सरकारी गवाह अनुपस्थित रहते हैं। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि अर्धसैनिक बल का सदस्य, जो कि अभियोजन की तरफ से गवाह होता है, अपनी इकाई के साथ राज्य छोडक़र वापस चला गया होता है…समिति कुछ अपराध-संबंधी वकीलों से भी मिली…(जिन्होंने) अनुमान लगाया है कि लगभग 95 प्रतिशत मुकदमें आधारहीन हैं…एक आरटीआई के जवाब में कोर्ट रजिस्टरों से पता चला कि 2005 से 2012 के बीच निपटाएं गए सभी मामलों में से औसतन 95.7 प्रतिशत मामलों में अभियुक्त दोषमुक्त साबित होकर बरी हो जाते हैं। जाहिर है कि आदिवासियों के मन में गिरफ्तारी का वास्तविक डर है।

 

जेल में वर्षों तक बंद रहने के अलावा, कानूनी कार्यवाही के चलते ताबड़तोड़ खर्च (खबरों के अनुसार 20,000 रुपए प्रति मुकदमा), दंतेवाड़ा कोर्ट के चक्कर और मुकदमे के शुरू होने और खत्म होने के बीच का लम्बा इंतजार-यह सब परिवारों को पूरी तरह से तोड़ डालते हैं और उनके बेहद सीमित संसाधनों और शक्ति को खत्म कर देते हैं। यह डर इसलिए भी और बढ़ जाता है क्योंकि अर्धसैनिक बलों के खिलाफ उनके किए गए अपराधों के संबंध में मामला दर्ज करना लगभग नामुमकिन है। गांव वालों के अनुसार पुलिस और फौज ‘वारंट’ शब्द के प्रयोग से उनको धमकाकर चुप करा देते हैं। उदाहरण के लिए केवल बीजापुर जिले में ही 1000 ऐसे ‘वारंट’ हैं। इसका मतलब बीजापुर में ही तथाकथित ‘फरार’ लोगों की संख्या 15 हजार से 35 हजार के बीच है। बीजापुर की कुल जनसंख्या 2 लाख 55 हजार 230 है। अगर एक व्यक्ति के खिलाफ एक से ज्यादा वारंट भी है (नामित या बिना नाम के)।

 

जितनी बड़ी तादाद में लोगों को फरार घोषित किया गया है उसे देखने में लगता है जैसे कि लगभग पूरी जनसंख्या को ही अभियुक्त बना दिया गया है। अलग ढंग से कहे तो इसका मतलब यह है कि सरकार ने अपने ही लाखों लोगों के खिलाफ एक जंग छेड़ दी है और घिनौना सच यह है कि माओवादियों के खिलाफ चल रही जंग का बदला आदिवासियों से लिया जा रहा है।मानव अधिकार की रक्षा के लिए कार्यरत संस्थाओं की जेलों में बंद कैदियों की हालत के बारे में ध्यान देने की सख्त जरूरत है। पूर्व कलेक्टर राजनांदगांव हर्ष मंदर लिखते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक जेल में बंद कुल कैदियों में से 67 फीसदी कैदियों का मामला विचाराधीन है, लेकिन कुछ राज्यों में यह अनुपात 80 फीसदी का भी है। 30 जून, 1989 तक सभी श्रेणियों के कुल कैदियों की संख्या 1,82,543 थी। इसमें 1.32 फीसदी विक्षिप्त हैं, 3 प्रतिशत सिविल प्रिजनर हैं, 30 फीसदी सजायाफ्ता हैं और 66.31 फीसदी कैदियों पर अभी मुकदमा चलना बाकी है। वे आगे लिखते हैं कि राष्ट्रीय पुलिस आयोग के सदस्य केएफ रूस्तम ने अपनी रिपोर्ट में विचाराधीन कैदियों का बहुत सहानुभूति के साथ अध्ययन किया था।

 

उन्होंने कहा कि ‘जेल एक ऐसी व्यवस्था है, जो हजारों लोगों को धीरे-धीरे कुचलकर खत्म कर रही है।’ उन्होंने पाया कि ‘हजारों कैदी सीधे-सादे सरल लोग हैं, जो कानून की चपेट में आ गए हैं। उन्हें ठीक-ठीक समझ भी नहीं है कि हुआ क्या, उनके खिलाफ आरोप क्या है और आखिर क्यों उन्हें जेल भेज दिया गया। इन लोगों की जिन्दगी में कोई कैलेंडर या घड़ी नहीं है। सिर्फ कोर्ट की तारीख है, जो एक सुनवाई से दूसरी सुनवाई तक खिसकती चली जाती है। कइयों पर बिना टिकट यात्रा करने, हथियार या अवैध शराब रखने या ऐसे ही कानून तोडऩे के कुछ मामूली आरोप हैं।’ उन्होंने पाया कि उनमें से कई लोगों पर पांच-पांच साल से मुकदमा चल रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने भी यह देखा कि ‘बहुत भारी संख्या में स्त्री-पुरूष, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं, जेल की सलाखों के पीछे कैद है और बरसों से कानून की अदालत में अपने मुकदमे का इंतजार कर रहे हैं। उनमें से कुछ के खिलाफ बड़े मामूली आरोप है, जो सिद्ध भी हो जाएं तो भी उसकी सजा कुछ महीनों या एक-दो साल से ज्यादा नहीं होगी।

 

बावजूद इसके इंसानियत के ये बिसरा दिए गए अंश तीन से लेकर दस वर्षों से जेल में कैद अपने मुकदमें का इंतजार कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि इनमें से अधिकांश लोग गरीबी के कारण कैद हैं। वे कैद हैं, क्योंकि जमानत नहीं करवा सकते, जबकि समृद्ध व्यक्ति ऐसा कर सकता है।’ दूसरे मामलों में यह भी देखा गया कि ‘कुछ कैदी पांच, सात, नौ और यहां तक कि दस सालों से जेल में कैद हैं और उनका मुकदमा अब तक शुरू भी नहीं हुआ। इन निरीह लोगों की न्याय व्यवस्था में क्या आस्था होगी, जो इतने वर्षों से मुकदमा भी नहीं चला रही और उन्हें सलाखों के पीछे भी रख छोड़ा है।’ सुप्रीम कोर्ट ने लगातार यह निर्देश दिया है कि किसी कैदी पर जो आरोप लगा है, यदि वह आरोप सिद्ध होता है तो उसकी सजा की अवधि जितनी होगी, उसकी आधी से ज्यादा अवधि मुकदमा पूरा होने से पहले ही जेल में बिता लेने के बाद किन्हीं भी परिस्थितियों में कैदी को जेल में नहीं रखा जा सकता।

 

इसके बावजूद देश भर की जेलों में इस निर्देश को अनदेखा किया जाता हैं। और जेल को ऊंची दीवरों के पीछे पीड़ा और अन्याय दबा रहता है। कोर्ट ने पांच सितम्बर 2014 को उन सभी विचाराधीन कैदियों की रिहाई का आदेश दिया, जो उनके अपराध के लिए तय सजा से आधी से अधिक अवधि जेल में गुजार चुके हैं। इससे उन सभी गरीब विचाराधीन कैदियों को राहत मिलेगी, जो रिहाई के लिए जमानत या मुचलका देने की स्थिति में नहीं हैं। प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति रोहिन्टन एफ, नरीमन की पीठ ने देश की जेलों में बंद कैदियों में 60 फीसदी विचाराधीन कैदी होने पर चिंता जताई। कोर्ट ने निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों को आदेश दिया कि एक अक्टूबर 2014 से अपने अधिकार क्षेत्र की प्रत्येक जेल का दौरा करें। वे ऐसे विचाराधीन कैदियों का पता लगाकर उनकी तत्काल रिहाई सुनिश्चित करें, जिन्होंने अपने अपराध के लिए तय सजा से आधी अवधि जेल में काट ली है।

 

कोर्ट ने दो महीने के भीतर यह काम पूरा करने का लक्ष्य तय किया है। पीठ ने आदेश में कहा कि न्यायिक अधिकारी (मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट) उन कैदियों की पहचान करेंगे, जो उनके खिलाफ लगे आरोपों के लिए प्रदत्त अधिकतम सजा की आधी अवधि पूरी कर चुके हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436-ए के तहत तय प्रक्रिया पर अमल करने के बाद वे जेल में ही ऐसे कैदियों की रिहाई का आदेश पारित करेंगे। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436-ए विचाराधीन कैदी की अधिकतम अवधि तक हिरासत में रखने के बारे में है। इसमें प्रावधान है कि यदि ऐसा कैदी उसके अपराध की अधिकतम सजा की आधी अवधि जेल में गुजार चुका हो तो कोर्ट उसे निजी मुचलके पर या बगैर किसी जमानती के ही रिहा कर सकती है। कोर्ट ने स्पस्ट किया कि ऐसे कैदियों की रिहाई के लिए न्यायिक अधिकारियों द्वारा फैसला किए जाते वक्त किसी वकील की उपस्थिति जरूरी नहीं है।

 

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी यह काम पूरा करने के बाद संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास अपनी रिपोर्ट दाखिल करेंगे। इसके बाद हाई कोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल के पास रिपोर्ट भेजेंगे। एक अनुमान है कि देश की जेलों में कैद करीब तीन लाख 81 हजार कैदियों में लगभग दो लाख 54 हजार विचाराधीन कैदी है। कुछ मामलों में तो विचाराधीन कैदी उनके अपराध के लिए उन्हें मिलने वाली वास्तविक सजा से भी ज्यादा समय जेल में बिता चुके हैं।रिपोर्ट की माने तो एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइटूस (एसएचआर) ने दावा किया है कि देश में पिछले 8 सालों में 1184 लोगों को पुलिस हिरासत में यातनाएं देने से मौत हो गई। इनमें महाराष्ट्र में सर्वाधिक 192 मामले उजागर हुए हैं। गृह मंत्रालय को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा भेजे गए आंकड़ों में भी इन बातों का खुलासा हुआ है।

 

आयोग के अनुसार एक गंभीर तथ्य यह भी कि हिरासती मौतों को लेकर मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पुलिस और राज्य सरकारों ने समुचित पालन नहीं किया है। पिछले दो सालों में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात समेत अन्य राज्यों में इस तरह की मौत के 306 मामले आए हैं। वर्ष 2006-07 में देशभर में 118 हिरासती मौतें हुई थी जबकि 2007-08 में यह संख्या बढक़र 188 पर पहुंच गई। वर्ष 2008 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जारी रिपोर्ट के अनुसार मानवाधिकार हनन को रोकने के मामले में छत्तीसगढ़ 13 राज्यों से पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में राज्य में मानवाधिकार उल्लंघन के 491 मामले दर्ज किए गए थे।

मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में पूरे देश में उत्तर प्रदेश अव्वल है। अभी देश में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2,54,857 कुल विचाराधीन कैदियों की संख्या है। जिनमें से 53,638 विचाराधीन कैदी, मुस्लिम समुदाय से हैं। उत्तरप्रदेश में 24,207 मुस्लिम विचाराधीन कैदी जेलों में कैद हैं।

छत्तीसगढ़ की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों में से लगभग 90 फीसदी अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के हैं। विचाराधीन बंदियों में यह प्रतिशत 87 है। राज्य की जेलों में 23 सौ विचाराधीन कैदी एक साल से ज्यादा समय से बंद है। सजायाफ्ता कैदियों में 29 फीसदी और विचाराधीन कैदियों में 34 फीसदी निरक्षर है। वहीं विभिन्न जेलों में 141 मानसिक रोग से पीडि़त कैदी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 के आंकड़ों के अनुसार क्षमता से अधिक ढाई गुना कैदी रखने के मामले में छत्तीसगढ़ तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर लक्ष्यद्वीप व दूसरे स्थान पर अंडमान निकोबार है। एनसीआरबी का आंकड़ा हैरत में डालने वाला है। राज्य में केन्द्रीय और जिला जेलों की कुल संख्या 27 है। इनमें बंद सजायाफ्ता कैदियों की कुल संख्या 5630 है, जिनमें से अनुसूचित जाति के 1747, पिछड़े वर्ग के 1950 और अन्य 590 हैं। कुल 8275 विचाराधीन कैदियों में अनुसूचित जाति के 1683, जनजाति के 2953, पिछड़े वर्ग के 2535 और अन्य 1104 हैं।

चौंकाने वाला तथ्य यह कि जेल में बंद ज्यादातर अपराधी निरक्षर और कम पढ़े लिखे हैं। विचाराधीन कैदियों में 34.20 फीसदी पूरी तरह निरक्षर हैं, जबकि सजायाफ्ता कैदियों में से 29 फीसदी निरक्षर है, वहीं 51 फीसदी ने हाईस्कूल तक शिक्षा ग्रहण की है। आंकड़े के अनुसार छत्तीसगढ़ की जेलों में विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों का प्रतिशत हर वर्ष बढ़ रहा है जबकि बिहार, केरल और मेघालय जैसे राज्यों में इसका प्रतिशत कम हुआ है।राज्य में वर्ष 2011 के अंत तक विभिन्न जेलों में बंद फांसी की सजा प्राप्त मुजरिमों की कुल संख्या 5 थी। उम्र कैद की सजा काटने वालों की कुल संख्या 3960 थी। उम्र कैद की सजा काट रहे लोगों में से 3774 पुरूष और 186 महिलाएं थी। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सजायाफ्ता लोगों में 70.3 फीसदी उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। जबकि अन्य प्रदेश में यह प्रतिशत कम है। छत्तीसगढ़ की जेलों में सजायाफ्ता 33 महिलाएं अपने 36 बच्चों के साथ सजा काट रही हैं।

वहीं विचाराधीन 49 महिला कैदियों के 50 बच्चे जेलों में पल-बढ़ रहे हैं। 15 अगस्त 1947 के बाद छह दशक से भी अधिक समय बीतने के बावजूद आज भी भारतीय जेलें सुधारगृह नहीं बन सकीं, बल्कि यातनागृह की शक्ल में बदल गए हैं। जेलों के अंदरूनी हालात और कैदियों के जीवनस्तर में सुधार की दिशा में सरकारी प्रयास विफल साबित हुए हैं और यह एक हकीकत भी है आज भी जेल याने काल कोठरी का अंधेरा दूर नहीं हुआ है।बहरहाल देखना यह है कि यह सरकार बुच कमेटी से बेहतर क्या करेगी? लेकिन कमेटी डीआईजी की नियुक्ति शक पैदा करता है। नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों की रिहाई के लिए काम कर रही जगदलपुर लीगल एड गु्रप की शालिनी गेरा कहती है कि कमेटी में डीआईजी की नियुक्ति सवाल खड़े करते हैं। न्यायालय में प्रकरण धीमी सुनवाई और जटिलताओं के कारण लम्बा खींचा जा रहा है। गवाह नहीं पहुंचते हैं अधिकांश गवाह पुलिस होते हैं।

वे आते ही नहीं हैं। बेल नहीं मिलता है। गार्ड की कमी से गवाही और पेशी नहीं होती है इससे पेशी दिनांक वर्षों आगे बढ़ जाता है कई मामले में कई साल जेल में सडऩे के बाद आदिवासी छूटते हैं। बस्तर की जेलों में अधिकारिक रूप में नक्सल मामलों में बंदियों की संख्या गिनना मुश्किल काम है। सरकार के तरफ से भी विधिवत आंकड़े नहीं हैं। करीब डेढ़ हजार आदिवासी बस्तर के जेलों में बंद हैं दंतेवाड़ा में नक्सल मामले के करीब पांच सौ कैदी होंगे। सुकमा और बीजापुर में भी अधिकांश आदिवासी नक्सल मामले में ही बंद हैं जगदलपुर में करीब छह सौ आदिवासी नक्सल मामले में बंद हैं कांकेर में भी 50 से ज्यादा ऐसे मामले हैं। बंद कैदियों के संबंध में सरकार विधिवत आंकड़े पेश नहीं करती है। समाधान है यदि स्थानीय स्तार पर शासन-प्रशासन फर्जी मामले बनाना बंद कर दे तो जेल में बढ़ते बंदियों की संख्या से राहत मिल सकती है।

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