🎥 || हमें तो अब भी वो गुज़रा ज़माना याद आता है || :  ० दस्तक के लिए- यूनुस खान

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० दस्तक के लिए अनिल करमेले

2019 की इस सर्द सुबह अगर किसी के किसी गैजेट पर ग़ज़लें बज रही हों, और मौसम गुलाबी हुआ जा रहा हो, तो ये समझ लीजिएगा कि ग़ज़लों का दौर कभी ख़त्‍म नहीं होगा। मेहदी हसन गुनगुना रहे हैं—‘अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्‍वाबों में मिलें/ जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें’….’मैं होश में था तो मर गया कैसे/ ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे’। फ़रीदा ख़ानम की आवाज़ अगरबत्‍ती की तरह धीमी-धीमी खुश्‍बू बिखरे रही है—‘आज जाने की जिद ना करो/ यूं ही पहलू में बैठे रहो’। तबले की थाप पर मुन्‍नी बेगम की आवाज़ थिरक रही है—‘इक बार मुस्‍कुरा दो’…और फिर नैयरा नूर कंधे पर हाथ रखकर कह उठती हैं—‘तुम मेरे पास रहो…मेरे का़तिल, मेरे दिलदार मेरे पास रहो…’। आंखों से कोई याद आंसू की तरह ढुलक पड़ती है और जगजीत जैसे पुकार उठते हैं—‘अगर हम कहें और वो मुस्‍कुरा दें’ और फिर चित्रा की पतली मीठी आवाज़—‘मेरे दुःख की कोई दवा ना करो’। कोई तयशुदा दिन नहीं होता ना, जब बेगम अख़्तर गुनगुना उठती हैं—वो नये गिले वो शिकायतें, वो मज़े-मज़े की हिकायतें, वो हरेक बात पे रूठना, तुम्‍हें याद हो कि ना याद हो’।

कितनी-कितनी आवाज़ें। कितने कितने अशआर। ग़ज़लें अपने साथ बहा ले जाती हैं, वो हमें भिगो देती हैं, हमें बेहतर इंसान बनाती हैं। ग़ज़लें एक तरफ उदास शामों की सुरीली साथी रही हैं तो दूसरी तरफ इन्‍हीं से कई यादगार शामें रंगीन भी की जाती रही हैं। फिर ये सवाल उठता है कि ग़ज़लों का, उनकी महफिलों का वो दौर क्‍यों मद्धम पड़ गया। वो क्‍या था कि अचानक दुनिया रिदम और इलेक्‍ट्रॉनिक साज़ों के तिलस्‍म में गिरफ्तार हो गयी।

तकरीबन हम सबके पास वो डायरियां मौजूद हैं, जिनमें हमने अपने बचपन के दौर में मशहूर ग़ज़लों को सुनकर अंकित कर लिया। उन्‍हें याद कर लिया। उन्‍हें साथ गुनगुनाया। हम सबके अपने पसंदीदा ग़ज़ल-गायक रहे हैं। हमने अपने जेब-ख़र्च से ग़ज़लों के कैसेट ख़रीदे। उन्‍हें उस दौर के स्‍टीरियो प्‍लेयर पर खू़ब-खूब बजाया। उनके साथ मुस्‍कुराए, आंसू भी बहाए। फिर वो कैसेट बिसरा दिए गए। वो डायरियां आलमारियों में बंद होती चली गयीं और उस दौर की यादों पर धुंध छाती चली गयी। तो क्‍या वो जज्‍बात जिन्‍हें ग़ज़लें उकेरा और उभारा करती थीं—वो भी ख़त्‍म हो गए। वो बर्फ बन गए।

मुझे ऐसा नहीं लगता। दरअसल ग़ज़लों का उत्‍कर्ष उस दौर में हुआ था जब फिल्‍मी-गीत अपने उतार पर थे—जब फिल्‍मी-गानों में बहुत चलताऊ बोल और धुनें हावी थीं और ग़ज़लों की दुनिया तब सूनी होती चली गयी, जब फिल्‍मी गीतों ने रूमानियत और मिठास का जामा पहना और अस्‍सी के दशक के अंत में वो फिर से प्‍यार की बात कहने लगे। तकरीबन नब्‍बे के दशक की शुरूआत में फिल्‍मी-गीतों ने फिर से चमक बिखेरी और नई पीढ़ी को लुभाया। ये नयी ध्‍वनियां थीं, नयी आवाजें। नये संगीतकार। नये प्रयोग। बस तभी से ग़जलों का सुर मद्धम पड़ता चला गया। दूसरी वजह ये थी कि जो बुलंद शायर अपनी बेमिसाल ग़ज़लों से रोशनी बिखरे रहे थे, वो कम होती गयी। अच्‍छी ग़ज़लें कम हुईं, दोहराव आता चला गया और सब कुछ इकहरा होता गया। फिर ग़ज़लों का सूरज डूब गया। पर आज भी हमारे घरों में जब तब ग़ज़लों की महफिलें सजती हैं तो वो दौर जैसे फिर याद आ जाता है। आज भी कभी कभी मंच सजते हैं। पर ना अब वो जग्‍गू जी हैं ना मेहदी साहब, ना गुलाम अली में वो चमक बाक़ी है ना बाकियों में। गुलाम अली कितना सही कहते हैं ना अपनी गायी ग़ज़ल में —

_हमें तो अब भी वो गुज़रा ज़माना याद आता है_
_तुम्‍हें भी क्‍या कभी कोई दीवाना याद आता है।।_
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*० दस्तक के लिए अनिल करमेले*

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