12.01.2019

राजेश ( संपादक कल्ट करंट ) अपना मोर्चा के लिये 

अगर फुरसत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना

हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है.

देश के प्रसिद्ध शायर बशीर भद्र का यह शेर आज सत्तासीनों को थोड़ी करवट बदलकर जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होने को कहता है. आमतौर पर देखा गया है कि सत्ता में आने के बाद सत्ताधारी दल जनता के लिए जनपक्षीय नहीं रह जाते हैं. अभी हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद नई सरकारें बनी, लेकिन क्या व्यवस्था में कोई नयापन आएगा यह देखना अभी बाकी है.

दरअसल, सत्ता का उदासीन रवैया देखना हो तो उदाहरणों की कमी नहीं है. अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकारी पत्रिका उद्यमिता समाचार का प्रकाशन उद्योग विभाग करता था. वर्ष 2000 के अंक में मुखपृष्ठ पर देश के सर्वश्रेष्ठ हर्बल किसान के रूप में डॉ राजाराम त्रिपाठी का फोटो छपा था तथा पूरी आवरण कथा उन पर ही केंद्रित थी. इसी क्रम में केंद्रीय विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय की पत्रिका साइंस टेक इंटरप्रेन्योर ने भी अपने मुखपृष्ठ पर लिखा था कि देश का सर्वश्रेष्ठ हर्बल फार्म बस्तर में आकार ले रहा है. वर्ष 2001 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बना.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी और अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने तब उन्हें बस्तर के किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी के बारे में पता चला कि उन्होंने बैंक अधिकारी की नौकरी छोड़कर खेती में सफलताएं हासिल की है. उनकी इस सफलता को जानने के लिए जोगी स्वयं डॉ त्रिपाठी के कोंडागांव स्थित फार्म आए. उनके कार्य ,माडल को जमीन पर देखा और समझा तथा प्रदेश को हर्बल स्टेट घोषित किया. कुछ समय बाद राज्यपाल भी फार्म पर पहुंचे. धीरे-धीरे मंत्री अधिकारी सभी उनकी खेती के तौर-तरीकों को देखने समझने लिए कोंडागांव आने लगे.

जमकर चला राजनीतिक प्रतिशोध

राजनेताओं के आवागमन का परिणाम यह हुआ यह कि बीएससी,एल एल बी, हिंदी साहित्य, अंग्रेजी भाषा, इतिहास तथा अर्थशास्त्र सहित चार विषयों में एम ए तथा पीएचडी डाक्टरेट  की सर्वोच्च उपाधियों से विभूषित, प्रदेश के  सबसे ज्यादा शिक्षित किसान राजाराम त्रिपाठी को प्रगतिशील उच्च शिक्षित किसान का प्रदेश का चेहरा माना जाने लगा. राज्य बनने के लगभग डेढ़ साल बाद ही चुनाव हुए, भाजपा सत्ता में आई तब से लगातार 15 वर्षों तक राज्य में भाजपा का शासन रहा. लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा राजनीतिक प्रतिशोध के अपने एजेंडे पर चल निकली. हांलाकि डॉ त्रिपाठी कभी किसी राजनीतिक दल के ना तो कभी सदस्य रहे हैं और ना ही किसी राजनीतिक दल से उनका कभी कोई सीधा जुड़ाव रहा है, लेकिन सत्ता में आई भाजपा उन्हें कांग्रेस समर्थक मानते हुए लगातार उपेक्षित और प्रताड़ित करती रही. न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए कम दर पर बिजली का कनेक्शन किसानों को दिया जाता है,

लेकिन डॉ त्रिपाठी को राजनीतिक साजिश के तहत कमर्शियल बिजली कनेक्शन दिया गया और और बढ़ा-चढ़ा कर बिल आरोपित किया गया. बाद में बिजली का कनेक्शन भी काट दिया गया. अंततः न्यायालय की शरण लेने के बाद डॉ त्रिपाठी को राहत मिली. डाक्टर त्रिपाठी कोंडागांव में हर्बल उत्पाद से औषधि बनाने के लिए एक कारखाना स्थापित करना चाहते थे, लेकिन टालमटोल करते हुए बिजली विभाग ने तीन वर्ष तक बिजली का कनेक्शन नहीं दिया, जिसकी वजह से कारखाना अपने निर्धारित समय में पूरा नहीं हो सका और व्यवसाय प्रारंभ होने के पूर्व ही समाप्त हो गया. तीन साल की टालमटाल के बाद जब कनेक्शन मिला तो कारखाना शुरु करने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तो श्रम कानून के विभिन्न पेंचों में फंसा कर कई तरह के मुकदमें दर्ज कर दिए गए.

झूठे मुकदमों की बाढ़

केंद्र में भाजपा के शासन में आने के तत्काल बाद डॉ. त्रिपाठी और उनके परिवार के सदस्यों पर दर्जनों झूठे आयकर के मुकदमें दर्ज कर दिये गये. हालांकि सभी शत-प्रतिशत मुकदमों में उन्हें ससम्मान जीत मिली और आयकर विभाग को हार का सामना करना पड़ा यहां तक कि न्यायालय ने अपने फैसलों में संबंधित आयकर अधिकारियों के विरुद्ध टीप भी लिखा। इस दौरान डॉ राजाराम त्रिपाठी जैविक खेती और औषधिय खेती के विशेषज्ञ के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके थे. देश के राष्ट्रपति एपीजे कलाम साहब भी उनके फार्म पर आए व पीठ ठोंकी, फिर राष्ट्रपति भवन भी बुलाया. देश के विभिन्न हिस्सों में तथा दुनिया के 34  देशों में डॉ त्रिपाठी ने अपनी विशेषज्ञता से कृषि को लाभान्वित करने के प्रयास में लगे रहे. लेकिन पिछले 15 वर्षों में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सैकड़ों आयोजन जैविक खेती, उन्नत कृषि, पर्यावरण संरक्षण तथा आयुर्वेदिक उत्पाद आदि पर किए गए लेकिन किसी भी आयोजनों में इस अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ को आमंत्रित नहीं किया गया. इतना ही नहीं जिला स्तरीय सेमिनार ,वर्कशॉप आदि  में भी इन्हें बुलाने से भरसक परहेज किया गया.

राजनीतिक भेदभाव और प्रताड़ना का ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है. किसी राजनीतिक दल तथा सक्रिय राजनीति से  न जुड़े होने के बावजूद इन्हें हर स्तर पर कांग्रेस समर्थक ही माना जाता रहा, लेकिन अब जब कि राज्य में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेसी सरकार डॉ राजाराम त्रिपाठी की विशेषज्ञता का लाभ प्रदेश के कृषि के उत्थान के लिए करेगी तथा उन्हें उनका सम्मान दिलाएगी. चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी की घोषणा की थी, लेकिन यह सभी जानते हैं कि किसानों की समस्याओं का समाधान कर्ज माफी नहीं है. उन्हें समस्याओं के दुष्चक्र से निकालने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की आवश्यकता है और यह स्वावलंबन डॉ त्रिपाठी के कृषि मॉडल से आ सकता है. डॉ त्रिपाठी के द्वारा विकसित किए गए उच्च मूल्य, उच्च गुणवत्ता की चयनित फसलें, न्यूनतम कृषि लागत, खेतों पर ही प्राथमिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन तदुपरांत न्यूनतम लागत पर प्रभावी विपणन तथा वितरण नेटवर्क इनके सफल प्रायोगिक  मॉडल में  सन्निहित हैं.

कौन हैं डा. राजाराम

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे भारत का हरित योद्धा कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा. दरअसल,  डॉ त्रिपाठी ने भारतीय कृषि की बनी बनाई लीक तोड़ी है और वैज्ञानिक तत्व निहित खेती को परिभाषित किया है. उन्होंने विलुप्त हो रही जड़ी-बुटियों के संरक्षण के लिए न केवल महत्वपूर्ण कार्य किया है बल्कि इसके लिए उन्होंने इथिनो मेडिको गार्डेन के रूप में हर्बल फारेस्ट भी विकसित किया है, जहां इन विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ के अति पिछड़े व अतिसंवेदनशील क्षेत्र के रूप में बस्तर को जाना जाता है, वहीं डॉ त्रिपाठी जन्मे और पले बढ़े.  इस पिछड़े इलाके में उन्होंने वहां उम्मीद की एक नई पौध का रोपण किया है और वहां के 400 से अधिक आदिवासी परिवार मां दंतेश्वरी हर्बल समूह ( www.mdhherbals.com) के साथ हर्बल फार्मिंग से जुड़ कर न केवल अपनी आजीविका चला रहे हैं बल्कि भारत की विरासती जड़ी-बुटियों को संजो रहे हैं इसके अलावा सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन (CHAMF www.chamf.org) के माध्यम से देश के 50 हजार से अधिक आर्गेनिक फार्मर्स डॉ त्रिपाठी के इस अभियान में कदम ताल कर रहे हैं.बी.एससी,  एलएलबी , हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र सहित चार विषयों में एम. ए.तथा दो विषयों में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त डॉ त्रिपाठी को  देश का सबसे ज्यादा शिक्षा प्राप्त किसान माना जाता है.

अभी हाल ही में डा. त्रिपाठी को  देश के ४५ किसान संगठनों के  महासंघ अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा )  का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। डॉ त्रिपाठी के नेतृत्व में मां दंतेश्वरी हर्बल  को देश का पहला आर्गेनिक (जैविक) सर्टिफाइड उत्पाद बनाने वाली कंपनी के रूप में 18 साल पहले वर्ष 2000 में मान्यता मिली. दो दशकों से  वे अपने उत्पादों का यूरो,अमेरिका सहित कई देशों में निर्यात भी कर रहे हैं और वहां इसे काफी पसंद भी किया जा रहा है. उन्हें  बेस्ट एक्सपोर्टर का अवार्ड भी मिल चुका है. अभी हाल में ही भारत सरकार के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र के संगठन सी .एस .आई. आर. CSIR के साथ करार कर स्टिविया की खेती और  इससे  कड़वाहट रहित स्टिविया की शक्कर बनाने के लिए कारखाना लगाने के लिए २- दो   करार किया है।  उल्लेखनीय है हर्बल या आर्गेनिक व्यवसाय से जुड़ी देश की बड़ी कंपनियां जंगली जड़ी-बुटियों का भारी मात्रा में दोहन तो कर रही हैं लेकिन उनके संरक्षण की दिशा में उनका योगदान नगण्य है, इसकी वजह से जुड़ी बुटियों की ढेर सारी प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है. ऐसी विलुप्त हो रही जुड़ी-बुटियों को संरक्षित करने का महती कार्य वे कर रहे हैं. उनके इन योगदान को देखते हुए उन्हें की अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार जिनमें ग्रीन वारियर भी शामिल हैं, से नवाजा गया हैं.अब तक देश-विदेश से उन्हें 150 से अधिक अवार्ड मिले हैं.

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