प्रधानमंत्री जी (शेक्शपियर का लिखा याद रखें)–अरब का सारा इत्र भी, आपके हाथों पर लगे खून को धो नहीं पाएगा. : सीताराम येचुरी .

नोट ; घणी बड़ी पोस्ट है, मगर  90 मिनट की बकबास  के हिज्जे सुधारने में थोड़ा विस्तार तो होगा !!  बोलिये होगा कि नईं !!
नव वर्ष पर प्रधानमंत्री के “बताया कम और छुपाया ज्यादा” वाले प्रायोजित इंटरव्यू पर #सीताराम_येचुरी .
प्रस्तुति बादल सरोज 
प्रधानमंत्री ने समाचार एजेंसी, एएनआइ के साथ एक प्रायोजित इंटरव्यू के जरिए, 2019 के आम चुनाव के लिए अपना पहला गोला दाग दिया है। उन्होंने दावा किया है कि 2018 का साल, भारत के लिए एक ‘शानदार साल’  रहा है! वाजपेयी के ”शाइनिंग इंडिया” के दावे के बाद, 2004 के चुनाव में क्या नतीजे आए थे, सभी जानते हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी को यह ‘दीवार पर लिखी इबारत’ दिखाई देनी शुरू हो गयी है।
 डेढ़ घंटे से ज्यादा के लगभग इकतरफा संवाद में प्रधानमंत्री ने एक बार भी इसका जिक्र तक नहीं किया है कि 2014 के चुनाव के मौके पर उन्होंने और भाजपा ने देश की जनता से क्या वादे किए गए थे और क्यों अब तक उनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हुआ है। यह उत्तर-सत्य प्रचार अभियान का मामला है। इस प्रक्रिया में उन्होंने जमकर गलत-सलत जानकारियां फैलाने की कोशिश की है।
#किसानों_की_ऋण_माफी
 फिर भी प्रधानमंत्री ने सबसे उदासीनतापूर्ण तथा अमानवीय प्रतिक्रिया किसानों की ऋण माफी के मामले पर दी है। उन्होंने एक बार की कृषि ऋण माफी को ”लॉलीपॉप ” करार दे दिया! ऋण माफी की मांग, कर्जों के बोझ तले पिस रहे किसानों के, व्यापक पैमाने पर हुए संघर्षों के फलस्वरूप आयी है। कर्ज के बोझ के चलते हताशा में बड़ी संख्या में किसानों ने आत्महत्या की है। इन दुर्भाग्यपूर्ण मौतों को रुकवाने में, एक बार की ऋण-माफी काफी मददगार होगी। देश के अन्नदाता को बचाने के लिए यह ऋण-माफी जरूरी है। देश भर में बड़े पैमाने पर हुए किसानों के संघर्षों की एक और मांग यह है कि प्रधानमंत्री ने 2014 के चुनाव के समय जो वादा किया था कि किसानों को उनकी पैदावार की लागत से डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाया जाएगा, उसे पूरा किया जाए। करीब पांच साल गुजर चुके हैं और यह मांग पूरी नहीं की गयी है। गहराता कृषि संकट सीधे-सीधे ग्रामीण भारत को दिए गए विभिन्न आश्वासनों के साथ दगा किए जाने का ही नतीजा है। इस संकट का असर ग्रामीण भारत में कृषि-इतर क्षेत्रों से जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में जनता के सभी तबकों की आय में गिरावट, इसी का सबूत है।
#नोटबंदी 
 नोटबंदी की सुनामी से भारतीय अर्थव्यवस्था के तबाह हो जाने के समूचे अनुभव के  खिलाफ जाकर, प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि नोटबंदी कामयाब रही है! आश्चर्यजनक तरीके से उन्होंने दावा किया है कि नोटबंदी के फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में जितना भी काला धन था, सब का सब अब बैंकिंग प्रणाली में आ गया है। इससे ज्यादा बेतुकी बात दूसरी नहीं हो सकती है। प्रधानमंत्री के इस कदम ने कानूनों का उल्लंघन कर काला धन जमा करने वालों को तो फायदा ही पहुंचाया है और उन्हें इसका मौका दिया है कि अपने काले धन को, ‘सफेद धनÓ में तब्दील कर लें। इस तरह उन्होंने तो, देश के कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने तथा कानून के मुताबिक उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए, पुरस्कृत ही किया है। 
 इस प्रक्रिया में नोटबंदी ने हमारे देश की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है। याद रहे कि खेती के बाद, हमारे देश में सबसे ज्यादा रोजगार इस अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में ही हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद में भी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा उल्लेखनीय है। लेकिन, नोटबंदी ने तो उन करोड़ों लोगों की आजीविकाओं को नष्टï ही कर दिया, जिनकी आजीविका नकद लेन-देन पर निर्भर थी। उसके बाद से देश की जीडीपी में जो गिरावट आयी है और अर्थव्यवस्था में जो संकट पैदा हुआ है, सीधे-सीधे प्रधानमंत्री के इसी कदम का नतीजा है।
#जीएसटी
 जीएसटी के लागू होने की शुरूआत का एलान करने के लिए प्रधानमंत्री ने मध्य-रात्रि में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया था। इस मौके पर इसके दावे किए गए थे कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा और कर राजस्व संग्रह में भारी बढ़ोतरी होगी। नये साल के अपने साक्षात्कार में भी प्रधानमंत्री ने जीएसटी की हिमायत की है और दावे किए हैं कि इसने कर प्रणाली को सरल बना दिया है और लोगों की भारी संख्या को राहत दिलायी है। इससे औंधी बात नहीं हो सकती है। सचाई यह है कि जिस तरह से जीएसटी को लागू किया गया है, उसने मध्यम, लघु तथा सूक्ष्म उद्यमों (एमएसएमई) को पंगु बनाकर रख दिया है, जबकि यह क्षेत्र हमारे देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में से एक है। इसकी वजह से करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी है। प्रधानमंत्री ने इसका दावा भी किया है कि जीएसटी ने यह सुनिश्चित किया है कि 500 से ज्यादा आइटमों पर कर की दर शून्य रहे। लेकिन, सचाई यह है कि इनमें 490 से ज्यादा आइटम तो हमेशा से ही कर मुक्त रहे थे और इसलिए, प्रधानमंत्री का यह दावा भी सरासर बेतुका ही कहा जाएगा।
#बेरोजगारी
 देश में बढ़ती बेरोजगारी पर प्रधानमंत्री ने एक शब्द भी नहीं कहा है। क्या प्रधानमंत्री मोदी ने ही देश के युवाओं से हर साल दो करोड़ नये रोजगार पैदा करने का वादा नहीं किया था? पांच साल में दस करोड़ नये रोजगार पैदा होने चाहिए थे। लेकिन, हुआ क्या? बड़े पैमाने पर पहले से रोजगार में लगे लोगों की भी छंटनियां, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की तबाही और एमएसएमई क्षेत्र की बर्बादी। इस सब के चलते, बेरोजगारी में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। यह एक स्थापित तथ्य है कि आज भारत को जैसी भारी बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है, वैसी भारी बेरोजगारी का सामना पिछले बीस वर्ष में नहीं करना पड़ा था। मोदी सरकार ने इस निराशाजनक सचाई को दबाने के लिए, सरकारी आंकड़ों के प्रकाशन को ही रोक दिया है और श्रम ब्यूरो की सालाना रिपोर्टों का प्रकाशन ही बंद कर दिया गया है, जिससे बेरोजगारी के आंकड़े लोगों को पता ही नहीं चलें।
 आज भारत में आधी से ज्यादा आबादी युवाओं की ही है। इन पांच वर्षों में इन युवाओ के भविष्य को असुरक्षा तथा अनिश्चितता के अंधकार में धकेल दिया गया है। ये युवा ही तो भविष्य के भारत के निर्माता हैं। उनकी संभावनाओं को नष्टï करने का मतलब तो हमारे देश के भविष्य को ही खतरे में डालना है।
#दरबारी_पूंजीवाद
 प्रधानमंत्री ने, भाजपा की मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों की लूट के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है। 2014 से 2019 के बीच, कार्पोरेटों के ऋण बढकऱ चार गुना हो गए हैं। इनमें से जो बड़े कर्जदार, कर्ज मारकर विदेश भाग गए हैं, प्रधानमंत्री ने उन्हें वापस लाने का वादा किया है। लेकिन, अब तक उनमें से एक को भी वाापस नहीं लाया जा सका है। बजाए इसके कि उनकी परिसंपत्तियों को जब्त किया जाता तथा इन रकमों से बैंकों का ऋण चुकाया जाता, यह भाजपा सरकार तो नियमित रूप से कार्पोरेट ऋणों को माफ करने में ही लगी रही है। इसके ऊपर से, इस तरह के ऋण लेकर, उन्हें मार जाने वाली कंपनियों को, नीलामी के जरिए सबसे ऊंची बोली लगाने वाले के हवाले किया जा रहा है। इसे ‘हेयर कट’ नीति कहा जाता है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ऐसा ‘हेयर कट’ झेलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस पूरे खेल में होता यह है कि कार्पोरेट खिलाड़ी, मारे गए ऋणों के बदले में रेहन रखे गयी कंपनियां बैंकों से, उनका 20 फीसद या उससे भी कम दाम देकर, वापस हासिल कर लेते हैं। और मिट्टी  के मोल इन कंपनियों को हासिल करने वाले ये कार्पोरेट खिलाड़ी कौन से हैं? इस तरह की ‘हेयर कट’ का फायदा, प्रधानमंत्री तथा उनकी सरकार के कृपापात्रों को ही मिल रहा है।
 अंधाधुंध इस तरह के ऋण देने वाले बैंक अब संकट में फंस गए हैं। इन बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करने के लिए सार्वजनिक धन झौंका जा रहा है। यह भी सार्वजनिक धन की लूट का ही मामला है। पहले तो, करोड़ों भारतीयों के बैंक जमा लूटकर, कार्पोरेटों को इस तरह के ऋण दे दिए गए। उसके बाद, इससे पैदा हुए बैंकों के संकट पर काबू पाने के लिए, उनमें दोबारा पूंजी डालने के लिए, एक बार फिर सार्वजनिक धन की लूट की जा रही है।
#रफाल_घोटाला
 विवादास्पद रफाल सौदे का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस सौदे को सही करार दे दिया है और इसलिए, इस सौदे में किसी तरह का  भ्रष्टाचार या घोटाला होने का कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने यह दावा भी किया कि यह एक पाक-साफ सौदा है और किसी तरह की दलाली के पैसे के इधर से उधर होने के कोई निशान ही नहीं मिलते हैं। बेशक, पैसे के इधर से उधर होने के निशान तो अब मिलेंगे भी नहीं क्योंकि प्रधानमंत्री तथा उनकी सरकार ने, राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग से संबंधित कानूनों को ही बदल दिया है और ‘चुनावी बांडों’ की व्यवस्था शुरू कर दी है। अब कोई भी पैसे वाला बैंक से ये बांड खरीद सकता है और किसी राजनीतिक पार्टी को दे सकता है और राजनीतिक पार्टी इस बांड को भुना सकती है। लेकिन, इस सब के दौरान पैसा लेने/देने वालों से कोई सवाल न तो पूछे जाएंगे और न उन्हें कोई जवाब देने होंगे। इस तरह प्रधानमंत्री ने राजनीतिक  भ्रष्टाचार को ही वैध बना दिया है। इस घोटाले का सबसे ज्यादा फायदा, सत्ताधारी भाजपा को ही होने का पता इसी तथ्य से चल जाता है कि बैकों द्वारा जारी किए चुनावी बांड के जरिए चंदे की कुल 222 करोड़ रु0 की पहली किस्त में से, 210 करोड़ रु0 यानी 94.5 फीसद से ज्यादा भाजपा के ही हिस्से में आए हैं।
 अगर प्रधानमंत्री का कहना है कि रफाल सौदे में वाकई सब कुछ साफ-सुथरा है, तो वह इस सौदे की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित क्यों नहीं होने दे रहे हैं? अगर प्रधानमंत्री को सब कुछ पाक-साफ होने का इतना ही भरोसा है, तो संयुक्त संसदीय समिति से यह साबित क्यों नहीं कर लेते हैं कि इस सौदे में कुछ भी संदेहजनक नहीं है? अगर प्रधानमंत्री और भाजपा, पूरा जोर लगाकर संयुक्त संसदीय समिति के गठन का रास्ता रोक रहे हैं, तो यह तो अपने आप में इसका पर्याप्त सबूत है कि इस सौदे में कुछ न कुछ ऐसा जरूर है, जिसे भारत की संसद और भारत की जनता, दोनों से ही छुपाया जा रहा है।
#भारतीय_रिजर्व_बैंक
 नये साल के मौके पर दिए गए अपने इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने यह भी बताया है कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने तो, वास्तव में जब उन्होंने इस्तीफा दिया उससे छ:-सात महीने पहले ही इस्तीफा देने की इच्छा जतायी थी। लेकिन, इससे तो इसी तथ्य की पुष्टिï होती है कि रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर को बाहर करने के बाद, खुद प्रधानमंत्री द्वारा छांटकर लाए गए इस गवर्नर के लिए, इस सरकार से निपटना मुश्किल हो रहा था। आखिरकार, यह सरकार रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता और वित्तीय नियमनकर्ता की सत्ता को ही कमजोर करने में लगी हुई है।
 प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का निशाना अब रिजर्व बैंक के केंद्रीय संचित कोष पर है, ताकि उसमें से भारी रकम निकाल सके। सरकार का कहना है कि कर राजस्व में हो रही गिरावट की भरपाई करने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है। जीएसटी के लागू किए जाने के बाद स्थिति यह है कि सालाना बजट के हिसाब से बनने वाला कुल राजकोषीय घाटा, चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में ही खपाया जा चुका है। दूसरे, बैंकों का पूर्ण पुनर्पूंजीकरण करने के लिए और पैसा चाहिए। इन दोनों ही पहलुओं से रिवर्ज बैंक के संचित कोष में सेंध लगाने की कोशिश की जा रही है। ऐसा होता है तो वित्तीय नियामक खुद अस्थिर हो जाएगा और इसके अर्थव्यवस्था के बुनियादी पहलुओं पर गंभीर दुष्प्रभाव होंगे। इसके वित्तीय बाजारों के लिए गंभीर परिणाम होंगे और इससे देश में आर्थिक व वित्तीय संकट की एक नयी लहर आ सकती है।
#बढ़ता_सांप्रदायिक_ध्रुवीकरण
 अयोध्या में विवादित जगह पर ही राम मंदिर बनाने के सवाल पर प्रधानमंत्री ने बहुत ही कुटिलतापूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि इस सिलसिले में अदालत में विचाराधीन मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ही सरकार, मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश जारी करने या कानून बनाने के, कानूनी रास्ता अपनाने के विकल्पों पर विचार करेगी। यह अदालत पर दबाव डालना नहीं तो और क्या है? वह कह रहे हैं कि अगर अदालत ने उनके मन के अनुकूल फैसला नहीं दिया तो सरकार, उसे पलटने के लिए कानूनी उपायों का सहारा लेगी। दूसरी ओर प्रधानमंत्री को यह कहना ही गवारा नहीं हुआ कि सरकार, अदालत के फैसले का पालन करेगी। वास्तव में उन्होंने जो कुछ कहा, वह तो इसका एलान करने जैसा ही था कि अदालत का फैसला कुछ भी हो, मंदिर वहीं बनाएंगे।
 यह आम चुनावों की पूर्व-संध्या में छेड़े गए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के वृहत्तर अभियान को खाद-पानी देना ही है। यही अभियान तो हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक वोट बैंक को पुख्ता करने की मोदी सरकार की कोशिशों का मुख्य औजार है।
 भीड़ हत्या की घटनाओं पर प्रधानमंत्री की टिप्पणियां, इसकी और पुष्टिï ही करती हैं। ऐसी घटनाओं की प्रधानमंत्री ने रस्मी तौर पर निंदा तो की है, लेकिन इस पर पूरी तरह से चुप्पी ही साध गए हैं कि क्यों ज्यादातर भाजपा-शासित राज्यों में कानून व व्यवस्था का तंत्र, बेरोक-टोक कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहा है। इन राज्यों में भाजपा सरकारों के संरक्षण में गोरक्षा या नैतिक दारोगाई के नाम पर निजी सेनाएं पनप गयी हैं। इन निजी सेनाओं द्वारा किसी न किसी बहाने से मुसलमानों तथा दलितों की हत्याएं किए जाने के खिलाफ प्रधानमंत्री ने एक शब्द तक नहीं कहा है। प्रधानमंत्री ने घृणा तथा हिंसा के वातावरण के फैलने पर एक शब्द तक नहीं कहा है, जबकि यही भीड़ हिंसा तथा भीड़ हत्या की बढ़ती घटनाओं के लिए रास्ता बनाता है।
 महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों पर, बच्चों-बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार तथा हत्या की नृशंस घटनाओं पर, प्रधानमंत्री ने एक शब्द  तक नहीं कहा है। प्रधानमंत्री ने इस पर भी एक शब्द तक नहीं बोला है कि क्यों दलितों, मुसलमानों तथा महिलाओं के खिलाफ इस तरह के हमले करने वालों पर मुकद्दमे भाजपायी राज्य सरकारों द्वारा उठाए जा रहे हैं, जबकि तरह-तरह के मुकद्दमों के जरिए पीडि़तों का ही और परेशान किया जाना जारी है।
#तीन_तलाक_और_सबरीमला
 प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि ससंद में पेश किया गया तीन तलाक विधेयक लैंगिक समानता तथा सामाजिक न्याय का मुद्दा है और उनकी सरकार मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए कदम उठा रही है। लेकिन, जब सबरीमला मंदिर के सिलसिले में लैंगिक समानता का मुद्दा उठाया गया, प्रधानमंत्री ने दावा किया कि ये आस्थाओं के मुद्दे हैं। इस तरह प्रधानमंत्री ने इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को नकार ही दिया, जो महिलाओं के बराबरी के मौलिक अधिकार के आधार पर ही, सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत देता है, जिसकी पहले इजाजत नहीं थी। यह दोमुंहापन एक बार फिर उनके सांप्रदायिक एजेंडा की ही पुष्टिï करता है और केरल में सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय के खिलाफ विक्षोभ तथा हिंसा भडक़ाकर, भाजपा वही करने में लगी हुई है।
#2019_का_आम_चुनाव
 प्रधानमंत्री के एक स्वयंसिद्घ बात कही है कि आने वाले चुनाव में क्या होता है, यह तो भारतीय जनता ही तय करेगी। बेशक, चुनाव में यह तो हमेशा जनता ही तय करती है। और यह बढ़ते पैमाने पर साफ होता जा रहा है कि भारत की जनता बदलाव की तलाश में है और हर कीमत पर इस सरकार से जान छुड़ाना चाहती है। नीचे से जनता का यही दबाव है जो देश की सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को मजबूर कर रहा है कि आगे आएं और आने वाले चुनाव में इस सरकार को और भाजपा को हराने के लिए काम करेें। यह सबसे बढकऱ इस सरकार की नीतियों के खिलाफ बढ़ते जनता के असंतोष का और जनता के संघर्षों में हाल में देखने को मिली जबर्दस्त तेजी का ही नतीजा है। इसी क्रम में 8 तथा 9 जनवरी को होने जा रही अखिल भारतीय हड़ताल एक बार फिर भारत की मेहनतकश जनता की एकता का प्रदर्शन करेगी। इन्हीं तारीखों पर ”ग्रामीण भारत बंद’ का किसान तथा खेत मजदूर संगठनों ने आह्वïन किया है, जनता के इसके बढ़ते संकल्प का ही परिचायक है कि इस मोदी सरकार को हटाया जाए और नीतियों को जनहितकारी दिशा में बदलवाया जाए। जनता को सिर्फ नेता नहीं, नीति का भी बदलाव चाहिए।
 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का मुकाबला, भारत की जनता करेगी।
 प्रधानमंत्री जी (शेक्शपियर का लिखा याद रखें)–अरब का सारा इत्र भी, आपके हाथों पर लगे खून को धो नहीं पाएगा।
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