राजकुमार सोनी : अपना मोर्चा के लिये 

अगर आपने दूरदर्शन पर जंगल बुक धारावाहिक देखा है तो आपको याद होगा कि मोगली के पास एक ऐसा खिलौना था जिसे हवा में फेंकने पर वह घूमकर वापस उसके हाथ में आ जाता था. इस खिलौने को बूमरैंग कहा जाता है. वैसे तो बूमरैंग आस्ट्रेलिया का एक प्रमुख अस्त्र भी है जिसका उपयोग आदिवासी शिकार के लिए करते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से इसका इस्तेमाल राजनांदगांव के विधायक रमन सिंह ( पूर्व मुख्यमंत्री भी ) जरुरत से ज्यादा कर रहे थे. वे हर बार बूमरैंग फेंकते रहे मगर उनका शस्त्र उनके पास ही लौटकर आता रहा.

लोहा… लोहे को काटता है

भारतीय पुलिस सेवा के अफसर शिवराम कल्लूरी कभी रमन सिंह के सबसे करीबी और विश्वासपात्र थे. सरगुजा में माओवाद के सफाए के लिए कल्लूरी की पीठ थपथपाई जाती थीं. जब बस्तर में माओवादी गतिविधियों में इजाफा हुआ तो कल्लूरी बस्तर भेज दिए गए. इस बीच कल्लूरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर तस्वीरें खिंचवाते रहे. सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले के बाद जब कल्लूरी की देशभर में बदनाम हुए तब उन्हें यह कहते हुए पुलिस मुख्यालय में अटैच कर दिया गया कि अभी उनका लीवर ठीक से काम नहीं कर रहा है.

अभी हाल के दिनों में जब नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल्लूरी को एसीबी में पदस्थ किया और नान घोटाले की जांच का जिम्मा सौंपा तो पूर्व मुख्यमंत्री ने सवाल दागा- जो कल तक बदनाम था भला उसे महत्वपूर्ण जवाबदारी देने की क्या जरुरत थी. अपने इस सवाल के साथ पूर्व मुख्यमंत्री यह बताना भूल गए कि उनकी सरकार में शिवराम कल्लूरी को माओवादियों से लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा समझते थे.

जाहिर सी बात है कि कांग्रेस की तरफ से भी जवाब आना था. जवाब आया- रमन के सबसे विश्वासपात्र को ही जवाबदारी दी गई है ताकि कोई शक-सुबो न हो. कल्लूरी कितने दिनों तक एसीबी में रहेंगे यह बाद की बात है, लेकिन राजनीति के जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि भूपेश बघेल का फैसला रणनीतिक तौर पर बेहद सधा हुआ है. उनके इस फैसले को देखकर फिल्म शोले का वह चर्चित संवाद बरबस याद आ जाता है. संवाद है- लोहा… लोहे को काटता है.

जब मौत से डर नहीं लगा

रमन सिंह ने दूसरा बूमरैंग पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी की तैनाती को लेकर फेंका था. उनका आरोप था कि नए पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के दौरान सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का पालन नहीं किया गया. उनका यह भी कहना था कि किसी भी पुलिस महानिदेशक को हटाने के पहले यह जाना अनिवार्य है कि उस पर किस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं. अपने इस बयान के दौरान रमन सिंह यह बताना भूल गए कि उनकी सरकार ने भी 18 जुलाई 2011 को अचानक विश्वरंजन को हटा दिया था.शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा- पूर्व मुख्यमंत्री को पुराना संदर्भ और उदाहरण अवश्य देख लेना चाहिए था. रमन सिंह का तीसरा बूमरैंग यह है कि उन्होंने प्रदेश में सीबीआई की इंट्री रोके जाने को लेकर भूपेश बघेल को आड़े हाथों लिया. उनका कहना था कि बघेल सीबीआई से डरते हैं. जवाब मिला- जब मौत से डर नहीं लगा तो सीबीआई से क्यों लगेगा. इस जवाब के साथ मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को यह भी बताया कि रमन सिंह की सरकार के कुछ जिम्मेदार अफसरों ने भी छत्तीसगढ़ में सीबीआई की इंट्री को रोकने के लिए पत्र लिखा था तो फिर आज आपत्ति क्यों. वैसे तो बूमरैंग कई हैं.

रमन सरकार के एक पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने दस दिनों के भीतर किसानों का कर्ज माफ किए जाने की दशा में इस्तीफा देने की बात कहीं थीं. कर्ज माफ हो गया, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं  दिया. अब शस्त्र उनके आसपास घूम रहा है. सच तो यह है कि रमन सिंह 20-25 दिन पहले बनी नई सरकार पर जितनी ऊंगलियां उठा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा ऊंगलियां उनकी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही है. नियंत्रक महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट ने उनके सरकार की कार्यप्रणाली को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. नई रिपोर्ट ने तो उनके चहेते सुपर सीएम की भी पोल खोलकर रख दी है.

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