10.01.2019 
आरक्षण गरीबी नहीं, बल्कि वर्णव्यस्था खत्म करने के लिए है। गरीबी दूर करने के लिए सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव करना चाहिए, जिनकी वजह से देश की सम्पदा मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमट गयी है और लगातार सिमटती जा रही है। असंतुष्ट और बदहाल जनता का ध्यान देश के गरीबीकरण की इन नीतियों से हटाने के लिए सरकार ने एक बार फिर ‘गरीब सवर्णों’ को 10 प्रतिशत आरक्षण का शिगूफा छोड़ा है, जो कि वास्तव में एक बड़ा सामाजिक, आर्थिक और संवैधानिक ब्लंडर है।
अक्सर आरक्षण पर बहस करते हुए इसे लोग सिर्फ अच्छे कॉलेजों में प्रवेश और नौकरियों से जोड़ते हैं। जबकि आरक्षण का उद्देश्य इतना भर नहीं है। आरक्षण देने का उद्देश्य सामाजिक संरचना के हर क्षेत्र में उन लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है जिन्हें मनुवादी वर्णव्यवस्था ने जबरन हिंसक तरीके से वर्षों नहीं, बल्कि सदियों तक सम्मानपूर्वक जीवन से वंचित रखा, उन्हें अछूत मान कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से वंचित रखा। सत्ता तो छोड़िये, गांव, घर, मोहल्ले, टोले और सड़क तक पर उनके लिए अति संकीर्ण दायरा निर्धारित रखा, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे कुछ खास जातियों में पैदा हुए हैं। जाति के आधार पर असमानता का यह आचरण तब भी जारी है, जबकि संविधान ने जाति के आधार पर भेदभाव को अपराध माना है और जबकि बहुत से लोग यह कहते हैं कि अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे देश में ‘जनवादी आचरण’ का आगाज हो चुका है।
सिर्फ बड़ी घटनाओं को न देखें, सिर्फ गांवों को न देखें, सवर्ण लोग अपने घर और आस-पास दलित जातियों के साथ होने वाले व्यवहार और उनके लिए इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर एक नजर डालें। चूंकि अंग्रेजों के रहते हुए ही डा. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म की इस अमानवीय प्रैक्टिस के खिलाफ लिखना बोलना और लड़ना शुरू कर दिया था, और चूंकि इस दबाव में उन्हें संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाना पड़ा, इसलिए यह संभव हो सका कि पीछे छूट गयी जातियों को मुख्यधारा और समाज के हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्था आ सके। इसका उद्देश्य था कि वर्णव्यवस्था की संरचनागत हिंसा के द्वारा पीछे छोड़ दी गयी जातियों को हर जगह प्रतिनिधित्व देकर बराबरी पर ला देना और उनके साथ होने वाले अमानवीय आचरण के असर को धीरे-धीरे समाप्त कर देना। लेकिन वर्णव्यवस्था से लाभ पाने वालों को आरक्षण की यह व्यवस्था कभी भी पसन्द नहीं आयी और वे हमेशा ही अपनी बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी और बदहाली के लिए इसे ही दोषी ठहराते रहे। मनुवादी व्यवस्था पर बिना प्रहार किये जन्मे भारत की सरकारें भी इस सोच को पालती-पोषती रहीं और इससे लाभ उठाती रहीं। इसके साथ ही समाज के हर क्षेत्र में इन पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व को कम करने के हर संभव प्रयास भी करती रही।
एक साजिश के तहत शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में दलितों के प्रवेश को रोका जाता रहा। कहीं भ्रष्टाचार द्वारा दलितों की सीटों पर सवर्णों की भर्ती करके, कहीं दलित छात्रों/शोधार्थियों को अध्यापकों द्वारा नकार कर या उनके साथ बुरा बर्ताव कर। अब नया सरकारी फंडा विश्वविद्यालयों के आरक्षण व्यवस्था में ‘रोस्टर प्रणाली’ का है, जिसने प्रकारांतर से आरक्षण की व्यवस्था को खारिज ही कर दिया है। अब विश्वविद्यालयों में दलितों का प्रतिनिधित्व मुश्किल ही है।
यह एक अलग लेख का विषय है, लेकिन इतना कहना यहां जरूरी है कि दलितों के आरक्षण से नाराज सवर्णों को आरक्षण के बावजूद उनके प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर एक नजर अवश्य डालना चाहिए और सोचना चाहिए कि आरक्षण लागू होने के इतने साल बाद भी उनका प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? जबकि इस पिछड़े वर्ग में पढ़ने और नौकरी करने की लालसा बढ़ी है।
लेकिन हम यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कर रहे है, जो कि एक और बड़ी सरकारी साजिश है। ऐसी साजिश, जिससे हमारा ध्यान उन नीतियों या उस मुनाफाखोर व्यवस्था की ओर न जाने पाये, जिसके कारण अमीरी-गरीबी की खाई बनी है और साल दर साल बढ़ती ही जा रही है, यह एक तथ्यात्मक सच्चाई है। क्या ‘सवर्ण गरीब’ ऐसा एक अलग वर्ग है, जिसका समाज की मुख्यधारा में प्रतिनिधित्व नहीं है और जिसे दलितों की तरह जन्म के कारण अपमानित किया जाता रहा है? यदि मान भी लें कि ‘सवर्ण गरीब’ एक सामाजिक वर्ग है भी, तो यह एक ऐसा सामाजिक वर्ग है जिसकी आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है, ऐसे में क्या 10 प्रतिशत ‘आरक्षण’ मात्र से इसकी गरीबी दूर की जा सकती है, या इस समूह का बढ़ना रोका जा सकता है? ऐसा नहीं है। जिन नीतियों की वजह से गरीबों का समूह बड़ा होता जा रहा है, उसे बदल कर ही गरीबी दूर हो सकती है। जैसे वर्णव्यवस्था में दलितों-पिछड़ों को सभी अवसरों से वंचित कर मुख्यधारा में आने से वंचित किया गया, तो आरक्षण इस वंचना को तोड़ने का काम करता है, वैसे ही लोेगों को उनके जीने के संसाधनों से वंचित कर उन्हें गरीब बनाया गया, तो उन संसाधनों को उन तक पहुंचाकर ही उनकी गरीबी दूर की जा सकती है। यानि लोगों को उनके प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जेदारी, और उनके श्रम का उचित मूल्य देकर ही गरीबी दूर की सकेगी, और किसी भी तरीके से नहीं। मुकेश अम्बानी, जिनकी बेटी की शादी का एक कार्ड तीन लाख रूपये का था, उनके पास इतनी रकम कहां से आयी? प्रकृति ने उन्हें अधिक धरती और अधिक आसमान तो नहीं दिया था।
जाहिर है सत्ता की इंसानकेन्द्रित की जगह मुनाफाकेन्द्रित नीतियों ने अम्बानियों, अडानियों और टाटाओं के पास दूसरों के हिस्से की सम्पत्ति को संकेन्द्रित कर दिया है, जिससे वे लगातार अमीर होते जा रहे हैं और बाकी गरीब। यहां खाई इसलिए है क्योंकि वहां पहाड़ है। अब तक की सरकारों ने गरीबों से जमीन, किसानों से खेत आदिवासियों से जंगल, पहाड़ नदी छीनकर इन्हें गरीब बनाया और मुट्ठी भर लोगों को अमीर। इन अमीरों के पूंजी के मुनाफे की हवस ने खेत, नदी जंगल पहाड़ के बाद श्रम करने का यानि रोजगार का अधिकार भी छीन लिया है। कहीं सरकारी नौकरी नहीं है और कॉरपोरेटों या प्राइवेट संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था लागू ही नहीं होती। ऐसे में सरकार सवर्णों की गरीबी दूर करने के लिए उन्हें वह देने का वादा कर रही है, जो वास्तव में है ही नहीं। यह भी एक अलग लेख का विषय है क्योंकि बेरोजगारी देश की ऐसी बड़ी समस्या बन गयी है, जिसका समाधान इन सरकारों के पास नहीं है। सवर्ण गरीबों को 10 प्रतिशत का आरक्षण वास्तव में इस बात का भी खुला एलान है कि इस व्यवस्था के पास सबको देने के लिए शिक्षा और रोजगार नही है।
देश के सभी संसाधनों को कॉरपोरेट्स को सौंपकर मुट्ठी भर लोगों को अमीर और बाकी देशवासियों को गरीब बनाने की नीतियों पर चूंकि आज देश की सभी संसदीय पार्टियां चल रही है इसलिए बढ़ती गरीब बेरोजगारों की फौज इन सबके लिए एक बड़ी समस्या हैं, और इन सबका वोट बैंक भी, इसलिए एक-दो को छोड़कर सभी ने सवर्ण गरीब के आरक्षण का समर्थन किया है यह जानते हुए भी, कि यह आरक्षण असंवैधानिक है और छलावा है।
लोगों की गरीबी दूर करना और जातियों के रूप में पीछे छूट गये समाज को हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व देना, दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं और दोनों को अलग-अलग तरीके से हल किये जाने की जरूरत है। प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आरक्षण जरूरी है और गरीबी दूर करने के लिए आर्थिक नीतियों में बदलाव। सरकारें न तो प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को ठीक से लागू कर रही है न ही गरीबी दूर करने के लिए जन पक्षधर आर्थिक व्यवस्था ला रही हैं। बल्कि दमित जातियों व सवर्ण गरीब दोनों पर उसका दमन बढ़ता ही जा रहा है। सवर्ण गरीब को आरक्षण की घोषणा सरकार की अपने दमनात्मक चेहरे पर पाउडर लगाने की एक कोशिश ही है, लेकिन फासीवादी चेहरा इतना भद्दा होता है कि वह किसी भी मेकअप से नहीं छुपता सामने आ ही जाता है। कुछ इसे पहले देख लेते हैं, तो कुछ थोड़ी देर से।

सीमा आज़ाद, संपादक ,दस्तक ,इलाहबाद 
9 जनवरी 2019