पार्टी बदली है आईपीएस कल्लूरी की सत्ता नहीं :  उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

05 .01.2019
दो जनवरी को गृह (पुलिस) विभाग के आदेश के बाद छत्तीसगढ़ के बासी राजनीति में उबाल आ गया है। जो इस मुगालते में थे कि भाजपा के जाने से सत्ता में परिवर्तन हो गया है वे अब नाखुश होने लगे हैं। गृह विभाग के इस आदेश के तहत पुलिस महानिरीक्षक (प्रशिक्षण) एसआरपी कल्लूरी उर्फ शिवराम कल्लूरी (भापुसे 1994 ) पुलिस मुख्यालय, रायपुर को पुलिस महानिरीक्षक ईओडब्ल्यू एवं एसीबी रायपुर की नवीन पदस्थापना दे दिया गया है। इस घटना से छत्तीसगढ़ के सियासत में ठंड के मौसम में गर्मी लौट आई है। पत्रकार कमल शुक्ला ने कहा है कि 20 जनवरी तक अगर कल्लूरी को हटा कर उसके व फर्जी मुठभेड़ के आरोपी अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपराध पंजीबद्ध नही किया गया तथा बस्तर व नक्सली समस्या पर पूर्व घोषित नीति नहीं अपनायी गयी तो पत्रकारिता छोड़कर भूख हड़ताल पर बैठूंगा।

भगत सिंह ने कहा था, ‘मुझे विश्वास है कि आने वाले 15-20 सालों में ये गोरे मेरे देश को छोड़ कर जाएंगे। पर मुझे डर है कि आज जिन पदों पर ये ‘गोरे अंग्रेज’ विराजमान हैं, उस पर यदि ‘काले अंग्रेज’ विराजमान हो जाएंगे तो हमारी लड़ाई और भी कठिन हो जाएगी।’ भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद ‘गोरे अंग्रेज’ तो चले गये। पर जाते जाते वे सत्ता ‘काले अंग्रेजों’ को सौंप गये। फिर क्या था, सरकार बदली, झंडा बदला, रंगाई-पुताई के साथ राज-व्यवस्था को भी नया रंग रूप भी मिला, पर राजसत्ता का ढांचा वहीं का वहीं रहा। राजसत्ता का स्वरूप नहीं बदला। एक तरीका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज तीस-चालीस करोड़ अविभाजित भारतीयों को नियंत्रित करते थे। यह तंत्र ही विरासत के रूप में काले अंग्रेजों को प्राप्त हुआ। अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में शासकों का वर्चस्व राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये के सहभागी दलाल वर्ग का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा है।

लंबे शासनकाल में शासक वर्ग ही भारतीय समाज में उच्च एलिट वर्ग के रूप में स्थापित हुआ है। यह वर्ग ही शिक्षा, नौकरशाही, शासकों के सहयोगी समाजसेवकों अर्थात कांग्रेसी-भाजपा सत्ता के हर शीर्ष पर काबीज भी हुआ और 1947 में हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद भी शीर्ष पदों पर बना रहा है। इस पूरे व्यवस्था को बनाए रखने में कार्पोरेट जगत की अहम भूमिका पीढ़ियों से रही है तो स्पष्ट है, झंडा बदला पर डंडा वही का वही रहा। भारतीय समाज में मूलनिवासियों का वर्चस्व स्थापित नहीं हो सका। राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व आज भी अधूरा है। छत्तीसगढ़ में भाजपा के जाने के बाद कोई आमूल चूल बदलाव नजर नहीं आता दिख रहा है इसके पीछे कारण यही है।
राजसत्ता का चंद हाथों तक सिमटा रहना ही उसे भ्रष्ट बनाता है। हस्तांतरण के बाद पूरे तंत्र में कोई बदलाव नहीं होता है अर्थात यह व्यवस्था भ्रष्टाचार, गैर-बराबरी और शोषण की व्यवस्था का मूल कारण के रूप में बदल जाता है। पत्रकार कमल शुक्ला लिखते हैं कि ‘कल्लूरी, राजेन्द्र, जितेंद्र, मीणा, एलेसेला जिन्हें फांसी के फंदे तक पहुंचाने की जवाबदारी थी, इन्होंने खुद भूपेश बघेल के खिलाफ बयान ही नहीं बल्कि उन्हें जेल भिजवाने में भी कोई कसर नहीं की, उन्हें भी नक्सल समर्थक तक बताया। इन सभी को वापस सक्षम करने का गणित क्या है ? बस्तर पर नीति बनाते समय भी वहां के पत्रकारों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों से सलाह क्यों नहीं लिया गया ?’
कल्लूरी का पिछला रिकॉर्ड
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18 नवम्बर 2016 को भूपेश बघेल ने ट्यूट किया था कि कल्लूरी @drramansingh सिर पर बैठाए रखते हैं। एक अधिकारी को इतनी शह शक पैदा करती है। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए शशि भूषण लिखते हैं सवाल भूपेश बघेल से भी है कि दो साल पहले जो उनका बयान था, उस पर मिट्टी डालने की डील कितने में हुई है..? जो ‘शक’ था उसे मिटाने के लिए कितना मिला..? भ्रष्ट/अपराधी कल्लूरी को ट्रेनिग सेंटर से उठा कर भ्रष्टाचार निरोधक सेल का मुखिया बनाना ‘सर पर बिठाना’ है या कुछ और..? अपूर्वानंद लिखते हैं कि ‘छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री यह नहीं कह सकते कि इसके लिए वे नहीं उनकी सत्ता जिम्मेदार है कि कल तक जिसे वे हत्या, बलात्कार और अन्य प्रकार के उत्पीड़न का अपराधी ठहरा रहे थे आज उसी व्यक्ति को वे एक महत्वपूर्ण पद सौंप रहे हैं! सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं, भारत नहीं, भारत के बाहर भी उसके शुभचिंतक हतप्रभ और सन्न रह गए जब उन्होंने सुना कि छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने कुख्यात पुलिस अधिकारी कल्लूरी को आर्थिक अपराध विभाग और भ्रष्टाचार विरोधी विभाग में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर नियुक्त किया है।
राज्य के पुलिस प्रमुख ने इसे नियमित तबादला माना है। कल्लूरी कोई साधारण पुलिस अधिकारी नहीं हैं। आज के मुख्यमंत्री और कल के विपक्ष के नेता भूपेश बघेल ने अक्टूबर, 2016 में कल्लूरी को बर्खास्त करने की ही नहीं, गिरफ्तार करने की मांग तक की थी। और उस समय उन्होंने एक कार्टून जारी किया था। उच्चतम न्यायालय में सीबीआई ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘मार्च 2011 में सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में आदिवासियों के 252 घर जला दिये गये थे और यह काम विशेष पुलिस अधिकारियों ने किया था। इन गांवों में तीन आदिवासियों की हत्या हुई थी और महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया गया था।’
बर्खास्त न्यायाधीश प्रभाकर ग्वाल लिखते हैं कि ‘एसआरपी कल्लूरी के खिलाफ 120 बी, 302, 436, 458-460, 376, 376/511 आईपीसी और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम, एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत विचारण होगा और फांसी की भी सजा होगी। ऐसा इसलिये क्योंकि कल्लूरी आधा अपराध करने की बात तो स्वयं ओपनली कबूल किया है, आधा अपराध सीबीआई जांच रिपोर्ट में आ चुका है।’ पूरा काम, जब तक जज की हत्या न करें या जज अपना ईमान न बेचे तो जज स्वयं कर देगा? पत्रकार संतोष यादव ने दक्षिण कोसल से कहा कि ‘29 सितंबर 2015 को दरभा के बाडरीमह गांव वालों को छुड़ाने के बहाने पुलिस ने षड्यंत्र कर उन्हें बुलाया था। इनमें से पांच लोगों को गिरफ्तार कर थाने में बिठा दिया गया था। संतोष बताते हैं कि उस समय बस्तर के तत्कालिक आईजी एसआरपी कल्लूरी ने मुठभेड़ में मार गिराने के लिए दो बोलेरो गाड़ी पुलिस उन्हें जंगल की ओर ले गए थे।
लेकिन इस बीच किसी तरह वे प्रेस को सूचना भेज देते हैं और इससे पुलिस महकमें में हड़कम मच जाती है और उनकी जान बच जाती है। उसके बाद संतोष को आनन फानन में झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज दिया गया, जबकि उनका कहना है कि नक्सलियों से उनका कोई संबंध नहीं है और न ही वे दरभा घटना के वक्त वहां पर मौजूद रहे हैं। हिमांशु कुमार लिखते हैं कि ‘कल्लूरी ने सोनी सोरी के सामने टेबल पर 30 लाख नगद रख दिये और कहा कि रमन सिंह जी चाहते हैं कि आप धरना जुलूस और उनका विरोध करना बंद कर दें। सोनी सोरी ने कहा आप लोगों ने थाने में मेरा शरीर खराब कर दिया। मेरे पति की हत्या कर दी। मेरा परिवार बर्बाद कर दिया। अब इस 30 लाख रुपयों को लेकर मैं क्या करूंगी? रमन सिंह जी से कहिएगा लड़ाई जारी रहेगी।
भ्रष्टाचार में नाक तक डूबा हुआ भ्रष्ट ऑफिसर एसआरपी कल्लूरी को कांग्रेस सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधक सेल का मुखिया बनाया है। कल्लूरी को आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने एंटी करप्शन ब्यूरो का चीफ अपॉइंट किया है। मैं चिंतित हूं हताश और दुखी भी हूं। अगर हम हिमांशु के एक और बात का उल्लेख करे जिसमें जेल में बंद अधिवक्ता सुधा भारद्वाज ने उनसे कहा था कि जब कोई सरकार में शामिल होने जाता है तो वहां दरवाजे पर एक सांचा रखा होता है। वह सांचा हर अंदर जाने वाले का मुंह बंदर का बना देता है। इसलिए सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने। आपको वहां हमेशा एक जैसे बंदर ही दिखाई देंगे।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के रिपोर्ट में आईपीएस कल्लूरी
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बस्तर में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां विषय पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के एक तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं जिसमें मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा भी शामिल थे में उल्लेख है कि 8 फरवरी, 2016 को मालिनी सुब्रमण्यम के घर पर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया। वे स्क्रोल डॉट इन के लिए खबरें लिखती है और इंटरनेशनल कमेटी ऑफ दि रेड क्रॉस (आइसीआरसी) की पूर्व प्रमुख है। जैसा कि मालिनी ने तथ्यान्वेषी दल को बताया, उनके घर पर सुबह के वक्त हमला हुआ। मालिनी ने पाया कि उनके जगदलपुर आवास के बाहर पत्थर बिखरे हुए थे और उनकी गाड़ी की खिड़की की कांच टूटा हुआ था।
उनके मुताबिक हमले से पहले करीब 20 लोग उनके घर के बाहर जमा हुए और नारे लगाने लगे। नक्सल समर्थक बस्तर छोड़ो मालिनी सुब्रमण्यम मुर्दाबाद। उन्हें शक है कि हमले में भी यही लोग शामिल रहे होंगे। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक उनका लिखा एकतरफा होता है और वे हमेशा माओवादियों से सहानुभूति जताती है। यही आरोप सामाजिक एकता मंच ने भी लगाया। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक मंच को चलाने वाले वे लोग हैं जो माओवादियों के विरोधी हैं हालांकि जगदलपुर और रायपुर के पत्रकारों का कहना था कि मंच को पुलिस सहयोग और पैसा देती है। इनमें से कुछ ने बताया कि पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी इस मामले में सीधे लिप्त हैं।
हालिया मामला बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल ने रिपोर्ट किया था जिन्हें धमकी मिलने के बाद बस्तर छोड़कर जाना पड़ा था। आलोक छत्तीसगढ़ से बीबीसी हिंदी के लिए लिखते हैं। वे खबर करने के लिए बस्तर गए थे और बस्तर के आइजी कल्लूरी व पुलिस अधीक्षक नारायण दास से मिलने की कोशिश कर रहे थे। कई कोशिशों के बाद उन्हें आइजी की ओर से यह संदेश मिला, ‘आपकी रिपोर्टिंग बहुत एकतरफा और पूर्वाग्रहग्रस्त होती है। आप जैसे पत्रकारों पर अपना समय खर्च करने का कोई मतलब नहीं है। मेरे साथ मीडिया और प्रेस का एक राष्ट्रवादी और देशभक्त तबका खड़ा है और वह मेरा समर्थन भी करता है। बेहतर है कि मैं उन्हें वक्त हूं। शुक्रिया।’ इधर छत्तीसगढ़ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज के अध्यक्ष डा. लाखन सिंह ने राज्य सरकार द्वारा दागी पुलिस अफसरों, विशेषकर एसआरपी कल्लूरी, की प्रमुख पदों पर नियुक्ति पर चिंता जताई है, जिनकी मानव अधिकार मुद्दों पर खराब और विवादस्पद भूमिका लोकप्रसिद्ध है।
पीयूसीएल का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के पिछले 15 वर्षों के शासन काल में मानव अधिकारों के हनन चरम सीमा पर पहुंच गए थे, फिर भी भाजपा सरकार ने इस दागी पुलिस अफसरों को सक्रिय ड्यूटी से दरकिनार कर दिया था। क्योंकि स्थापित मानव अधिकार संस्थानों ने इनके कारनामों पर संदेह जताया था। लाखन सिंह कहते हैं कि पीयूसीएल प्रदेश में नव-निर्वाचित सरकार के इस फैसले से चिंतित है कि कुछ कुख्यात पुलिस अफसरों को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गयी हैं। कुछ ही महीनों पहले तक वर्तमान मुख्यमंत्री कल्लूरी को ताड़मेटला मुठभेड़ में हत्या और बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे, और आज उन्हीं का ईओडब्ल्यू और एसीबी विभागों के नए आईजी के रूप में स्वागत किया जा रहा है-एक ऐसे पद पर जिसमें सत्यनिष्ठा और ईमानदारी की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
लाखन सिंह कहते हैं कि राज्य सरकार के ऐसे फैसले एक गलत सन्देश देते हैं कि कांग्रेस पार्टी मानव अधिकारों और खास कर अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इन दागी पुलिस अफसरों द्वारा मानव अधिकार हनन पर एक विस्तृत दस्तावेजीकरण पेश करेंगे, जिसमें सलवा जुडूम को व्यवस्थित समर्थन और भौतिक सहयोग देना शामिल है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी और गैरसंवैधानिक घोषित किया था, मानव अधिकार रक्षकों, सामाजिक और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों और बुधिजीवियों को आपराधिक धमकी देना, फर्जी मुकदमों में फंसाना, यहां तक कि महिला वकीलों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ गाली-गलौज करना, यौन उत्पीड़न के लिए उकसाना, अपराधिक और फासीवादी तत्वों को संरक्षण और तार्किक समर्थन देना, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग आदि जैसी संवैधानिक संस्थानों के प्रति घोर उपेक्षा का प्रदर्शन करना शामिल है।
जेल में बंद अधिवक्ता सुधा भारद्वाज ने अपनी पुस्तक ‘बर्बरतम विस्थापन बहादुराना प्रतिरोध’ में लिखा है कि हिन्डालको के हाथों अब तक 200 आदिवासी परिवार अपनी जमीन खो चुके हैं और यह सिलसिला अभी जारी ही है। हालांकि कहने को एग्रीमेन्ट बनाया गया है, जिसमें कहा गया है कि जहां तक व्यवहारिक हो, जमीन को उसके मूल हालात में वापस किया जाएगा, लेकिन वास्तव में किसी भी तरह का किराया नहीं दिया जा रहा है और रोजगार के नाम पर हर परिवार से एक व्यक्ति को निम्न आय के ठेकेदारी मजदूर का काम दिया जाता है। इन भूमिहीन खदान श्रमिक आदिवासियों में भारी असंतोष व्याप्त है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पूर्व एसपी कल्लूरी का खासमखास कुख्यात एसपीओ धीरज जायसवाल, जो कि नक्सलवादियों से लडने के नाम पर अनेक हत्याओं और बलात्कार का आरोपी है, हिन्डालको के गुण्डे के रूप में दोहरी ड्यूटी करता है, मजदूरों को काबू में रखने के लिए कंपनी की जीप में घूमता नजर आता है।’
आईपीएस कल्लूरी की पूरी उपलब्धि
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मार्च 2011 में कोया कमांडो, कोबरा और विशेष पुलिस अफसरों ने तीन गांव-मोरपल्ली, ताड़मेटला और थिम्मापुरम पर कहर बरपाया। तीन गांववासी मार डाले गए । 300 घर जला दिए और तीन औरतों के साथ बलात्कार भी किया गया। यह अभियान पुलिस की बड़ी सफलता के रूप में देखा गया जो एसआरपी कल्लूरी के आदेश पर हुआ था जो उस दौरान दंतेवाड़ा का पुलिस अधीक्षक था। कल्लूरी अपने बुरे कारनामों के लिए कुख्यात है । जब वह सरगुजा का पुलिस अधीक्षक था उस समय लेधा बाई नामक एक आदिवासी औरत ने उस पर बलात्कार का आरोप लगाया था। लेधा बाई ने मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में कहा था कि न केवल कल्लूरी ने उसके साथ बलात्कार किया बल्कि अपने मातहत काम करने वालों को कहा कि वे उसके साथ रोज सामूहिक बलात्कार करते रहें। लेधा बाई ने उसके खिलाफ 2006 में केस दायर किया था पर दबाव में आकर केस वापस लेना पड़ा और तब से वह लापता है।

ताड़मेटला और उसके आसपास के गांवों में हुई हिंसा को लेकर कई तथ्यान्वेषी रिपोर्ट के बाद जांच का काम केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौपा गया और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए कल्लूरी का तबादला कर दिया गया। पर जब जांच चल ही रही थी उस दौरान कल्लूरी को 2013 में राष्ट्रपति का पुलिस मैडल विशिष्ट सेवा के लिए दिया गया। उसके बाद जून 2014 में कल्लूरी को पदोन्नत करके बस्तर रेंज का पुलिस महानिरीक्षक नियुक्त कर दिया गया। अक्टूबर 2016 में केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने अपनी अंतरिम जांच रिपोर्ट पेश की, जिसमें उसने सुरक्षा बलों को 160 घर जलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया और यह भी कहा कि पुलिस ने झूठ बोला था कि ये घर नक्सलियों ने जलाए हैं। रिपोर्ट में इस घटना में 323 विशेष पुलिस अफसरों और पुलिसकर्मियों तथा 95 सीआरपीएफ/कोबरा कर्मियों की संलिप्तता के प्रमाण होने का दावा किया गया है।

कल्लूरी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से इस अभियान के लिए जिम्मेदार होने की बात कबूल की है। पर उसे दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट के न्यायालय में पेश होने के कुछ दिनों बाद ही कल्लूरी को छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत के लिए आमंत्रित किया गया था। यह साफ दर्शाता है कि कंपनियों के लिए बर्बरता से गांव खाली कराने और उसके लिए यौन हिंसा के इस्तेमाल को सरकारी मान्यता प्राप्त है। निर्दोषों को जेल से छोड़ने व माओवादियों से बातचीत के खबरों के बीच नारायणपुर पुलिस अधीक्षक इंदिरा कल्याण एलेसेला की नियुक्ति जिन्होंने सुकमा एसपी रहते हुए कहा था कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सड़क पर कुचल देना चाहिए तथा भ्रष्ट आचरण से शुमार कल्लूरी की जिम्मेदार पुलिस पद पर ताजपोशी से मानवाधिकार हनन के लिए कुख्यात बस्तर और छत्तीसगढ़ दोबारा देशभर में चर्चाओं में हैं। अगर बस्तर सहित छत्तीसगढ़ को मात्र माओवादियों और सरकार के बीच की लड़ाई के रूप में सीमित नहीं रखना है तो स्वतंत्र संगठनों, लोक अधिकार समूहों और पत्रकारों को इस इलाके में सक्रिय रहना जरूरी है। इसके साथ ही हमें उतावले में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। सभी को अपने भावनाओं पर काबू रखते हुए संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा।
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