सबरीमाला ःः पितृसत्ता पर ढलक आए पत्रकार शजीला के आंसू. शाबास, पत्रकार शजीला-अली-फातिमा अब्दुलरहमान : उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

5.01.2019
आपने एक दृश्य देखा होगा केरल में मंदिर प्रवेश को लेकर लाखों महिलाओं ने दो आंदोलनकारी महिलाओं के समर्थन में हाथ ऊपर कर समर्थन कर रहे थे। ये लाखों हाथ महिलाओं के ऊपर तमाम अत्याचारों के साथ पितृसत्ता रूपी शोषण का प्रतिकार है। आपको मालूम हो कि जब केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे ठीक उसी वक्त एक और तस्वीर आपके नजरों के सामने से होकर गुजरी होगी? यह तस्वीर कैराली टीवी की बहादुर फोटो-जर्नलिस्ट ‘शजीला-अली-फातिमा अब्दुलरहमान’ की है।
जो फोटो पत्रकारिता करते हुए तमाम पुरूषों के अत्याचारों के खिलाफ अपने ड्यूटी में पहाड़ की तरह खड़ी है। इस आंदोलन में एक नया मोड़ उस वक्त आया जब साल के पहले दिन छह लाख महिलाओं ने पूरे राज्य में एक मानव दीवार बनाई। इसके एक दिन बाद, बुधवार की सुबह साढ़े तीन बजे बिंदु और कनकदुर्गा नाम की दो आंदोलनकारी महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए। इस घटना के विरोध में अगले दिन से मंदिर परिसर के नजदीक और केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में संघ परिवार, भाजपा ने संगठित विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया और मंदिर के पुजारियों ने मंदिर शुद्धिकरण का नाटक रचा।
हालांकि मैं शोषण का द्वार मंदिर के प्रवेश के विवाद में ना जाते हुए इतना कहना चाहता हूं कि केरल में संघर्षरत महिलाओं का इतिहास संघर्षों का इतिहास है विशेषकर पुरूषवर्गों द्वारा शोषण का यहां लंबा इतिहास है। इतिहास में यहां महिलाओं ने स्तन ढंकने के लिए जोरदार संघर्ष को अंजाम दिया है। इस सिलसिले में नंगेली की कहानी आपने सुन रखी होगी। नंगेली ने स्तन ढंकने के अधिकार के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे। ब्राह्मणवर्णियों का शोषण इतना चरम पर था कि अछूत महिलाओं को उनके स्तन न ढंकने पर ब्रेस्ट टैक्स देना पड़ता था। केरल के हिंदुओं में जाति के ढांचे में नायर जाति को शूद्र माना जाता है जिनसे निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता है।
मनुवाद और ब्राह्मणवाद का यह ऐसा दुखद काल था कि एक औरत को उसकी जाति के आधार पर उसके स्तन तक को ढंकने नहीं दिया यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते है।और अब उसके नुमाइंदे संघ और भाजपा के महिलाओं के प्रदर्शन के खिलाफ जुड़ी एक तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। जिसमें कैराली टीवी की फोटो-जर्नलिस्ट शजीला को फोटो पत्रकारिता करने से पहले संघ के कार्यकर्ता घेर कर डराने-धमकाने की कोशिश किया है। बताया जा रहा है कि उनके कार्य करने के दौरान दक्षिणपंथियों ने शजीला को पीछे से लात भी मारी। आपको जानकार हैरत होगी कि जिस समय शजीला पर ये शारीरिक हमले हो रहे थे ठीक उस समय वे बिना टस से मस हुए अपने कैमरे से विरोध-प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग कर रहीं थीं।

मीडिया में वायरल तस्वीर में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि शजीला की आंखों से आंसु उनके गालों तक उतर आए हैं, फिर भी शजीला महिलाओं के अधिकारों को अपने कैमरे में कैद करते हुए रोते हुए अपना काम पूरी कर रही हैं। जो लोग यह मानते हैं कि पत्रकारिता आसान है उन लोगों के लिए यह दुखद घटना है लेकिन आखिर शजीला ने अपनी ड्यूटी पितृसत्ता के खिलाफ बखूबी निभाई। शजीला जैसे महिलाएं सदियों से सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ मोर्चा सम्हालते हुए आ रही है और लगातार सफलता उनके कदमों को चूम रही है।शजीला के रूप में उन लाखों महिलाओं ने संघर्ष के बदौलत अपने अधिकारों को प्राप्त करने का रास्ता दुनिया को दिखा दिया है और धार्मिक अंधविश्वासियों के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल दिया है।

शजीला के रूप में भारतीय पत्रकारिता में सांप की तरह कुंडली मारकर बैठे पुरूष वर्चस्व के खिलाफ यह संदेश सदियों तक याद किया जाएगा। शजीला ने टीवी-18 को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि ‘मुझे जब पीछे से लात मारी गई तो मैं सदमे में थी।वो मेरे प्रोफेशनल कॅरियर का सबसे बुरा अनुभव था। मुझे नहीं पता कि वो लात मुझे किसने मारी, मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन काफी चोट लगी। मैं दर्द से कराह रही थी, उन हमलावरों ने मुझसे मेरा कैमरा छीनने की कोशिश की लेकिन मैंने उसे बचाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। इस सब में मेरी गर्दन में भी चोट आयी। मैं डर के कारण नहीं रो रही थी, बल्कि बेबसी के कारण रो रही थी। मैं बीजेपी से डरती नहीं हूं। मैं आगे भी बीजेपी के प्रदर्शनों को कवर करते रहूंगी।’ सोशल मीडिया में रूचि रखने वाले तमाम पत्रकारों को जरूरत है कि इस बहादुर महिला के शोषण विशेषकर महिला पत्रकारों पर हो रहे शोषण की कहानी पूरी दुनिया के समक्ष प्रकाशित करे।
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