सलाम नसीर… ऐसे होते हैं रंगकर्मी… जैसे कि तुम हो… ःः राजेश चंन्द्र

सलाम नसीर… ऐसे होते हैं रंगकर्मी… जैसे कि तुम हो… वैसे नहीं...
, मौक़ापरस्ती और कायरता के जिन पुतलों से आज घिरे हैं हम… जिनकी वजह से ख़ुद को रंगकर्मी कहने में शर्म आती है… पर जब कोई नसीर बोल पड़ता है, तब लगता है कि हम जिन्हें रंगकर्मी कह देते हैं, असल में वे केंचुए हैं, चाहे उन्हें अकादमी पुरस्कार ही क्यों न मिल गया हो… क्या कहा है तुमने! हमें नाज़ है तुम्हारी इस बेबाक़ी पर।
“शुरुआत से ही हमारे संविधान का मूल लक्ष्य प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिये सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करना रहा है। यह हर किसी को विचार, अभिव्यक्ति, धार्मिक आस्था एवं विश्वास रखने की स्वतंत्रता देता है और सबके साथ एक समान बरताव करने का निर्देश देता है।
वे लोग जो न्याय और मानवाधिकारों की बहाली के लिये लड़ते हैं और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करते हैं, वे दरअसल हमारे ही संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त कर रहे होते हैं। लेकिन जो लोग आज हमारे अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें गिरफ़्तार कर जेलों में रखा जा रहा है। उनमें कलाकार, अभिनेता, विद्वान और कवि सभी शामिल हैं। यहां तक कि पत्रकारों को भी जेल भेजा जा रहा है।
आज धर्म के नाम पर नफ़रत की दीवारें उठायी जा रही हैं। निर्दोष लोगों की जान ली जा रही है। हमारा देश एक भयावह नफ़रत और क्रूरता का शिकार बन रहा है।
जो भी लोग इस अन्याय का विरोध कर रहे हैं उनके कार्यालयों पर छापे मारे जाते हैं, उनके लाइसेंस रद्द किये जाते हैं, उनके बैंक खाते ज़ब्त किये जाते हैं, उनकी आवाज़ दबायी जाती है, और यह सारा केवल इसलिये कि लोगों को सच बोलने से रोक दिया जाये। क्या हमारा संविधान ऐसा करने की इजाज़त देता है?
आइये इस नये साल के मौक़े पर हम अपने संवैधानिक मूल्यों के लिये उठ खड़े हों और भारत की इस सरकार से कह दें कि वह ऐसी कार्रवाइयों पर फ़ौरन लगाम लगाये।”
–नसीरुद्दीन शाह

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