तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़ 
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंध भी तोड़

 (अज़्म-शिकन- संकल्प भंग करने वाला  दग़दग़ा-ए-पंद -उपदेश की सम्भावना)
(कैफी आज़मी की नज़्म औरत से)

 
      नए साल की नई सुबह इंकलाब लेकर आई। ये इंकलाब आधी आबादी से आया है । अपनी लड़ाई लड़ने आखिर औरतें खुद सड़कों पर उतर आई हैं । सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए एक दो नहीं,सौ हज़ार नहीं , पचासों लाख औरतें तमाम भय और झिझक त्याग अपने हक और अपने स्वाभिमान के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के सम्मान  के लिए खुद सड़कों पर उतर आई हैं ।न किसी राजनैतिक पार्टी, न सामाजिक राजनैतिक संगठन, और न किसी बौद्धिक जमात ने सड़क पर उतरने की हिम्मत दिखाई। हम आप बस सोशल मीडिया पर ज्ञान बांटते रहे और वे जुझारू औरतें निकल आईं जंग के लिए ।

      एक ओर फासीवाद समर्थक, मनुवादी रूढ़ीवादी ताकतें और भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाने के साथ ही देश के संवैधानिक ढांचे को तार तार करने पर आमादा हैं । मनुवादी ताकतों की हिम्मत इतनी बढ़ गई वो कानून व संविधान को आंखें दिखाने लगी हैं । दूसरी ओर केरल में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा की सरकार भी कोई ठोस व कड़ा कदम उठाने की बजाय ढुलमुल तरीके से स्थिति पर नियंत्रण रखने की दिशा में काम करती दिखती रही । इनके खिलाफ अन्य कोई भी राजनैतिक पार्टी न तो स्पष्ट रुख दिखा पाई हैं और न कड़े कदम उठाने की हिम्मत ही दिखा पाई हैं ।कांग्रेस का रवैया भी इस मुद्दे पर भाजपा की तरह युद्धरत औरतों की के खिलाफ ही नजर आ रहा है ।यह बहुत अफसोस की बात है कि ऐसे मुद्दे पर कांग्रेस भी रुढ़ीवादी सोच के साथ ही खड़ी दिखाई दे रही है ।

वाम मोर्चे की सरकार संवैधानिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट का आदेश पालन करवाने के प्रयास में जरूर है मगर वाम मोर्चा संगठनात्मक स्तर पर साफ व स्पष्ट रूप से खुलकर औरतों के साथ नहीं दिख पा रहा है। कोई और राजनैतिक संगठन और न कोई बौद्धिक , सामाजिक या धार्मिक संगठन ही खुलकर मैदान में आने की हिम्मत कर सका है । छुटपुट विरोध कोई कारगर नहीं होता । हमारा तमाम बौद्धिक वर्ग सोशल मीडिया पर मिमियाते ही रहा। में ,आप और तमाम बुर्जुवाई बौद्धिक वर्ग सीधे तौर पर जमीनी लड़ाई में शामिल होने की बजाय सड़कों पर जूझ रही इन बहादुर औरतों के संघर्ष को बस सोशल मीडिया पर चस्पा कर इंकलाबी दिखने की होड़ में लगे रहते हैं। यह वर्ग न तो जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं बटोर पाता है और न खुलकर सामने ही आता है ।   

      तमाम घटनाओं से बहादुर व संघर्षरत औरतों को ये बात स्पष्ट रूप से समझ आ गई कि उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी । हमेशा से औरत ने अपनी आज़ादी की जंग अकेले ही लड़ी है । तमाम मुसीबतों और आदमियों के घोर जुल्म के खिलाफ हमेशा अकेले ही लड़ीं और सफल हुईं। सबरीमाला के पहले शनि सिगनापुर  और हाजी अली दरगाह की लड़ाई में भी वे अकेले ही लड़ी , और अब भी वे अकेले ही सड़कों पर निकल आईं हैं ।

     इधर भाजपा ने तो सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट को धता बताते हुए देश के संविधान को चुनौती दे दी है । इस चुनौती के पीछे एक और आशंका भी बढ़ गई है कि राम मंदिर पर फैसला यदि संघ , अन्य हिन्दू संगठनों और भारतीय जनता पार्टी की अपेक्षाओं और मन के खिलाफ जाता है तो वे उस समय भी यही करेंगे जो आज कर रहे हैं, शायद इससे भी बदतर करें, जो निश्चित रूप से सिर्फ उत्तर प्रदेश , केरल या एक प्रांत में नही होकर पूरे देश में फैलाकर किया जाएगा जो देश के संविधान, लोकतंत्र व सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न कर देगा ।
इस खतरे के खिलाफ, संविधान व लोकतंत्र की हिफाज़त के लिए आज ही संगठित होकर विरोध जताने आगे आना होगा । निश्चित ही ये लड़ाई आसान नहीं है । आज ये जुझारू औरतें बहादुरी के साथ अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर निकल आई हैं और कुछ ने तो तमाम बाधाओं को पार कर मंदिर प्रवेश भी कर लिया है मगर लड़ाई सिर्फ मंदिर प्रवेश की नहीं बल्कि औरतों की अस्मिता,गैरबराबरी और उनके आत्मसम्मान के साथ ही देश के संविधान को बचाने की है । सड़कों पर उतरी इन लाखों औरतों की हिम्मत,जज्बा और माद्दा एक नई राह दिखाता है । इस लड़ाई में दलीय भावना से ऊपर उठकर सभी संवेदनशील व लोकतंत्र समर्थकों को खुलकर मैदान में आना होगा। सदियों की मनुवादी मानसिकता और रूढ़ीवादी सोच के खिलाफ औरतों के इस संघर्ष में हमारी आपकी स्पष्ट व सक्रिय भागेदारी की सख्त आवश्यकता है । रूढीवादी दक्षिणपंथी ताकतें जो देश की संवैधानिक संस्थाओं को नेस्तनाबूद कर देना चाहती हैं उनके खिलाफ हमें खुलकर सड़कों पर आना ही होगा ।

जीवेश प्रभाकर