30.12.2018

जीवन में धार्मिक होना आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन जीने के लिए धर्म का इस्तेमाल व्यवसाय है। धर्म में पूंजी-निवेश धर्म का बाजारीकरण है और धर्म में सत्ता का प्रवेश धर्म का फासीवादीकरण है। धर्म मूलतः राजनीति का ही अंग है।

इलाहाबाद में माघ मेला हर साल आता है, अर्धकुम्भ छः साल पर और महाकुम्भ बारह साल पर। धर्म के इस पर्व पर देश भर से साधु-सन्यासी और आस्थावान लोग संगम के तट पर इकट्ठा होते हैं। हजारों लोग इस दौरान संगम किनारे बने तम्बू में रहकर कल्पवास करते हैं। धर्म के इस कार्य को सम्पन्न कराने के लिए हर साल इलाहाबाद प्रशासन के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार भी अपना योगदान करती है, करोड़ों रूपये का बजट इसके लिए आवंटित होता है। लेकिन इस बार मामला सिर्फ मेले को सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी तक नहीं सीमित है, बल्कि उत्तर प्रदेश के साथ केन्द्र की सरकार इसकी ‘प्रचारक’ बनी हुई है। इस बार का मेला हिन्दुत्व के प्रचार के साथ उसे अन्तरराष्ट्रीय बाजार में बेच मुनाफा कमाने का जरिया भी बन गया है। इस मेले में भक्तजन गाय की पूंछ पकड़, ब्राह्मणों को दान कर अपनी जीवन वैतरिणी पार लगाने का कर्मकाण्ड करेंगे, महाकुम्भ मेले की पूंछ पकड़कर मौजूदा सरकार अपनी चुनावी वैतरिणी पार करने की कोशिश में लगी हुई है। इस धार्मिक मेले की तैयारी में जितना पैसा लगाया गया है, उतना ही इसके प्रचार पर भी खर्चा किया गया है। अमेरिकी कम्पनियां, जो इलाहाबाद को ‘स्मार्ट’ बनाने के काम में लगी हैं, वही इस बार इस धार्मिक मेले में पूंजी निवेश कर अपनी मंदी दूर करने में व्यस्त और मस्त हैं। इस कारण से इस बार का मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यवसायिक और राजनीतिक आयोजन हो गया है।

 

कुछ लोग कह रहे हैं ‘‘धर्म का राजनीतिकरण हो गया है’’ यह सही नहीं है, क्योंकि धर्म अपने आप में एक राजनीति ही है। यह कहना ज्यादा ठीक है कि ‘‘राजनीति का धार्मिकीकरण’’ हो गया है, जो कि आर्थिक मंदी से उपजे समय की खास राजनीति होती है। ऐसा पहली बार हुआ है, कि कुम्भ मेले के आयोजन के महत्व को इतना ज्यादा बढ़ा दिया गया है कि इस बार इसकी व्यवस्था खुद मुख्यमंत्री की देखरेख में की जा रही है। वे कई बार इलाहाबाद आकर मेले का जायजा ले चुके हैं और आश्वस्त हो चुके हैं कि धर्म की नगरी बिक्री योग्य ‘प्रोडक्ट’ बन गयी है। योगी के आदेश पर इस बार संगम किनारे महीना भर कल्पवास करने वालों के तम्बू संगम से दूर अरैल घाट की ओर कर दिया गया है और संगम के नजदीक विदेशी सैलानियों के लिए आरामदायक फाइबर कमरे बनाये गये हैं। मुख्यमंत्री ही नहीं प्रधानमंत्री द्वारा भी कुम्भ की तैयारियों पर नजर रखने की बात बार-बार अखबारों के माध्यम से बताई जा रही है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह महीनों पहले से इलाहाबाद आ-आकर सन्यासियों-मठाधीशों के साथ बैठकें कर रहे हैं।

यह पहली बार हुआ है कि कुम्भ के पहले उसकी तैयारियों पर नजर डालने के लिए 70 देशों के राजनायिकों को प्रधानमंत्री के साथ इस धर्म नगरी में उतारा गया और संगम तट पर उन देशों के झण्डे फहराये गये, जैसे किसी अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में फहराये जाते हैं। यह हिन्दुत्व का महिमामण्डन और उसका कॉरपोरेटीकरण है। देश के संसाधन बेचने के बाद अब धर्म की बारी है। गंगा से इसकी शुरूआत पहले ही हो चुकी है। इस बार हर बार से अधिक विदेशी-देशी सैलानी भारत के नागाओं-औघड़ों-सन्यासियों और उनके कर्मकाण्डों को देखने आयेंगे, जो यहां बसे नगर में तो खर्चा करेंगे ही, साथ ही मठों में चढ़ावे भी चढ़ायेंगे। जब ये लाइनें लिखीं जा रहीं हैं, तो इलाहाबाद के राज्य विश्वविद्यालय में साधु-सन्यासियों का जमावड़ा ‘कुंभ आध्यात्म और बाजार’ विषय पर चर्चा कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे, कि ‘‘अगर हम आध्यात्म और सेवा को बाजार से जोड़ते हैं, तो कुंभ सफल होगा, क्योंकि बाजार कुम्भ का अंग बन चुका है।’’ नशे का कारोबार तो खैर मेले में हर बार ही आसमान पर पहुंच जाता है। तीनों की मन्दी यह मेला दूर कर देगा। सरकार के लिए इसीलिए यह मेला काफी फलदायी है। यही वजह है कि इस बार के अर्द्धकुम्भ को भी सरकार महाकुम्भ कहकर प्रचारित कर रही है, ताकि लोगों का जमावड़ा बढ़ सके और उसकी राजनीतिक-आर्थिक सभी मंशा पूरी हो सकें। सरकार यूं ही नहीं इसे ‘दिव्य कुम्भ’ कह रही है।

मेले का दूसरा पहलू यह है कि यह मेला मनुवादी वर्णव्यवस्था की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। शहर ही नहीं आस-पास के इलाकों से आये गरीब मजदूर जिनमें दलितों-पिछड़ों की संख्या ज्यादा है, मेला क्षेत्र को तैयार करने में अपना खून-पसीना बहायेंगे। नदियों के तट पर बसे इस अस्थाई शहर में बसे सन्यासियों, सैलानियों और सवर्ण भक्तजनों की टट्टी साफ करने के लिए दलित सफाईकर्मियों की पूरी फौज रोजगार के नाम पर तैनात कर दी गयी है। जाति से ब्राह्मण होने के नाते पंडितों की एक बड़ी फौज बिना किसी परिश्रम के लोगों से दान-दक्षिणा के रूप में धन बटोरने का काम करेगी। अनेक मठ और पण्डित लाखों का चढ़ावा लेकर सम्मानपूर्वक मेले से वापस लौटेंगे। फिर मेले की समाप्ति पर सन्यासियों, कल्पवासियों, व्यापारियों, साम्राज्यवादी कॉरपोरेटों का धार्मिक और अ-धार्मिक कचरा साफ करने के लिए दलित मजदूरों की एक टीम लगा दी जायेगी, जो गंगा-यमुना के क्षेत्र को फिर से पवित्र करने के काम में अपना पसीना बहायेंगे और इस काम के लिए अपवित्र माने जायेंगे। इन्हें इनके काम की न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलेगी, क्योंकि ये कुशल मजदूर नहीं हैं, न ही सरकार के स्थाई कर्मचारी हैं। फिर भी बेरोजगारी इतनी है कि वे खुश होकर इन्तजार करेंगे कि अगले साल मेला फिर से आये और उन्हें धार्मिक कचरा साफ करने का काम मिल सके।

वास्तव में महाकुम्भ इस बार धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हर बार से अधिक व्यवसायिक और राजनीतिक आयोजन है। इस बार अर्द्धकुम्भ का आयोजन फासीवादी निजाम के हाथ में आया एक अवसर है, जो जनता के दिमाग को पीछे और अपनी अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की राजनीति है। इसलिए ही यह ‘महाकुम्भ’ है।


सीमा आज़ाद