27.12.2018

जिन तीन राज्यों में कांग्रेस सोमवार को सत्तानशीं हुई है, उसने पार्टी ही नहीं, समग्र विपक्ष के लिए जहां एक ओर महागठबन्धन की उम्मीदों में प्राण फूंक दिये हैं, वहीं देश के राजनैतिक विमर्श को फिर से मूलभूत मुद्दों की ओर मोड़ दिया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि 2019 में होने वाला लोकसभा चुनाव 2014 की तरह एक बार फिर आर्थिक मसलों पर लड़ा जाएगा। आशंका है कि कुछ पार्टियां हताशा व पराभव के डर से राजनैतिक विमर्श को पुनः भावनात्मक मुद्दों की पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे, लेकिन विपक्ष और जनता को चाहिये कि बुनियादी मसलों पर अड़ी रहे क्योंकि जनसामान्य का विकास आर्थिक तौर-तरीकों से ही संभव है। देश इसमें सफल होता है या असफल, पता नहीं, लेकिन इसके प्रयास ज़रूर किये जाने चाहिये।

देश का राजनैतिक इतिहास देखें तो पाएंगे कि विकास और भावनात्मक मुद्दों को लेकर हमेशा ही कशमकश होती रही है। जवाहरलाल नेहरू के समय एकमात्र फोकस विकास पर था। उनके वक्त की चारों पंचवर्षीय योजनाएं विकास केंद्रित रहीं। उनके कार्यकाल में सोमनाथ का मंदिर जनता के पैसे से ही बना, जबकि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल इसका निर्माण सरकारी धन से कराना चाहते थे। यह नेहरू का दमदार फैसला था जिसने भारत विभाजन की आपदा से निकले व हिंदू-मुसलिम नफरत के चरम पर पहुंच चुके देश को सांप्रदायिकता की अधिक गहरी गर्त में गिरने से बचाया था। इंदिरा गांधी ने मार्च 1971 का लोकसभा चुनाव ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर जीता था। उन्होंने अपने आर्थिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते हुए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, रियासतों के प्रीवी पर्स समाप्त किये। बांग्ला देश युद्ध जीतने के बाद भी उनका फोकस आर्थिक कार्यक्रमों पर बना रहा। आपातकाल के बाद के चुनावों में नागरिक स्वतंत्रता व विपक्षी एकता आर्थिक मुद्दों पर भारी पड़ी। 1980 के बाद आई इंदिरा न तो शक्तिशाली थी, न ही उनके आर्थिक कार्यक्रम। 1989 में वीपी सिंह ने फिर से विकास कार्यक्रमों पर राजनीति करने की कोशिश की पर जल्द ही उनकी अल्पमत सरकार का फोकस आर्थिक अपराधों की जांच, मंडल आयोग, रामरथ की काट के उपायों पर केंद्रित हो गया। 1991 में बड़ा आर्थिक सुधार नरसिंह राव लेकर आए- उदारवादी अर्थव्यवस्था। उन्होंने पांच साल के कार्यकाल में इन्हें मजबूती दी। बाद के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे ही आगे बढ़ाया। कई भागीदार पार्टियों ने उनके हाथ बांध रखे थे। न्यूनतम साझा कार्यक्रम विकास केंद्रित ही था। 2004 से 2014 तक पीएम रहे अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां दीं। भारत व्यापक संभावनाओं का देश बना। बड़ी इकॉनामी में भारत का रूपांतरण हुआ। हालांकि उसके कई दुष्परिणाम भी हुए, जो अलग मुद्दा है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर मोदी सत्ता में आए थे। वे अपने भाषणों से साबित करते रहे कि कांग्रेस द्वारा किया गया विकास दोषपूर्ण है। वे आर्थिक विकास के उन्हीं वादों के जरिये जीते हैं, जिन पर पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार चल रहे थे। वैसे तो मोदी की ही नहीं, मनसोहन सिंह की भी पूरी आर्थिक नीतियां कार्पोरेटोन्मुखी रही हैं। दरअसल, 1991 के बाद की नई अर्थप्रणाली में किसी भी सरकार के लिये ऐसी गुंजाईश ही नहीं है कि वह पाश्चात्य देशों की बनाई व्यवस्था से हटकर कुछ कर सके। वाजपेयी के सामने भी विकास बनाम भावनात्मक मुद्दों वाली चुनौती थी- पर वे गठबंधन धर्म के निर्वाह के नाम पर भावनात्मक मुद्दों से हटकर आर्थिक मसलों में मशगूल रहे।

 

मोदी के पास विकास के नाम पर पूर्ण बहुमत आ गया, लेकिन उन पर मातृ संगठन आरएसएस, अनुषांगिक संगठनों व पार्टी कार्यकर्ताओं तथा औद्योगिक घरानों का दबाव तो है ही, उनकी मूल प्रवृत्ति भावनामूलक मुद्दों पर राजनीति ही नहीं, शासन करने की भी है। मोदी की अड़चन यह भी है कि उनमें न आर्थिक समझ है और न ही वे ऐसे लोगों की टीम खड़ी कर पाये हैं जो सही आर्थिक फैसले लेने में उनकी मदद कर सके। इसलिए विकास का उनका प्रारंभिक फोकस जल्दी ही बदल गया और उन्हें मिले भारी बहुमत का उपयोग वे देश के आर्थिक मुद्दों को सुलझाने की बजाय महत्वहीन मुद्दों पर करने लग गये।
वैसे तो नए रूप में आए नरेंद्र मोदी खांटी स्वयंसेवक और संघ की खास पसंद थे और उनके विकास आधारित प्रारंभिक बयानों से जनता प्रभावित भी हुई थी। हालांकि कांग्रेस व पाकिस्तान को निशाने पर लेने की उनकी अदा के साथ वक्तृत्वकला, ड्रेसिंग सेंस और सोशल मीडिया के बेहतरीन उपयोग ने उन्हें अभूतपूर्व मेंडेट दिलाया।

प्रारंभिक दो वर्ष के उनके दूध-भात कार्यकाल के दौरान उन्हें मनमर्जी काम करने का मौका दिया। वे स्वच्छता कार्यक्रम के तहत शौचालय निर्माण, बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, नमामि गंगे, जन-धन योजना, उज्ज्वला जैसी परियोजनाएं लेकर आए पर जल्दी ही एक-एक कर वे सारी सुपर फ्लॉप साबित होने लगीं। जल्दी ही इस बात का भी खुलासा होता गया कि इन सबका उद्देश्य अततः कार्पोरेट लॉबी को फायदा पहुंचाना ही है। देश व जनता को कोई भी लाभ नहीं मिल रहा है। साथ ही समांतर कार्यक्रम गाय-गोबर, लव जिहाद, जातीय व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी चलते रहे और मोदी का उन्हें मौन समर्थन मिलता रहा। नोटबंदी और जीएसटी ने देश व नागरिकों की कमर तोड़ दी।

निहायत अयोग्य वित्त मंत्री और आर्थिक मामलों से अनभिज्ञ प्रधानमंत्री ने देश की आर्थिक व्यवस्था को तबाह कर दिया। सरकारी रिपोर्टें भी खिलाफ आने लगीं। स्थिति सुधारने की बजाय वे संगठन के जरिये भावनात्मक मुद्दों को उभारने व विपक्ष पर व्यक्तिगत हमले करने में लगे रहे।
वैसे तो हमारे किसानों व गांवों की तबाही की शुरुआत 1991 से ही होने लग गई थी पर पिछले करीब डेढ़ दशक से इसमें अतिरिक्त सघनता आई। शहरीकरण, औद्योगीकरण, विस्तार, बांधों आदि के कारण हमारे गांवो की उपजाऊ ज़मीनें अधिग्रहित हो गईं। गांवों और खेती के दम पर उद्योग व व्यवसाय फलने-फूलने रहे। इस मामले में पुरानी सरकारों सहित वर्तमान भाजपा प्रणीत केंद्र सरकार ने किसानों को बड़ा ही बुरा धोखा दिया। समर्थन मूल्य जो घोषणापत्र में दिया था, वह नहीं मिला। खेती बरबाद होती गई, किसान कर्जों में डूबते चले गये। उनकी ज़मीनें बिकने लगीं। किसानों की आत्महत्याओं के मामले बढ़ गये।

वैसे तो कांग्रेस ने भाजपा को हराने और आगामी चुनावो के मद्देनज़र यह फैसला लिया गया है, पर इसकी देखा-देखी अब केंद्र की भाजपा सरकार ने भी देश भर के किसानों के कर्जे माफ करने का ऐलान किया है। प्रतिस्पर्धा में ही सही, इसी बहाने अगर किसानों के दिन बहुरते हैं तो कोई बुराई नहीं है। कुछ सकारात्मक घटनाक्रमों के तहत किसान संगठित होते गये। पिछले दिनों किसानों के कई बड़े व सफल मोर्चें निकले क्योंकि उनके सामने-जीवन मरण का सवाल था। आज वे एक बड़ी ताकत के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस ने किसानों की ताकत को भांपकर ही उनकी लड़ाई को समर्थन दिया है। कर्ज माफी व समर्थन मूल्य की लड़ाई को किसान संगठनों, विपक्षी दलों व जनता ने बड़े अंजाम तक पहुंचाया है। शायद विपक्ष में रहते राहुल का ध्यान वोट बटोरने की प्रक्रिया के तहत इसकी ओर गया होगा और तीन राज्यों में अपनी रणनीति का हिस्सा बनाते हुए उन्होंने बड़ा दांव खेला। राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में सफलता मिली व कर्ज मापी योजना को तत्काल लागू कर दिया गया। इससे कांग्रेस व राहुल की विश्वसलीयता बढ़ी है। कांग्रेस के लिए इसे सफल बनाना भी ज़रूरी है। यह लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

 

राहुल ने यह कहकर बाजी मार ली है कि “संपूर्ण कर्ज माफी तक वे मोदी को सोने नहीं देंगे।“ जैसी कि उन्होंने घोषणा की है, अब अगर मोदी कर्ज माफी करते भी हैं तो श्रेय राहुल ले जायेंगे। माना जायेगा कि मोदी ने यह कदम बचाव और कांग्रेस के दबाव में उठाया है। मोदी की विश्वसनीयता इस मामले में समाप्त हो चुकी है।

वैसे कृषि के साथ उद्योगों की दुर्दशा, बेरोजगारी आदि भी मुद्दे बनेंगे क्योंकि वहां भी यही हालत है। दुर्भाग्य, इस ओर ध्यान देने की बजाय मोदी अपनी छवि चमकाने, विदेशी दौरों में मशगूल हैं। कार्यकर्ताओं, सोशल मीडिया वार, ‘मन की बात’, आईटी फैक्ट्री के मनगढ़ंत किस्सों के जरिये वे आर्थिक विकास का बुलबुला पैदा करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं पर सचाई सबके सामने आ रही है।
जो हो, किसानों की कर्ज माफी ने आर्थिक मुद्दों को देश के राजनैतिक विमर्श को केंद्र में लाने की प्रक्रिया तो प्रारंभ कर ही दी है।

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डा. दीपक  पाचपोर ,वरिष्ठ पत्रकार 

देशबन्धु के 26.12.2018 के अंक मे प्रकाशित  आलेख