20.12.2018

अपनी बात शुरू करने से पहले मैं एक छोटा सा किस्सा सुनाना चाहता हूँ. मेरे साथ हाई स्कूल में पढ़ने वाला एक सहपाठी कोई चालीस साल के बाद मुझे अचानक ट्रेन में मिल गया. संयोग से हम दोनों ने ही एक-दूसरे को पहिचान लिया. मैंने पूछा, ‘तुम हाई स्कूल में मेरे साथ थे. फिर क्या पढ़ाई के लिए बाहर चले गए थे?’
उसने कहा, ‘नहीं. फिर पढ़ा ही नहीं.’
मैंने पूछा, ‘क्यों?’
उसने जवाब दिया, ‘मैं संघ में चला गया.’
‘संघ मतलब?’
‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में.’
‘ओह, फिर पढ़े क्यों नहीं?’
उसने गर्व से कहा, ‘संघ में पढ़ाई की क्या जरूरत? फिर संघ ही हमें पढ़ाता है.’

इस किस्से के प्रकाश में भगवा नेताओं के अजीबोगरीब बयानों को समझा जा सकता है. इसमें प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान कि पहली प्लास्टिक सर्जरी भारत में हुई, जिसने आदमी के धड़ पर हाथी का सिर लगाया था. किसी का यह बयान कि सीता का जन्म परखनली से हुआ था. यह बयान कि गाय के रंभाने की आवाज से मनुष्य के अनेक मानसिक रोग दूर हो जाते हैं, और यह कि एक तोला घी से यज्ञ करने पर एक टन आक्सीजन बनती है. और अब योगी आदित्य नाथ का यह बयान कि छुआछूत मुगलों ने दी है. इससे साफ़ समझा जा सकता है कि भगवा नेताओं को वाकई पढ़ाई-लिखाई की जरूरत नहीं है.

उनकी पढ़ाई-लिखाई संघ में होती है. संघ जो सिखाता है, वही उनकी पढ़ाई-लिखाई है. उसके सिवा उन्हें किसी पढ़ाई-लिखाई की जरूरत नहीं है. वे न इतिहास जानते हैं, और न विज्ञान. उनका इतिहास भी वही है, जो संघ बताता है, और विज्ञान भी वही है, जो संघ की प्रयोगशाला में समझाया जाता है. संघ उन्हें उसी तरह सिखाता है, जिस तरह पिंजरे में बंद तोते को उनका मालिक सिखाता है. तोते रट लेते हैं और फिर दिन भर उसी को दुहराते रहते हैं. संघ के तोते भी रटे हुए हैं, इसलिए रिकार्ड या सीडी की तरह सब जगह बजते रहते हैं. यह बयान योगी जी का नहीं है, आरएसएस का है. उसने अपने सभी विद्यार्थियों को यही इतिहास पढ़ाया है. अब आइए, देखते हैं कि सच्चाई क्या है?

 

आरएसएस ने, जो ब्राह्मणों का संगठन है, और भारत में हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मण राज कायम करना चाहता है, बहुत शातिर ढंग से मुसलमानों और ईसाईयों को बाहरी घोषित करके भारत में हिन्दू बहुसंख्यक का भ्रम पैदा कर दिया है, जबकि हजारों जातियों में विभाजित हिन्दुओं में कोई भी बहुसंख्यक नहीं है. पर इस भ्रम से उसका काम बहुसंख्यक के नाम पर हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ाने का है, जिसमें वह सफल हो रहा है. उसके हिन्दू राष्ट्र बनाम ब्राह्मण राज के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा दलित वर्ग है, जो डा. आंबेडकर की वैचारिकी से जुड़कर हिंदुत्व के लिए चुनौती बन गया है. छुआछूत की घटनाएँ भी इसी वर्ग के साथ होती हैं. आज भी बहुत से गांवों में दलित जातियों को घुढ़चढ़ी की इजाजत नहीं है, और उन्हें घुढ़चढ़ी से बारात निकालने के लिए अदालत या प्रशासन की मदद लेनी पड़ती है. आरएसएस के लिए इस वर्ग को साधना मुश्किल बना हुआ है.

इस मिशन में उसकी डा. आंबेडकर को हिन्दुत्ववादी और मुस्लिम-विरोधी बनाने की मुहिम भी काम नहीं आई, क्योंकि डा. आंबेडकर हिन्दू राज को हर कीमत पर रोके जाने की पहले ही चेतावनी दे चुके थे. अब आरएसएस के पास दलितों को अपने मिशन से जोड़ने का एक ही मार्ग था कि वह उन्हें यह बताए कि भारत में छुआछूत मुसलमानों की देन है. हालाँकि यह आरएसएस का अपना मिशन नहीं है, बल्कि आर्य समाज का है. आर्य समाज ने सफाई कर्मचारियों को ऋषि वाल्मीकि से जोड़कर उन्हें स्वामी अछूतानन्द और मंगू राम के आदि धर्मी आन्दोलन से अलग करने में सफलता प्राप्त कर ली थी. इसमें अमीचंद शर्मा नाम के एक ब्राह्मण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसका आधुनिक अवतार बिदेश्वर पाठक हैं.
आरएसएस इस तरह के सारे मिथ्या इतिहास-पाठों का प्रयोग चुनावों के दौरान भाजपा के पक्ष में हिन्दू-मुस्लिम भड़काने को लिए करता है. इसलिए उसके रट्टू तोते चुनावों के मौसम में सक्रिय हो जाते हैं. योगी का यह बयान इसी साजिश के तहत आया है कि छुआछूत मुगलों से आई है. अब चूँकि योगी जैसे जाहिलों से कोई पलटकर सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करता, इसलिए उनका अनर्गल प्रलाप करने का दुस्साहस बढ़ता जाता है.

योगी जैसे लोग निराधार बयान देकर दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि दलित जातियां छुआछूत के लिए हिन्दुओं को दोषी न मानें, बल्कि मुसलमानों को अपना दुश्मन समझें. क्यों भई, मुसलमानों को वे अपना दुश्मन क्यों मानें? अगर वे छुआछूत के लिए जिम्मेदार होते, तो मुसलमान आज भी छुआछूत कर रहे होते. पर मुसलमानों में कोई छुआछूत नहीं है. यह सच्चाई है कि जो कौम जिस चीज को माना करती है, वह उस को लागू भी करती है. हिन्दू कौम छुआछूत को मानती है, इसीलिए वह उसे अपने यहाँ लागू करती है. यदि, मुसलमान छुआछूत मानते होते, तो दलित-मुसलमानों की बस्तियां पास-पास नहीं हो सकती थीं, जो किसी भी शहर की सबसे बड़ी सच्चाई है. अगर वे छुआछूत मानते होते, तो मुस्लिम बहुल इलाकों में दलितों का जीना दूभर हो गया होता. पर इसके विपरीत दलितों का जीवन हिन्दुओं ने दूभर कर रखा है. देश भर में दलितों के साथ छुआछूत और जातीय भेदभाव की जितनी भी घटनाएँ हुई हैं और होती हैं, वे हिन्दुओं द्वारा ही की गई हैं और की जाती हैं. क्या संघ परिवार के योगियों से यह पूछे जाने की जरूरत नहीं है कि अगर छुआछूत मुगलों से आई, तो हिन्दुओं ने उसे क्यों अपनाया? सच तो यह है कि हिन्दू समुदाय के संस्कार में ही छुआछूत है, जो उसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. अगर छुआछूत मुगलों का संस्कार था, या है, तो वह हिन्दुओं का संस्कार कैसे बन गया? हिन्दुओं में तो आज भी किसी भंगी-चमार को किराए पर कमरा नहीं मिलता है, जबकि मुसलमान घरों में आसानी से कमरा मिल जाता है. किसके संस्कार में है छुआछूत?

कुछ साक्ष्य इतिहास से भी उल्लेखनीय हैं, हालाँकि संघ परिवार अपने गढ़े गए इतिहास को ही मानता है. फिर भी इतिहास के जिन तथ्यों को मैं दे रहा हूँ, उनको झुठलाने का साहस आरएसएस भी नहीं कर सकता. सबसे पहले मैं चंडाल शब्द की बात करता हूँ. क्या योगी या आरएसएस का कोई नेता यह बतायेंगे कि मुगलों ने चंडाल किस काल में बनाए थे? किसी के पास भी इसका जवाब नहीं होगा, क्योंकि इतिहास के जिस काल खंड में चंडाल आते हैं, उसमें मुगल क्या, सल्तनत काल का भी अस्तित्व भारत में नहीं था. डा. विवेकानंद झा ने अपने शोधपत्र ‘चंडाल और अस्पृश्यता का उद्भव’ में, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की शोध पत्रिका ‘इतिहास’ के जनवरी 1992 के अंक में प्रकाशित हुआ था, लिखा है, ‘तीसरी से छठी सदी ई. के ब्राह्मण परम्परा की विष्णु, याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति और कात्यायन स्मृतियों से अस्पृश्यता के पालन के विस्तार के प्रमाण मिलते हैं और इस काल में चंडाल की स्थिति में और भी गिरावट आई. इसी काल में हमें ‘अस्पृश्य’ शब्द का प्रथम प्रयोग भी देखने को मिलता है. विष्णु ने इसका प्रयोग दो स्थलों पर किया है. अस्पृश्य योनि में जन्म लेने का कारण मलिन कर्म करना बताया गया है, और किसी अस्पृश्य द्वारा जानबूझकर किसी द्विज का स्पर्श करने के लिए मृत्यु दंड का विधान किया गया है—अस्पृश्य: कामकारेण अस्पृश्यं स्पृशंवध्य:’ (पृष्ठ 29)
क्या ये विष्णु, याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति और कात्यायन स्मृतियाँ मुगलों ने बनाई थीं? क्या मनुस्मृति का विधान भी मुगलों का बनाया हुआ है, जिसमें कहा गया है कि चांडालों के साथ कोई भी सामाजिक व्यवहार न करे, तथा चंडाल और श्वपच के रहने का स्थान गाँव के बाहर रहना चाहिए. (10/51-54) क्या यह छुआछूत नहीं है? जब इन स्मृतियों के विधाता मुसलमान नहीं हैं, ब्राह्मण हैं, तो फिर छुआछूत के लिए ब्राह्मण ही जिम्मेदार क्यों नहीं हैं?
एक साक्ष्य मध्यकालीन इतिहास से भी देख लिया जाए. यह वह काल है, जब भारत में मुसलमान आ गए थे, पर बादशाहत नहीं आई थी. यह कबीर का काल है. कबीर स्वयं भी मुसलमान थे. उन्होंने पाखंड और आडम्बरों को मानने के लिए ब्राह्मण और मुल्ला दोनों को फटकार लगाईं है. पर क्या कारण है कि छुआछूत को मानने के लिए उन्होंने ब्राह्मण को ही फटकारा है, मुल्ला को नहीं. यथा—

1. काहे को कीजे पांडे छोति विचारा, छोति हीं तैं उपजा सब संसारा.
2. पांडे बूझि पियहु तुम पानी,
3. जे तू बाभन बभनी जाया, आन बाट काहे नहिं आया.
इसका यही कारण है कि छुआछूत हिन्दुओं के संस्कार में थी, मुसलमानों के खून में नहीं. अत: हे आरएसएस के पंडों ! छुआछूत मुगलों से नहीं, ब्राह्मणों से आई है. इसके जनक भी ब्राह्मण हैं और प्रसारक भी.

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कंवल भारती 

देश के जाने माने विचारक