भेड़ियों_के_पूर्णावतार_की_पूर्णिमा_का_समय ःः राजेश जोशी

सबसे पहले आता है भेड़िया ;
अचानक छलांग मारकर जबड़ों में भींच लेता है स्वर-रज्जु, वोकल कॉर्ड। शक्तिभर जतन करता है कि जो भी आवाज निकले वह उसी की आवाज हो ;
उसके बाद आते हैं गीदड़ श्रृगाल पंक्तिबद्द, लोमड़ियों के साथ
फिर आते हैं जंगली बना दिए गए श्वान – जिन्हे कुत्ता कहना कुत्ते का अपमान होगा – एक के बाद एक आते हैं, सब आते हैं अपने अपने हिस्से का भोग लगाने
शुरू में वे शिशुओं पर वार करते हैं – उसके बाद मनुष्य, फिर मनुष्यता, तदुपरांत समाज और अंततः सभ्यता पर
इस बार वे आये हैं नसीरुद्दीन शाह के लिए !!

तर्क न वे करते हैं न सुनते हैं
तर्क और विधान, क़ानून और संविधान मनुष्य समाज के नियम हैं ; भेड़ियों से इनके अनुरूप चलने की अपेक्षा करना उनकी नस्ल के साथ विवेकसम्मत-तर्कसंगत-विधिमान्य व्यवहार नहीं होगा

झूठ बोलना तो इंसानी खब्त है
वे भेड़िये हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं ;
वे एक निहत्थे बूढ़े आदमी को आदर पूर्वक प्रणाम करके अगले ही पल फटाक से उसके सीने में तीन गोलियां उतार सकते हैं और उसके बाद उसकी मूर्ती के आगे शीश नवा सकते हैं
वे सरेआम दिन दहाड़े युवा गर्भवती माँ को मारकर उसकी कोख से निकाले सात माह के गर्भ को त्रिशूल पर लहराते हुए उसे विजय-ध्वजा बना सकते हैं
वे लोकतंत्र चबा सकते हैं, संविधान रौंथ सकते हैं, ईश्वर और भगवानों को चींथ सकते हैं
उनके दाँत और नाखून कालनिरपेक्षता और कुटुंब निरपेक्षता की ठंडी क्रूरता के इनेमल से चमचमाते रहते है ; इनकी पैनी धार से खुद उनके शिशु और वृद्ध भी नहीं बचते
कल वे आपके दरवाजे पर भी दस्तक देने वाले हैं

भेड़िये सिर्फ भेड़िये होते हैं, और वे हमेशा ही भेड़िये रहते हैं
अत्यंत “निस्पृह और निष्काम” होते हैं वे, देश तो छोड़िये, घर भी नहीं बसाते

यह भेड़ियों के पूर्णावतार की पूर्णिमा का समय है –
वे इसे भारत देश, उसके समाज और उसकी अब तक की अर्जित सभ्यता की अमावस बना देना चाहते हैं :
मगर एक छोटा सा पेंच है ; और वो ये है कि भेड़ियों के चाहने से ही सब कुछ नहीं होता

भेड़िये प्रकाश से, रौशनी से डरते हैं भेड़िये हुँकार से डरते हैं
वे मनुष्य की आवाज से भय खाते हैं
वे जागते, बोलते, सोचते, विचारते समाज के निकट नहीं फटकते

हाँ, इतिहास में यदाकदा दिख जाते हैं भेड़िये ; मगर भेड़ियों के खुद के कोई इतिहास नहीं होते, उनके उन्मूलन-निर्मूलन के जरूर होते हैं ।

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