नई सरकार की वादाखिलाफी पर जनांदोलन होंगे तेज़ सिविल सोसायटियों के नुमाइंदों की चेतावनी -डॉ. दीपक पाचपोर

देशबन्धु में प्रकाशित आभार सहित 

15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ में सियासती बदलाव के बाद भी प्रदेश में चल रहे विभिन्न जन आंदोलन और प्रगतिशील संघर्षों की राह कठिन बनी रहेगी। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल कर चाहे कांग्रेस पार्टी ने सूत्र सम्हाल लिये हों पर प्रदेश में चल रहे विभिन्न लोकसंघर्षों व जनवादी संगठनों, सिविल सोसायटियों के प्रतिनिधियों का मानना है कि अनेक मुद्दों पर आंदोलन जारी रहेंगे, क्योंकि प्रकारांतर से दोनों ही दल एक जैसे हैं। इसलिए, सत्ता व व्यवस्था के खिलाफ उनकी लड़ाइयां जारी रहेंगी। ऐसे ही कुछ जनांदोलनों के प्रतिनिधियों से बातचीत में यह तथ्य भी उभरकर सामने आया कि अगर नई सरकार ने जनांदोलनों की अनदेखी की तो उनके संघर्ष पूर्ववत जारी रहेंगे। जनांदोलनों से जुड़े अनेक नेताओं का मानना है कि नई सरकार को समय देना होगा। वे यह मानते हैं कि पिछली सरकार के समय जन आंदोलनों व मानवाधिकारों की न सिर्फ भारी अनदेखी हुई है बल्कि उन्हें कुचला भी गया है।

जन संगठनों को नई सरकार के प्रति कुछ संशय है, तो कुछ उम्मीदें भी। फिर भी, जो बात सभी ने कही वह यह है कि अगर मानवाधिकारों को कुचला गया और जन आंदोलनों की उपेक्षा हुई, तो संघर्ष नए सिरे से उठ खड़े होंगे।

देखेंगे नई सरकार का रवैयाः लाखन सिंह

पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़) के छत्तीसगढ़ अध्यक्ष डॉ. लाखन सिंह का विचार है कि पिछली सरकार नागरिक व मानवाधिकारों के प्रति अनुदार थी और नई सरकार बनाने जा रही कांग्रेस का रवैया कुछ बेहतर होते हुए भी अनेक मौकों पर जन आंदोलनों के खिलाफ रहा है। हालांकि कांग्रेस के कई नेता राज्य में चलाए गये विभिन्न जनसंघर्षों को बतौर प्रतिपक्ष समर्थन तो देते रहे हैं पर देखना यह है कि सरकार वनने के बाद कांग्रेस का रवैया क्या रहेगा। वे मानते हैं कि इस व्यवस्था में सभी राजनैतिक दलों का मूल चरित्र एक जैसा होता है पर दुर्भाग्यवश कम खराब व अधिक खराब का अंतर भी देखा जाता है। लाखन सिंह ने मांग है कि नई सरकार तत्काल जनसुरक्षा कानून वापस ले और पत्रकार सुरक्षा कानून को लागू करे।

सरकार से संवाद होः आलोक शुक्ला

प्रदेश के किसानों, आदिवासियों, श्रमिकों व मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले 22 संगठनों से मिलकर बने छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला को नई सरकार से इसलिए उम्मीद है कि कांग्रेस जन आंदोलनकारी संगठनों से बातचीत करने में विश्वास रखती है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। लोकतांत्रिक व सांवैधानिक दायरे में कांग्रेस से संवाद संभव है।

उनके अनुसार पिछली सरकार ने जनवादी मुद्दों को उठाने वाले संगठनों व व्यक्तियों को कुचलने व उनकी आवाज को दबाने का ही काम किया है। सरगुजा में तीन वर्षों तक धारा 144 लगाकर रखी गई थी। 15 सालों में आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण संबंधी नियमों की धज्जियां उड़ाई गई थीं। पिछले शासन काल में संवाद और अभिव्यक्ति का स्पेस पूरी तरह खत्म कर दिया गया था। उस दौरान कार्पोरेट्स और खदान मालिकों के लिए ही सरकार काम करती रही।

वे याद दिलाते हैं कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार ने ही लोक अधिकारों की सुरक्षा संबंधी कानून लागू किये हैं। उनका कहना है कि हम जानते हैं कि नई सरकार भी उद्योग-धंधों व व्यवसायियों के लिए काम करती रहेगी पर हमें उम्मीद है कि नियमों का पालन हो। पहले की भांति लालच व दमन के जरिये फर्जी जन सुनवाइयां न हों, ग्राम सभाओं की सिफारिशों को समाहित किया जाए। इनमें पारदर्शिता होनी चाहिये। हम जानते हैं कि गलत नीतियों के खिलाफ हमारी लड़ाई खत्म नहीं होने वाली है। दबाव समूह के रूप में हम अपनी भूमिका निभाते रहेंगे और जनवादी व मानवाधिकार संबंधी संघर्षों को जारी रखेंगे। यह ज़रूर है कि हमें नई सरकार को कुछ समय देना होगा।

कांग्रेसःभाजपा का चरित्र एकः बख्शी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कंट्रोल कमेटी (सीसीसी) के सचिव व प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य सीआर बख्शी का कहना है कि वैसे तो भाजपा के पराभव से पार्टी खुश है पर हम अनेक मुद्दों को लेकर पहले की तरह संघर्षरत रहेंगे क्योंकि हम जानते हैं कि दोनों (भाजपा-कांग्रेस) बुर्जुआ पार्टियां हैं, जो जनता के दमन के मामले में एक सा चरित्र रखती हैं। सीपीआई का कांग्रेस के प्रगतिशील कदमों को सहयोग मिलता रहेगा, लेकिन गरीबों, दलितों, आदिवासियों व .कमज़ोर वर्गों को उनका न्याय दिलाने तथा उन पर होने वाले अन्याय के खिलाफ पहले की ही तरह लड़ती रहेगी।

श्री बख्शी ने कहा कि चुनावी घोषणापत्र के अनुसार कांग्रेस किसानों की निर्धारित अवधि में कर्जमाफी करे। इसके लिए भी उनकी पार्टी संघर्ष करेगी। उनका यह भी कहना है कि वैसे तो नई विधानसभा में हमारा कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं होगा, लेकिन अनेक मसले हैं जिन्हें लेकर हम पहले की तरह सभी उपलब्ध मोर्चों पर संघर्ष करते रहेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के द्वारा आदिवासियों व दलितों का काफी दमन हुआ है। नक्सली होने के झूठे आरोप लगाकर निर्दोष आदिवासियों को जेलों में डाला गया है। नई सरकार से हमारी मांग है कि उनकी तत्काल रिहाई हो। ऐसे ही, आदिवासियों के लिए बने विशाखा कानून, वन अधिकार कानून, शेड्यूल-5 आदि का सही पालन नई सरकार को सुनिश्चित करना होगा, अन्यथा हमारी पार्टी व समान सोच की शक्तियां आंदोलन को तीव्र करेंगी। हम इन सुद्दों पर राज्य सरकार पर दबाव वनाते रहेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी प्रदेश में हुईं अपनी चुनावी रैलियों में इस बात का भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार आने पर आदिवासियों के हकों की सुरक्षा होगी।

हमारे मुद्दों पर जीती है कांग्रेसः ठाकुर

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष जनकलाल ठाकुर का विचार है कि जो लोग व संगठन जनसंघर्ष में रत हैं, वे व्यवस्था में परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि यह सत्ता में बदलाव मात्र है। कांग्रेस की जीत उन्हीं मुद्दों के आधार पर हुई है जो हम विभिन्न जनांदोलनों के माध्यम से लंबे समय से उठाते आए हैं। इन्हीं मांगों को पूरा करने का आश्वासन उसने दिया है, वह चाहे फसलों का वाजिब समर्थन मूल्य हो या किसानों की कर्जमाफी। शिक्षाकर्मी, आंगनबाड़ी सहायिकाएं, स्वास्थ्यकर्मी, सफाई कर्मचारी, आदिवासी, किसान, दलित आदि वर्ग अपनी मांगों को लेकर संघर्ष करते रहे हैं। हालांकि उनमें कांग्रेस ने कभी सीधी भागीदारी नहीं की लेकिन इन मुद्दों को हाईजेक कर उन्हें ही अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाया है। अगर कांग्रेस सरकार इनको पूरा नहीं करती तो वादाखिलाफी को लेकर हम आंदोलनों को न सिर्फ ज़ारी रखेंगे वरन और भी तेज़ करेंगे। हालांकि श्री ठाकुर को उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत में होने जा रहे लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस सरकार को कुछ मांगों को पूरा करना होगा अन्यथा उसका खामियाजा  उसे भोगना पड़ेगा। जनता व संघर्षरत संगठनों का मोहभंग होने पर पहले से चल रहे आंदोलनों में तेजी आएगी। लोग नए सिरे से खड़े होंगे।

राज्य-समाज द्वंद्व बना रहेगाः गौतम बन्धोपाध्याय

नदी-घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बन्धोपाध्याय का विचार है कि जब सत्ता परिवर्तन किसी राज्य में होता है तो केंद्र की नीतियों पर उसका कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। इसलिए राज्य को नीतियों में बदलाव का बहुत स्पेस नहीं मिल पाता। फिलहाल छत्तीसगढ़ के परिवर्तन को इस रूप में देखा जा सकता है कि उससे लंबे समय से चल रहे एक पार्टी के शासन का अंत हुआ है। देखना यह है कि नई सरकार का जनता के प्रति नजरिया कैसा होगा और समुदाय यानि अवाम सत्ता पर कैसे अंकुश लगाकर रखेगी। राज्य व समाज के बीच लोकतांत्रिक द्वंद्व तो बना रहेगा और वह बना भी रहना चाहिये।
श्री बन्धोपाध्याय का कहना है कि पिछले कई वर्षों से शिक्षा, मनरेगा, पंचायत, दैनिक वेतनभोगी समेत कई वर्गों के कर्मचारी आंदोलनरत थे, पर पिछली सरकार ने उनकी समस्याओं के समाधान की तो दूर, उनसे संवाद करना तक उचित नहीं समझा। उलटे, उनका दमन किया गया। पिछली सरकार ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने का ही काम किया था। विकास और प्रजातंत्र के बीच संबंध होता है, यह भी पिछली सरकार ने भुला दिया था।
प्राकृतिक संसाधनों को लेकर प्रदेश में हो रहे संघर्षों के बाबत श्री बन्धोपाध्याय कहते हैं कि 24 में 21 सीटों पर आदिवासी, दलितों ने इस उम्मीद से कांग्रेस को जीत दिलाई है कि नई सरकार संसाधनों पर उनके अधिकारों की रक्षा करेगी। अगर यह न हुआ तो जन आंदोलन तेज़ होंगे। लोकहित में तथा संविधान के दायरे में लड़ाइयां जारी रहेंगी। राज्य व समुदाय के बीच संघर्षों का रिश्ता बना रहेगा।

उपेक्षा हुई तो आंदोलनः रमेश  अग्रवाल

प्रसिद्ध पर्यावरणवादी, मानवाधिकार कार्यकर्ता व आदिवासियों के हकों को लेकर लड़ रहे रमेश अग्रवाल का कहना है कि उनके जैसे संगठनों ने पिछली सत्ता के दौरान जो जागरूकता फैलाई व रोष व्यक्त किया था, उसके चलते यह बदलाव आया है। वरना पार्टियां तो सड़क-पानी-बिजली जैसे सीमित मुद्दों पर ही चुनाव लड़ती हैं। नीतिगत परिवर्तन, आदिवासियों के मुद्दे, मानवाधिकार आदि को सरकारें चुनावों में गंभीरतापूर्वक नहीं उठातीं। ये सब न कांग्रेस के एजेंडा में है न ही भाजपा के। नई सरकार ने आगर इन पर ध्यान न दिया तो उसे भी जनांदोलनों का सामना करना पड़ेगा।

विभिन्न जनांदोलनों के चलते, विशेषकर केलो नदी के जल संबंधी संघर्ष के कारण हमले व जेल भुगत चुके श्री अग्रवाल का भावी सरकार के बारे में कहना है कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर नई सरकार का रवैया भी वैसा ही रहेगा, जो पूर्ववर्ती सरकार का रहा है। जो उद्योग व खदानें जिन्हें दे दी गई हैं या किसानों की जिस भूमि का अधिग्रहण हो चुका है उनकी स्थिति में बदलाव तो संभव नहीं है पर हम आने वाले समय में भी सतर्क व संघर्षरत रहेंगे ताकि जनसामान्य, आदिवासी, किसानों, दलितों, गरीबों के अधिकारों का शोषण न हो। हमारे जनवादी संघर्ष चलते रहेंगे.

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डा  दीपक पाचपोर 

वरिष्ठ पत्रकार 
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