‘ ये ज़हर फैल चुका है,इस जिन्न को दोबारा बोतल में बंद करना मुश्किल होगा।

खुली छूट मिल गई है क़ानून को अपने हाथों में लेने की, कई इलाक़ों में हमलोग देख रहे हैं कि एक गाय की मौत को ज़्यादा अहमियत दी जाती है एक पुलिस ऑफ़िसर की मौत के बनिस्पत।

मुझे फ़िक्र होती है अपनी औलाद के बारे में सोचकर ,क्योंकि उनका मज़हब ही नहीं है।मज़हबी तालीम मुझे मिली और रत्ना को कम मिली या बिल्कुल भी नहीं मिली क्योंकि एक लिबरल हाउसहोल्ड था उनका।

हमने अपने बच्चों को मज़हबी तालीम बिल्कुल भी नहीं दी। मेरा ये मानना है कि अच्छाई और बुराई का मज़हब से कोई लेना देना नहीं है।

अच्छाई और बुराई के बारे में जरूर उनको सिखाया। क़ुरान की एक – आध आयतें जरूर सिखाई क्योंकि मेरा मानना है कि उसे पढ़कर तलफ्फुज सुधरता है , जैसे हिन्दी का सुधरता है रामायण या महाभारत पढ़कर।

फ़िक्र होती है मुझे अपने बच्चों के बारे में। कल को अगर उन्हें भीड़ ने घेर लिया कि तुम हिन्दू या मुसलमान ? तो उनके पास तो कोई जवाब ही नहीं होगा क्योंकि हालात जल्दी सुधरते मुझे नज़र नहीं आ रहे हैं ।

इन बातों से मुझे डर नहीं लगता, ग़ुस्सा आता है। मैं चाहता हूँ कि हर राइट थिंकिंग इंसान को ग़ुस्सा आना चाहिए। डर नहीं लगना चाहिए। हमारा घर है,हमें कौन निकाल सकता है यहाँ से ।

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