15.12.2018

#जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई सुनिश्चित करें!
#आदिवासियों का नरसंहार बंद हो!!
#सुरक्षा बलों को बैरकों में वापस बुलाते हुए माओवादियों से चर्चा करें!!!
#आदिवासी सलाहकार परिषद, आदिवासी मुख्यमंत्री के साथ आदिवासी राज का सपना आज भी बाकी है?
#उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल

छत्तीसगढ़ प्रदेश बरसों से माओवादी समस्याओं से जूझ रहा है। अनुसूचित क्षेत्रों में 5वीं तथा 6वीं अनुसूचियों का परिपालन नहीं होने से आदिवासियों में असंतोष व्याप्त है। अधिसूचित क्षेत्रों को हजारों की संख्या में सुरक्षा बलों को भेज कर युद्धक्षेत्र में तब्दील कर दिया गया है। इन सिविल क्षेत्रों में दशकों से सुरक्षा बल आदिवासियों के जनजीवन के साथ छेड़छाड़ तथा बलात्कार कर रहे हैं। आंकड़ों की माने तो तीन हजार से भी ज्यादा आदिवासी जन सुरक्षा कानूनों सहित अन्य फर्जी मामलों में जेलों में सड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बहाने इस आदिवासी बाहुल्य राज्य में आज भी आदिवासी सलाहकार परिषद, आदिवासी मुख्यमंत्री तो दूर आदिवासी हित पर आधारित राज का सपना अब भी अधूरा है। आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के सिर राज मुकूट के लिए आदिवसियों ने अपना जनादेश दिया है।

राज्य में इस चुनाव में 90 में से कांग्रेस ने 68 सीटों पर जीत हासिल की है। राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 29 सीट अनुसूचित जनजाति के लिए तथा 10 सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। विधान सभा 2018 में हुए विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ने इन सीटों पर बड़ी जीत हासिल की है। कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 25 सीटों पर तथा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 में से सात सीटों पर जीत हासिल की है। प्रदेश में अनसूचित जनजाति की संख्या लगभग 32 फीसदी है और राज्य के दोनों प्रमुख दलों भारतीय जनता पार्टी तथा कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला था। राज्य के उत्तरी क्षेत्र सरगुजा और दक्षिण क्षेत्र बस्तर में सबसे अधिक अदिवासी सीटें हैं। ऐसा माना जाता है कि राज्य में इन आदिवासी सीटों पर जीत के माध्यम से ही सत्ता तक पहुंचा जा सकता है। हालांकि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में 29 में से 18 सीटों पर जीत के बाद भी कांग्रेस प्रदेश में 0.73 प्रतिशत के छोटे से अंतर से सत्ता से दूर थी।

अंतागढ़ उपचुनाव को भाजपा ने आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन कर खरीद लिया था। इस चुनाव में रुपए पानी की तरह चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने बहाया है। लेकिन इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने 29 में से 25 सीटें जीती हैं। भाजपा ने वर्ष 2013 के चुनाव में जहां अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 11 सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं इस बार के चुनाव में केवल तीन सीट ही जीत सकी है। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर विजय के साथ सत्ता प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। कांग्रेस को इन सीटों में से केवल 10 सीटों पर ही जीत मिली थी। लेकिन इस वर्ष हुए चुनाव में राज्य में भाजपा के कई वरिष्ठ आदिवासी नेता चुनाव हार गए। इस चुनाव में बीजापुर सीट से वन मंत्री महेश गागड़ा, नारायणपुर सीट से स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप और प्रतापपुर सीट से गृहमंत्री रामसेवक पैकरा को हार का सामना करना पड़ा है।

इसी तरह इस चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस को जीत मिली है। कांग्रेस ने 10 आरक्षित सीटों में से सात पर जीत हासिल की है। राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग की जनसंख्या लगभग 12 फीसदी है और इसमें से सतनामी वर्ग मैदानी क्षेत्रों में राजनीति को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 में से नौ सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस चुनाव में केवल दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। भाजपा ने मस्तुरी और मुंगेली सीट पर जीत हासिल की है, जबकि बहुजन समाज पार्टी दो सीट पामगढ़ तथा जैजेपुर से जीत दर्ज की है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में नवागढ़ से सहकारिता मंत्री दयाल दास बघेल चुनाव हार गए हैं। राज्य में इस वर्ष हुए चुनाव कांग्रेस ने 68 सीटों पर, भाजपा ने 15 सीटों पर, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने पांच सीटों पर तथा बहुजन समाज पार्टी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है।

छत्तीसगढ़ में विधानसभा संपन्न होने के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा? इसकी सर्वाधिक चर्चा है। कांग्रेस पार्टी से आदिवासी समाज के 27 विधायक, अनुसूचित जाति के सात विधायक और पिछड़े वर्ग से ढेरों विधायक चुन कर आए हैं। इस तरह इस आदिवासी राज्य में मूलनिवासी बड़ी संख्या में चुनकर आए हैं। इन विधायकों में आदिवासी विधायकों की संख्या सर्वाधिक है। इनमें कवासी लखमा, विक्रम मंडावी, भीमा मंडावी, दीपक बैज, लखेश्वर बघेल, शिशुपाल सोरी, मोहन मरकाम, संतराम नेताम जैसे दिग्गजों के नाम हैं। 32 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के लिए ट्राइबल सब प्लान के तहत बजट को बढ़ाने की जरूरत है। 5वी अनुसूची, पेसा कानून 1996, फारेस्ट राईट एक्ट-2006 अर्थात वनाधिकार अधिनियम विधेयक को पूर्णत: लागू करना बाकी है। ग्रामसभा के अधिकारों को विस्तारित किया जाना चाहिए। आदिवासियों के शोषण व प्रताडऩा को न्यायिक तरीके से समाप्त किया जाना चाहिए।

आदिवासी सलाहकार परिषद का अध्यक्ष आदिवासी ही हो। कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी अर्थात सीएसआर के साथ डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फंड अर्थात माईनिंग क्षेत्रों में जो रायल्टी का प्रतिशत कम्पनियों व लायसेंसधारियों को जमाकर उसका खर्च वहां के लोगों व क्षेत्रों के कल्याण के लिए करना अनिवार्य है इस पर आदिवासियों का विकास निर्भर करता है। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 में किसी तरह का बदलाव नहीं होगा एवं जहां आदिवसियों की जो जमीन कानून का उल्लंघन कर ली गई है, उसकी जांच कर उसे वापस देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। अनुसूचित जाति के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों को ठीक से परीक्षण कर उनके आरक्षण को जनसंख्या के अनुपात में लागू किया जाए।कहने का तात्पर्य यह कि आदिवासी जनादेश के कारण कांग्रेस को इस दृष्टिकोण से राज्य का मुख्यमंत्री आदिवासी समाज से चुनना चाहिए।

आज की परिस्थिति में छत्तीसगढ़ में भूमि अधिग्रहण, खनन, जल, जंगल, जमीन, पत्थलगढ़ी, माओवाद, शिक्षाकर्मियों का संविलियन, किसानों के लिए स्वामिनाथन आयोग-2006 की रिपोर्ट को लागू करने, मजदूरों, कर्मचारियों के बेहतर भविष्य जैसी गंभीर समस्याओं से सर्वाधिक आदिवासी समाज जूझ रहा है और इस कारण आदिवासी क्षेत्रों में विकास नहीं हो पा रहा है।विकास का मतलब चमचमाती रोड, रेलवे और ऊंची इमारतें नहीं होती है। गौरतलब है कि नई सरकार को आदिवासियों से उनके साथ अमानवीय अत्याचारों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की जरूरत है। मार्के की बात यह है कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास ना होने के कारण वहां के लोगों को जिन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है उसे एक आदिवासी व्यक्ति ही समझ सकता है। इसीलिए कांग्रेस पार्टी में आलाकमान को आदिवासी सलाहकार परिषद, आदिवासी मुख्यमंत्री के साथ आदिवासी राज का सपना को छत्तीसगढ़ राज्य में नई सरकार गठन के साथ याद रखना होगा।

समूचे आदिवासी समाज का कितना विकास होगा यह बताना मुश्किल है लेकिन यदि हम आदिवासी राज की बात करे तो इससे अवश्य राज्य का विकास होगा और यह तभी सफल होगा जब आदिवासी, दलित, पिछड़ा वर्ग जैसे मूलनिवासियों की पार्टी से विधायक चुनकर जाए। हां जातीय पूंजीवाद, जमींदारी प्रथा, देशी-विदेशी कार्पोरेट सेक्टर को बढ़ावा देने वाली जनसंघर्षों को कुचलने वाली नीतियों से बाज आने की जरूरत है। इन विकृतियों से मुक्त आदिवासी नेतृत्व में आदिवासियों को अपनी पार्टियों के तहत ही आदिवासी मुख्यमंत्री, आदिवासी सलाहकार परिषद का मुखिया तथा ग्राम सभा में आदिवासियों तथा उद्योगों और खेतों में आदिवासियों के नेतृत्व में राष्ट्रीकरण के तहत नए आदिवासी राज्य की बात करनी चाहिए.

उत्तम कुमार.संपादक ,दक्षिण कोसल 

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