छतीसगढी संस्कृति और बोली के महारथी पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का निधन .

 

7.12.2018 .बिलासपुर

आज बिलासपुर में छत्तीसगढ़ संस्कृति और बोली के महारथी प्रमुख साहित्यकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निधन हो गया .
चतुर्वेदी जी का निधन छत्तीसगढ़ की अपूरणीय क्षति तो है ही ,वे बेहद लोकप्रिय और स्थापित साहित्यकार थे .किसी भी जगह या मंच पर उनका उपस्थित होना ही अपने आप में गरिमा का आभास देता था .राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निकट रहे चतुर्वेदी जी को पिछले साल ही पदमश्री से राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था .वे छत्तीसगढी भाषा आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे .

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में सोमवार को 38 लोगों को पद्श्री  और 5 लोगों को पद्मभूषण अलंकरण से सम्मानित किया। इसमें छत्तीसगढ़ से बिलासपुर के पं. श्यामलाल चतुर्वेदी को साहित्य और चांपा के दामोदर गणेश बापट को समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया। राष्ट्रपति भवन के हाल में समारोह का आयोजन हुआ।

इस दौरान साहित्यकार, लेखक व वरिष्ठ पत्रकार पंडित चतुर्वेदी व्हील चेयर पर सम्मान ग्रहण करने पहुंचे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें मंच से उतरकर सम्मानित किया।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने दिया पत्र .

पंडित चतुर्वेदी ने राष्ट्रपति को पत्र सौंपते हुए कहा था कि आज मुझे आपके हाथों पद्श्री अलंकरण प्रदान किया जाना मेरे और मेरी जन्मभूमि, कर्मभूमि छत्तीसगढ़ राज्य के लिए गौरव की बात है। इस अवसर पर श्री चतुर्वेदी ने कहा कि सवा दो करोड़ छत्तीसगढ़ियों की अपनी छत्तीसगढ़ी भाषा को केंद्र की आठवीं अनुसूची में शामिल कर राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्रदान करने की कृपा करें। अनुसूचित जाति, जनजाति पिछड़े और अल्पसंख्यक बाहुल्य छत्तीसगढ़ की अपनी भाषा को राजभाषा का दर्जा देकर भारत में अपनी पहचान बनाने का गौरव प्रदान करें। अपने जीवन की हर श्वांस, हर पल, हर क्षण, छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होते हुए देखने की प्रतीक्षा में…।

परिचय

श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1926 में कोटमी गांव, जिला बिलासपुर में हुआ था, वे छत्तीसगढ़ी के गीतकार भी हैं। उनकी रचनाओं में “बेटी के बिदा” बहुत ही जाने माने हैं। उनको बेटी को बिदा के कवि के रुप में लोग ज्यादा जानते हैं। उनकी दूसरी रचनायें हैं – “पर्रा भर लाई”, “भोलवा भोलाराम बनिस”, “राम बनबास” ।

अप्रतिम वक्ताः

वे पत्रकारिता भी करते हैं। “विप्रजी” से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली थी। और बचपन में अपनी मां के कारण भी उन्हें लिखने में रुची हुई। उनकी मां नें बचपन में ही उन्हें सुन्दरलाल शर्मा के “दानलीला” रटा दिये थे। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के मूल, छत्तीसगढ़ की मिट्टी, वहाँ के लोकगीत, लोक साहित्य। उनकी “जब आइस बादर करिया” जमीन से जुड़ी हुई है
पं. श्यामलाल जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी भाषण-कला है। वे बिना तैयारी के डायरेक्ट दिल से बोलते हैं। हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं का सौंदर्य, उनकी वाणी से मुखरित होता है। उन्हें सुनना एक विलक्षण अनुभव है। हमारे पूज्य गुरूदेव स्वामी शारदानंद जी उन्हें बहुत सम्मान देते हैं और अपने आयोजनों में आग्रह पूर्वक श्यामलाल जी को सुनते हैं। श्यामलाल जी अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के चलते पूरे छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय हैं। वे किसी बड़े अखबार के संपादक नहीं रहे, बड़े शासकीय पदों पर नहीं रहे किंतु उन्हें पूरा छत्तीसगढ़ पहचानता है। सम्मान देता है। चाहता है। उनके प्रेम में बंधे लोग उनकी वाणी को सुनने के लिए आतुर रहते हैं। उनका बोलना शायद इसलिए प्रभावकारी है क्योंकि वे वही बोलते हैं जिसे वे जीते हैं। उनकी वाणी और कृति मिलकर संवाद को प्रभावी बना देते हैं।

महा परिवार के मुखियाः

 श्यामलाल जी को एक परिवार तो विरासत में मिला है। एक महापरिवार उन्होंने अपनी सामाजिक सक्रियता से बनाया है। देश भर में उन्हें चाहने और मानने वाले लोग हैं। देश की हर क्षेत्र की विभूतियों से उनके निजी संपर्क हैं। पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में छत्तीसगढ़ की वे एक बड़ी पहचान हैं। अपने निरंतर लेखन, व्याख्यानों, प्रवासों से उन्होंने हमें रोज समृद्ध किया है। इस अर्थ में वे एक यायावर भी हैं, जिन्हें कहीं जाने से परहेज नहीं रहा। वे एक राष्ट्रवादी चिंतक हैं। किंतु विचारधारा का आग्रह उनके लिए बाड़ नहीं है। वे हर विचार और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बीच समान रूप से सम्मानित हैं। मध्यप्रदेश के अनेक मुख्यमंत्रियों से उनके निकट संपर्क रहे हैं। मंत्रियों की मित्रता सूची में उनकी अनिर्वाय उपस्थिति है। किंतु खरी-खरी कहने की शैली ने सत्ता के निकट रहते हुए भी उनकी चादर मैली नहीं होने दी। सही मायनों में वे रिश्तों को जीने वाले व्यक्ति हैं, जो किसी भी हालात में अपनों के साथ होते हैं। 
  
छत्तीसगढ़ी संस्कृति के चितेरेः

  छत्तीसगढ़ उनकी सांसों में बसता है। उनकी वाणी से मुखरित होता है। उनके सपनों में आता है। उनके शब्दों में व्यक्त होता है। वे सच में छत्तीसगढ़ के लोकजीवन के चितेरे और सजग व्याख्याकार हैं। उनकी पुस्तकें, उनकी कविताएं, उनका जीवन, उनके शब्द सब छत्तीसगढ़ में रचे-बसे हैं। आप यूं कह लें उनकी दुनिया ही यह छत्तीसगढ़ है। जशपुर से राजनांदगांव, जगदलपुर से अंबिकापुर की हर छवि उनके लोक को रचती है और उन्हें महामानव बनाती है। अपनी माटी और अपने लोगों से इतना प्रेम उन्हें इस राज्य की अस्मिता और उसकी भावभूमि से जोड़ता है। श्यामलाल जी उन लोगों में हैं जिन्होंने अपनी किशोरावस्था में एक समृद्ध छत्तीसगढ़ का स्वप्न देखा और अपनी आंखों के सामने उसे राज्य बनते हुए और प्रगति के कई सोपान तय करते हुए देखा। आज भी इस माटी की पीड़ा, माटीपुत्रों के दर्द पर वे विहवल हो उठते हैं। जब वे अपनी माटी के दर्द का बखान करते हैं तो उनकी आंखें पनीली हो जाती हैं, गला रूंध जाता है और इस भावलोक में सभी श्रोता शामिल हो जाते हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से इसी लोकजीवन की छवियां बार-बार पाठकों को प्रक्षेपित करते हैं। उनका समूचा लेखन इसी लोक मन और लोकजीवन को व्यक्त करता है। उनकी पत्रकारिता भी इसी लोक जीवन से शक्ति पाती है। युगधर्म और नई दुनिया के संवाददाता के रूप में उनकी लंबी सेवाएं आज भी छत्तीसगढ़ की एक बहुत उजली विरासत है।

सच कहने का साहस और सलीकाः 

पं. श्यामलाल जी में सच कहने का साहस और सलीका दोनों मौजूद है। वे कहते हैं तो बात समझ में आती है। कड़ी से कड़ी बात वे व्यंग्य में कह जाते हैं। सत्ता का खौफ उनमें कभी नहीं रहा। इस जमीन पर आने वाले हर नायक ने उनकी बात को ध्यान से सुना और उन्हें सम्मान भी दिया। सत्ता के साथ रहकर भी नीर-क्षीर-विवेक से स्थितियों की व्याख्या उनका गुण है। वे किसी भी हालात में संवाद बंद नहीं करते। व्यंग्य की उनकी शक्ति अप्रतिम है। वे किसी को भी सुना सकते हैं और चुप कर सकते हैं।

उनके साथ होना सच के साथ होना है, साहस के साथ होना है। रिश्तों को बचाकर भी सच कह जाने की कला उन्होंने न जाने कहां से पाई है। इस आयु में भी उनकी वाणी में जो खनक और ताजगी है वह हमें विस्मित करती है। उनकी याददाश्त बिलकुल तरोताजा है। स्मृति के संसार में वे हमें बहुत मोहक अंदाज में ले जाते हैं। उनकी वर्णनकला गजब है। वे कहते हैं तो दृश्य सामने होता है। सत्य को सुंदरता से व्यक्त करना उनसे सीखा जा सकता है। वे अप्रिय सत्य न बोलने की कला जानते हैं।

**

जीवन परिचय कविता कोष से आभार सहित .

Leave a Reply