सविता तिवारी की कविता “शून्य”

“शून्य”

आज मन में और दिमाग में
असंख्य कल्पनाएं थीं कि
शून्य पर बहुत कुछ लिखूंगी
पक्ष और विपक्ष पर
सतत आलोचना और प्रशंसा कर शून्य का विस्तृत वर्णन करूंगी डायरी कलम लेकर बैठी
अब तो पूरा शून्य का
महिमा मंडन करना ही है,
पर ये क्या हुआ अचानक
हाथों पर कलम लिए हुए अचानक ही मेरे सारे विचार शून्य हो गए ……….
पक्ष-विपक्ष, आलोचना-प्रशंसा विस्तृत वर्णन, मेरे मानस-पटल से ही शून्य हो गए,
और मुझे बोध करा गये
शून्य की महत्ता …..
प्रमाण दे गई शून्य मुझे
अपनी कीमत का,
अपने वजूद का कि शून्य
किसी अंक के साथ हो तो
उसे अनमोल बना सकता है,
जमीं से अर्श पर ला सकता है… यदि शून्य दिमाग के विचारों में आ जाए तो ….अर्श से जमीं पर भी ला सकता है ।
स्वयं ही स्वयं को प्रमाणित
कर दिया आज “शून्य” ने
अचानक ही मेरे मानस पटल के सारे विचारों को शून्य
कर दिया “शून्य” ने ……
शून्य को कभी भी कम नहीं आंकना “सवि”
तुम्हारे मौन “शून्य ” का भी प्रमाणीकरण होगा ….
आगाज है “मौन शुन्य” तूफान
के पहले का और
तूफान के बाद का “मौन शून्य”
“शून्य” को कभी कम
नहीं आंकना.

“सवि”..1.8.17 
मेरी अभिव्यक्ति मेरी कलम से ….. 

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