दस्तावेज़ ःः गुरु घासीदास के उत्तराधिकारी पुत्र गुरुबालकदास की ह्त्या क्यों ?

 4.12.2018

सतनाम दमनकाल

गुरूघासीदास जी के देहावसान पश्चात् सतनाम आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कौन हो के प्रश्न पर सतनाम संगठन_समाज में विचार_विमर्श हुआ।चूँकि गुरूघासीदास ने व्यक्ति महत्ता के स्थान पर समाज महत्ता जोर दिया था।समाज में गंभीर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि ,सतनाम आंदोलन को चलाने में गुरूघासीदास के साथ समाज_संग़ठन के शक्ति निर्माण में उनके दुतीय पुत्र बालकदास ने बराबर का साथ नेतृत्व के लिए कार्य कुशलता तथा नेतृत्व क्षमता को ही आधार माना जायगा ।किसी वंश परम्परा को नही ।यह निर्णय कार्यक्षमता के आधार पर लिया गया , किसी वंशाक्रम के तहत नहीँ।

 

गुरुबालकदास के नेतृत्व में सतनाम निति_धर्म का जोर_ शोर से प्रचार हुआ।सतनाम आंदोलन से जहां प्रभुसत्ता वर्ग द्वारा पीड़ित लोकसमाज मजबूत होता गया।वहीँ दूसरी ओर प्रभु वर्ग की लोकदमनकारी ताकते सतनाम आंदोलन को कुचलने _तोड़ने तरह_तरह के प्रयास में लगे रहे। इन विवरणों के पूर्व हम उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों पर एक नजर डाल लेते हैं।

 

तात्कालिक राजनैतिक परिघटनाए

नागपुर राज्य के शासक रघुजी तृतीय की लंबी बिमारी के बाद 11 दिसंबर 1853 में मृत्यु हो गई। ब्रिटिश रेजीडेंट मि. मिंसल (जो उनकी मृत्यु के समय नागपुर में उपस्थित थे , ने केंद्रीय सरकार के पास राजा की मृत्यु की सुचना प्रेषित किया।बहुत सारी घटना_ परिघटना के बाद इस राज्य को ब्रितिश साम्राज्य में विलीन कर दिया गया ) इस उल्लेखित अवधि में छत्तीसगढ़ के अंतिम मराठा सूबेदार गोपालराव आनंद थे।उन्होंने अपना शासन भार 1 जनवरी 1855 ई. को ब्रिटिश डिप्टी कमिशनर चार्ल्स सी . इलियट को सौंप दिया। उनका अधिकार क्षेत्र व्ही था ,जो 1818 में मराठों की पराजय और अंग्रेजो को विजय के बाद छत्तीसगढ़ में सूबेदार प्रथा के तहत मि. ए गन्यु को था। हालांकि तब और अब में परीश्थितिया बदली हुई थी।डिप्टी कमिश्नर को प्रशासन के कार्य में सहयोग देने के लिए एक सहायक कमिशनर की भी नियुक्ति की गई ।इसके सिवाय अतिरिक्त सहायक कॉमिशनर की नियुक्ति प्रावधानित था।जिसे मूल भारत निवासी के लिए आरक्षित रखा गया ।इसी के तहत रायपुर में सूबेदार गोपालराव आनंद एवम् बिलासपुर में मोईबुल हसन को सहायक कॉमिशनर के रूप में नियुक्त किया गया।

 

इसी दरम्यान सन् 1857 में सैनिक ग़दर प्रारंभ हुआ ( जिसे 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है) हालांकि इसे स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सभी इतिहासकार नही मानते ।दरअसल यह देशी राजाओ का अपने राज्य बचाने अंग्रेजो के खिलाफ सैनिक विद्रोह था।अंग्रेजी हुकूमत ने इसे तत्परता से असफल कर दिया ।अंग्रेजो की ओर से सामान्य जनो के परिवारो से भरती हुए सैनिक जवानो के यथा_ महार रेजिमेंट,सिख रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट आदि लड़े और अन्ततः ब्रिटिशो की जीत व् देशी रजवाडो की हार हुई ।इसकी विशद व्याख्या से बहुत सारे अर्थ _व्याख्या उद्घाटित होता है।लेकिन इसका यहां चर्चा करना विषयांतर हो जायेगा।

 

सक्षिप्त :

इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1857 के बाद भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी (ब्रिटिश सत्ता के लाइसेंस धारी कंपनी /सत्ता) को ब्रिटेन सरकार ने हटाकर सीधे अपने हाथो में सत्ता ले लिया ।इस राजनैतिक बदलाव से भारत में एक नए युग का सूत्रपात हुआ ।जिससे यहां की राजनैतिक सामाजिक अर्थनीति में बुनियादी परिवर्तन हुआ।सन् 1857 में विद्रोह के दौरान विशेष परिष्ठितियो से निपटने के लिए रायपुर के डिप्टी क मिशनर को विशेष सर्वोच्च अधिकार प्रदान किये गए ।उन्हें अपने क्षेत्र के बाहर की घटनाओ से भी निपटने का अधिकार दिया गया ।

छत्तीसगढ़ के डिप्टी कमिशनर ने प्रथमतः प्रशासकिय परिवर्तन के रूप में रजवाड़ो  की सीमा परिवर्तन कर तहसीलदारी व्यस्था का सूत्रपात किया।छत्तीसगढ़ को मुख्यतः तिन तहसीलो रायपुर,धमतरी,रतनपुर, में बांटा गया। प्रत्येक तहसील में एक _ एक तहसीलदार नियुक्त किया गया।। जो उस क्षेत्र का प्रमुख अधिकारी होता था। वे सीधे छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े अधिकारी डिप्टी कमिशिनर के निर्देशानुसार कार्य करता था।छत्तीसगढ़ के परगनों का नये सिरे से पुर्नगठन किया गया।यहां नायब तहसीलदार नियुक्त किया गया।यह पद भी भारतीय मूल के लोगो के लिए आरक्षित रखा गया। बाद में 1 फरवरी 1857 ई. में छत्तीसगढ़ के तहसीलो को पुनर्गठन कर उनकी संख्या तिन से बढ़ाकर पाँच कर दी गई.

 

वे थे._ रायपुर, धमतरी,धमधा,नवागढ़,और रतनपुर बाद में दुर्ग को भी नया तहसील मुख्यालय बनाया गया।इसी दौर में देशी रजवांडो__ सामन्तों एव उनके पिट्ठुओं के षडयंत्रो_ साठगाँठ से अंग्रेजी हुकूमत ने वीरनारायण सिह के लोक_राजसमाज को कुचलने का काम किया।

वीरनारायण सिंह लोकसमाज के लिए संघर्ष करते शहीद हुए थे।

भूमि बंदोबस्त कानून एवम् संदर्भित विषय से सतनाम आंदोलन पर प्रभाव.

 अंग्रेजी शासन ने व्यवस्थित तौर पर राज _काज करने के लिए भूमि बंदोबस्त को नया स्वरूप प्रदान करने ,नए आदेश प्रसारित किये।इसके पहले गॉवो का सीमांकन ,भूराजस्व की अनियमितता एवम् भुअधिकार कब्जा आदि सब कुछ अस्त व्यस्त था।अंग्रेजो ने जमीनों पर काबिज लोगो की व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने के लिए मालिक मकबुजा कानून लागु किया।इस कानून के अनुसार जो कादिम कास्तकार (पुराने कास्तकारो को जिन्हें कादिम काश्तकार ,कादिम जोतदार एवम् वंश परम्परा गत कास्तकार कहा जाता था।) इस कानून में यह प्रावधानित था की1840 ई. से जो अपनी भूमि पर काश्तकारी करते थे।उन्हें पूर्ण स्वामित्व अधिकार अर्थात मालिक मकबुजाहक प्रदान करने का प्रावधान था। अब वे बंदोबस्त अवधि में बेदखल नही किये जा सकते थे ।जब तक विशेष परि स्थितियो में अदालती कार्यवाही द्वारा ऐसा निर्णय न लिया जायेत्र

इन सभी के लिए अंग्रेजी शासन ने पहली बार प्रत्यक्षतह भूमि कब्जा के आधार पर जमीनों का सर्वे करके भुबन्दोबस्त रिकॉर्ड (लेण्ड रेवेन्यू सेटेलमेंट रिकॉर्ड) बनाने का निर्णय लिया ।इस निर्णय से विशेष परिस्थितियों का निर्माण हुआ।इस कानून में जो बात महत्वपूर्ण है,वह यह कि 1840ई. से जो अपनी भूमि पर काबिज हैं।उसे शासन द्वारा वाजिब काश्तकार मानकर उन्हें मालिक मकबुजा हक देने का था।पाठको को याद होगा की, सतनाम आंदोलन से जिन भू__ दासो ने जमीनों पर कब्जा किये थे , वह इस कानून से सरकारी तौर पर अधिकृत रूप से आदिम काश्तकार माने जाते ।इससे सतनाम लोक दमनकारी तत्वों में खलबली मच गई ।क्योंकि वे आस लगाए थे कि एक न एक दिन वे सतनामियों को बेदखल करके, फिर से भूदास बनाएंगे। लेकिन अंग्रेजी सरकार ने उनको मालिकाना हक को स्वीकार कर लिया तो फिर उन्हें बेदखल करना नामुकिन हो जायेगा ।वे अपनी आँखों से देख चुके थे कि, बड़े_ बड़े राजाओ __ महाराजाओ को परास्त कर (1857 गदर में) अंग्रेजो विजयी हुए थे,और उनके राज में सूर्य कभी डूबता नही था।अर्थात दुनिया के सभी दिशाओ में अंग्रेजी हुकूमत थी।जब कभी रात होता था तो व्ही कहि दिन हुए स्थान पर भी उनका राज होता था।

 

यहाँ पर इस बात का उल्लेख कर दें कि अंग्रेजी प्रशासन ने भू_ बंदोबस्त के लिए जो नीती अपनाई थी और उसमे अधिकारियो को यह निर्देशित किया गया था कि यदि कोई विवाद होता है तो स्थानीय तौर पर जनसमुदाय में मान्य प्रमुखों की राय_ मसवरा से उचित निर्णय किया जावे ।इसके तहत लोक प्रशासन के प्रमुख अधिकारीगण( ज्ञात हो कि उस समय के स्थानीय अधिकारी तहसीलदार ,नायब तहसीलदार जिनका पद मूल भारतीय निवासियो के लिए सुरक्षित रखा जाता था।और उनका ओहदा आज के कलेक्टर _कॉमिशिनर कि तरह का था ।क्लेकटरी व्यवस्था तो बाद में शुरू हुआ ।

गुरुबालकदास द्वारा किसी विवादित मामले में उचित निर्णय देने से उनकी स्थिति एक राजा __न्यायधीश की तरह हो गयीं थी।इसलिए आम जन उन्हें सम्मान से ” राजागुरु” कहते थे।। 

 

 लोकदमनकारियो द्वारा सतनाम आंदोलन को दमित करने , गुरु बालकदास की ह्त्या का षणयंत्र

लोकदमनकारी सामंत व् उनके बिचौलिए अपने हित साधने में गुरुबालकदास को बहुत प्रभावित करने की कोशीश किये।उन्होंने गुरुबालकदास को यह भी प्रलोभन दिया कि उनके लिए अधिकाँश भूमि__ संपत्ति की व्यव्श्था वे कर् सकते है।ब शर्ते कि वे भूमि मामलो में अपनी सक्रियता हटा ले।इन सब पर गुरुबालकदास स्पस्ट तौर पर कहते की, हमारे लोग अपनी संघठन __समाज कि शक्ति से आपनी भूमि पर काबिज है और यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा भर नही है।यह हमारी थाली में हमारी मेहनत से रखा हुआ रोटी है यदि कोई हमारी रोटी छीनने की कोशिश करेगा तो हम यह नही होने देंगे।। इन स्थितियों में लोकदमनकारियो ने एक षड़यँत्र रचा।

1. कि गुरुबालकदास को धोखे से उचित अवसर पर मार डाला जाय ।इसके लिए सभी तरह के साधनो का साम _दाम,दंड,भेद का सहारा लिया गया।जैसा कि उनके आराध्य देव विष्णु ने वामन रूप में राजा बलि को षड्यंत्र पूर्वक ह्त्या कर उनकी भूमि को हड़पा था।_

2. गुरुबालकदास की ह्त्या के बाद कोई और सतनामी नीति सिद्धांत का व्यक्ति इनका मुखिया न बन सके।इसलिए ऐसे उपयुक्त व्यक्ति को मुखिया बना दिया जाय जो हमारे इशारे पर हर काम करे।इस तरह बहुत व्यवस्थित तरीके से षड् यंत्र को अंजाम दिया गया।चूँकि वे दिन दहाड़े आमने_सामने से गुरुबालकदास की ह्त्या नही कर सकते थे।इसके लिए वे औराबांधा ( वर्तमान में मुंगेली से करीब 8__ 10 कि मी दूर स्थित ग्राम) में गुरु बालकदास की रावटी का आयोजन रखा गया था, वहा उनकी ह्त्या करने का षड्यंत्र रचा गया।षड्यंत्रकारियो ने उनकी ह्त्या में उत्तर भारत के उन छटे हुए हत्यारो __ गुंडों को यह कहकर बुलाया था कि ,यहाँ आओ और काम को अंजाम दो।वहाँ तुम्हारे पास 1 डिसमिल जमीन नही है, तो यहाँ आकर सफल हुए ,तो सैकड़ो एकड़ जमीन के मालिक बनोगे ।उनका यह संदेस कारगार रहा और सचमुच में वहाँ के बदमाशो ने यहाँ आकर गुरुबालकदास की ह्त्या को अंजाम देकर यहाँ के सतनामिओ का दमन करके , सैकड़ो एकड़ ज़मीनो पर कब्ज़ा कर शासकीय अधिकारियो की मिलीभगत से मालिक हो गए ।

 

समाज_संघठन में औराबांधा में रावटी आयोजित करने या न करने के प्रश्न पर बहुत विचार_ विमर्श हुआ ।क्योंकि उस स्थान पर पहले से ही सतनामी एवम् सामंती तत्वों के बिच तनाव __ तकरार की घटनाएं हो चुकी थी। लेकिन दुश्मन के भेदियो की घुसपैठ के कारण वहाँ जाने का हो गया ।( उस समय के समाज संघठन इस षड्यंत्र को भाँपने में असफल रहे और गुप्त भेदी ओ के झांसे में आकर बहुत बड़ी गलती कर बैठे।) वे वहाँ गए लेकिन भेदियो की चालाकी से रात्रि में अचानक हमला हुआ।रात के अँधेरे में सब कुछ इधर _उधर हुआ और गुरुबालकदास व् उनके सुरक्षा दस्ता ( इसमें भी भेदिए थे) अपने बचाव में जितना हो सकता था वे लड़े ।लेकिन षड्यंत्रकारियो के सुनिश्चित हमले से वह बुरी तरह घायल हो गए ।रात्रि में सभी लोग इधर __ उधर होकर दुर स्थानों पर मिले। घायल अवश्था में गुरुबालकदास को लेकर भण्डार की ओर रवाना हुए ।लेकिन पूर्व से ही षड्यंत्रकारियों के साथ मिले हुए , थोपे गये भण्डार के कथित गुरुओ , मुखियाओं ने यह कहा कि , गुरुबालकदास औराबांन्धा में कुछ गलत किये होंगे इसलिए मारे गए हम इसमें साथ नही देंगे।( ऐसा अफवाह फैलाकर उन्हें भण्डार में आने नही देने की पूर्व नियोजित षड्यंत्र था) तब औराबांधा के आगे से भण्डार जाने के रास्ते से अलग नवलपुर ( जहां उनका ससुराल था और जहाँ सतनाम आन्दोलन का प्रमुख केंद्र था।) के रास्ते में आगे बढे।गुरुबालकदास घायलावष्ठा में नवलपुर से पहले के एक ग्राम कोसा के पास ही उनकी मृत्यु हो गई। वहाँ से नवलपुर लेकर मृत देह का मिटटी संस्कार किया गया.

GSS इस स्थान पर पिछले अनेक वर्षो से समाधि मेला का आयोजन 26 मार्च को प्रतिवर्ष किया जाता है।यह तिथि उनकी मृत्यु की तारीख16,17, मार्च 1860 ई. 16 मार्च की रात हमले से घायल एवम् 17 मार्च मृत्यु :_ यह तारीख हिंदी विश्वकोष व् पुराने कैलेण्डर रिकॉर्ड से प्राप्त किया गया है.

इस घटना के बाद के दिनों में जब लोगो को पता हुआ तो क्रोध/ ग्लानि से कई तर कि घटनाये हुई।लेकिन षड़यँत्र कारी सचेत व् तैयार थे और सतनामीजन भ्रमित ( उल्टी _सीधी अफवाहों के कारणों )। तात्कालिक सरकारी मशनरी ने भी हत्यारो को पकड़ने में ढ़ील दिखाई अन्तह इस घटना से सतनामियों में दो फांक हो गया ।हत्यारे पकडे नही जा सके ।पहले में वे लोग थे, जो मूलतः सतनाम सुद्धान्तो के मानने वाले थे,

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जीएसएस कैडर बुक से प्राप्त .

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