2 दिसंबर 84 की वह रात कोई कैसे भूल सकता है ःः शरद कोकास.

3.12. 2018

2 दिसंबर 1984 को रविवार था । मैं एक सप्ताह से अपने दोस्त सुरेश स्वप्निल के घर ठहरा हुआ था । भोपाल के तमाम दोस्तों से मिलकर बैचलर होने के सुख से भरा हुआ दोस्तों की दावतों का लुत्फ उठाकर वापस दुर्ग लौट रहा था।

अगले दिन सोमवार था और मुझे बैंक की अपनी नौकरी जॉइन करनी थी ।

छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस शाम को 7:00 बजे भोपाल से छूट गई। दूसरे दिन दुर्ग पहुंचने पर पता चला कि ठीक 2 घंटे बाद भोपाल रेलवे स्टेशन पर ज़हरीली गैस कहर ढा चुकी थी । यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से निकली जहरीली गैस ने उस रात पूरे भोपाल को अपनी चपेट में ले लिया था ।

मैंने यहाँ वहाँ फोन लगाने की कोशिश की ताकि दोस्तों के हाल पता चल जायें लेकिन कुछ पता नहीं चला । मुझसे रहा नहीं गया और अगले ही दिन मैं फिर शाम को छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस की जनरल बोगी में ऊपर वाली बर्थ पर बैठकर यात्रा करते हुए भोपाल पहुंच गया ।

सुबह 6:00 बजे ट्रेन भोपाल पहुंची तो हल्का हल्का कोहरा छाया हुआ था । मैं पैदल ही सुरेश के चटाईपुरा बुधवारा वाले घर की ओर निकल पड़ा । रास्ते मे फुटपाथ पर एक भिखारी सर तक चादर तानकर सोया हुआ था । मुझे लगा कि वह लाश है ।

उस पुराने से घर की सीढ़ियाँ चढ़कर मैंने सुरेश के घर का दरवाजा खटखटाया । सुरेश नींद से जागकर आँखे मलता हुआ बाहर आया और मुझे गले लगाकर कहा ..”ज़िंदा हैं यार । ” मैंने भीतर पहुँच कर देखा , कविता भाभी और सुरेश की नन्ही बिटिया सौम्या आराम से सो रहे हैं ।

एक लम्बी चुप्पी के बाद सुरेश की आवाज़ फिर सुनाई दी..” हम तो जिंदा है यार …लेकिन बहुत सारे लोग…सुरेश का गला भर आया था ।

उसके बाद हम लोग शहर घूमने निकले । लेकिन यह घूमना वैसा नहीं था जैसे हर बार का घूमना होता था । हमीदिया रोड पर एक भैंस मरी पड़ी थी जिसका पेट फूला हुआ था । एक क्रेन उसे उठाने की कोशिश कर रही थी।

हवाओं में मिथाइल आइसो सायनाइड गैस की गंध तब भी पसरी हुई थी । लोगों के चेहरों पर मल्टी नेशनल कम्पनी के इस आतंक का खौफ साफ दिखाई दे रहा था ।

इस बात को बरसों बीत गए लेकिन पुराने लोगों के चेहरों पर वह खौफ़ अब भी दिख जाता है जब इस देश में रिहायशी क्षेत्रों में फैक्ट्रियां लगाने की बात चलती है , जब आदिवासियों से उनके जंगल और ज़मीन छीनने की बात चलती है ।

जाने कब हम देश के तमाम चेहरों को खौफ़ से मुक्त देख सकेंगे ।

***

 

( 3 दिसंबर 2018 को ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान दुर्ग में भोपाल गैस कांड के चौंतीसवे स्मृति दिवस पर ‘औद्योगिक दुर्घटनाओं के कारण और समाधान’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में शरद कोकास का उद्बोधन एवं छात्र छात्राओं से संवाद )

“सर, पता है यूनियन कार्बाइड से जब गैस रिसी तो एक परिवार था जो अपने घर मे अग्निहोत्र यज्ञ कर रहा था,उसके कारण वो लोग बच गए।”

मैंने कहा “बेटा, यज्ञ में जो धुआं होता है उसमें तो वैसे भी कार्बन डाइऑक्साइड होती है । फिर उसमे मिथाइल आइसोसाइनाइड और मिल गई । सो उनके बचने का कारण उनकी प्रतिरोध क्षमता होगी या फिर गैस का प्रभाव वहाँ कम होगा । वैसे भी यह सिर्फ अफवाह है जो उस समय फैलाई गई थी । और सोचना ही है तो उन हज़ारों लोगों के बारे में सोचो जो इस गैस कांड में मर गए।”

कितना दुखद है कि हमारी यह युवा पीढ़ी भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चीजों को नहीं देख पाती । हम सब को इस दिशा में गम्भीरता पूर्वक सोचना होगा.

**

#भोपालगैस #ट्रेजडी
 *भोपाल गैस कांड के बाद हज़ारों लोगों के मरने की ख़बर पढ़कर गुस्से में लिखी, सन उन्नीस सौ चौरासी की एक कविता ।*

कैलक्यूलेटर
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मेरे सामने है एक अखबार
जिसमें इर्द – गिर्द बिखरीं हैं
कई खबरें
लाशों की तरह

मेरे हाथों में
एक कैलक्यूलेटर
जिस पर मैं कर रहा हूँ
मौत का हिसाब
जोड़ रहा हूँ क्रूरता को
घटाते हुए भावनाओं से
गुणा करते हुए बर्बरता से

मुझे विश्वास नहीं है
सरकारी आँकड़ों पर
मैं लेना चाहता हूँ जायज़ा
उन परिस्थितियों का
जिनमें मौत भी काँप उठी थी

उन दरवाज़ों पर
जहाँ धुआँ था
लाशों की गन्ध थी
(और संतोष का भाव लिए
अनभिज्ञता की नकाब ओढे
कुछ चेहरे
छुपे हुए मज़बूत दीवारों के भीतर)

जहाँ माथे का फैला हुआ सिन्दूर था
जहाँ थी कुरआन
गीता और बाइबिल
लुढकी हुई दूध की बोतल
और उन सबके पीछे
अट्टहास करता हुआ
एक घिनौना चेहरा

कैलक्यूलेटर
केवल मुर्दा चेहरों का
हिसाब बता सकता है
ज़िन्दा चेहरों का नहीं

मुझे तलाश है ज़िन्दा चेहरों की
जो आज व्यवस्था की आड़ लेकर
हमारी परिधि से बाहर हैं

कैलक्यूलेटर
कल तुम्हारे हाथों में होगा
और तुम लगाओगे
उन चेहरों का हिसाब
जो कल ज़िन्दा नहीं बचेंगे.

( नवभारत में प्रकाशित 1985).

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