रायगढ ःः अमीर चंद अग्रवाल राहगीर को याद करते हुये. विशेष . ःः गणेश कछवाहा

अमीचन्द अग्रवाल ‘राहगीर’के 12वें दिवस पर 4 दिसंबर को विशेष—

‘राहगीर’ अपनी राह चल पड़े.

3.12.2018ःः रायगढ 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,पूर्व विधायक जननायक रामकुमार अग्रवाल के ज्येष्ठ सुपुत्र अमीचन्द अग्रवाल ‘राहगीर’ अपनी 78 वर्ष की सन्तुष्ट और तृप्त जीवन यात्रा को पूर्ण करते हुए 23 नवम्बर को रायपुर हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। सुपुत्री तृप्ति ने मुखाग्नि देकर सांसारिक उत्तरदायित्व का निर्वहन किया।पिताश्री जननायक के संस्कारों को जीते हुए अपनी धर्मपत्नी श्रीमती जानकी,अपने भाइयों डॉ दुलीचंद,डॉ रमेश, जयप्रकाश, कैलाश, डॉ राजू एवं अजय तथा सुपुत्रियाँ संगीता, बबिता,संतोष और तृप्ति को समृद्ध संस्कारिक विरासत सौंपते हुए ,’राहगीर’ अपने परिजनों ,शुभचिंतकों एवं दोस्तों को अलविदा कहते हुए अंनत यात्रा में निकल पड़े,या यूं कहें कि ‘राहगीर’अपनी वास्तविक राह में चल पड़े।

अमीचंद जी ने परिवार की शिक्षा दीक्षा एवं संस्कार पर विशेष ध्यान दिया।बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की एक सराहनीय मिशाल है।धर्मपत्नी जानकी देवी अग्रवाल समाज की प्रथम महिला स्नातक। 5 पुत्रियां प्रथम संगीता एम.ए.हिस्ट्री ( पति के ई ई पीएचई श्री सुरेश माहेश्वरी बिलासपुर,* बबीता एमएससी पति श्री अनूप अग्रवाल बैंक मैनेजर रायपुर,* तृतीय स्वर्गीय रचयिता एम ए पति श्री अरुण अग्रवाल कैमूर जिला कटनी में सफल व्यवसाई,*चतुर्थ डॉक्टर संतोष पीएचडी फिजिक्स जो वर्तमान में सऊदी अरबिया में सेवारत है पति श्री रविंद्र गुप्ता रिसर्च साइंटिस्ट तथा सबसे छोटी तृप्ति बी.ई. एवम एमबीए एवं स्कूल गार्जियन एंड गाइड का संचालन पति श्री शिरीष शारडा,9 नाती नतनिनों का भरा पूरा परिवार जो विदेशों में भी सेवारत हैं एवं अध्ययनरत है।

उनकी अपनी जीवन शैली थी।सुबह जल्दी उठना,कमला नेहरू उद्यान में टहलना,फिर एक चाय की टपरिया में मित्रों के साथ गपशप मारते हुए चाय की चुस्कियां लेना,फिर एक मित्र की दुकान में बैठकर सुबह सुबह की ख़बरों से रूबरू होना, अखबार पढ़ना उसके बाद अपने शैक्षणिक संस्थान गार्जियन गाइड स्कूल एवं जानकी कॉलेज ऑफ एजुकेशन की व्यवस्था एवं प्रबंधन की गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन करना।संध्या फिर टहलते हुए जिला ग्रंथालय जाना,अध्ययन करना इष्टमित्रों से देश दुनिया व सुख दुख की चर्चा करना, और फिर मित्रों के साथ रेलवे स्टेशन में बैठकर राहगीरों को देखते और मित्रों के साथ स्मृतियों को ताजा करते।।यहीं से जीवन के रहस्य को जानते ,समझते, सीखते टहलते हुए घर पहुंचना।यही उनकी स्वस्थ एवं सुखी जीवन शैली थी।

सरल ,सीधा,मिलनसार,मैत्रीपूर्ण जीवन था। आपके मित्रों की एक समृद्ध सूची है जो रायगढ़ के दानीपारा से निकलते हुए सोवियत रूस तक जाकर जुड़ती है। सभी के साथ भाई -चारे के रिश्ता था ।कुछ जीवन के सुख -दुख के अभिन्न साथी थे। रवि मिश्रा ,पी एस खोडियार, जयंती सांवरिया, जयनाथ पटेल ,अनुपम दासगुप्ता,अमोलक सिंह उनके दैनिक जीवनचर्या के मित्र थे।जिला ग्रंथालय उनके अध्ययन एवं वैचारिक चर्चाओं का मुख्य केंद्र था।

साहित्य, इतिहास, एवं पुरातत्व में काफी रूचि थी।इतिहास एवं पुरातत्व शोधसंस्थान,बालाघाट मध्यप्रदेश से जुड़े रहे,तथा छत्तीसगढ़ राज्य के अध्यक्ष पद के लिए चयनित किया गया।बालाघाट में एक भव्य समारोह में सम्मानित भी किया गया।रायगढ़ जिले के प्रमुख शैलाश्रय सिंघनपुर,(भूपदेवपुर) ओंगना(धरमजयगढ़)करमागढ़, कबरापहाड़ आदि स्थानों के भ्रमण एवं अध्ययन में लगातार सक्रिय रहे।आपकी साहित्यिक प्रतिभा को आचार्य विनय मोहन शर्मा, पंडित रामेश्वर शुक्ल अंचल,डॉ प्रभु दयाल अग्निहोत्री का अगाध स्नेह व शुभाशीष प्राप्त हुआ।महाविद्यालय में साहित्य सचिव के पद पर आपकी सांस्कृतिक रचनात्मकता अभिव्यक्त होने लगी।आपको आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ रामकुमार वर्मा,गोपाल दास नीरज एव बाबा नागार्जुन जैसे मूर्धन्य सहित्यकारों का स्नेह,आशीर्वाद व सानिध्य प्राप्त हुआ।

पिताश्री स्वंतत्रता संग्राम सेनानी ,पूर्व विधायक जननायक रामकुमार अग्रवाल के संस्कार और आपकी विलक्षण रचनात्मक सांस्कृतिक प्रतिभा के कारण आपको *”भारत -सोवियत रूस सांस्कृतिक समिति का उपाध्यक्ष पद से विभूषित किया गया।भारत-रूस सांस्कृतिक संघ के तत्वावधान में गांधी-लेनिन शताब्दी समारोह में 134 भारतीयों का दल 01ऑक्टोबर1970 से 15 ऑक्टोबर 1970 तक सोवियत संघ के विभिन्न स्थानों लेनिन ग्राड, ताशकंद, समरकंद,आदि स्थानों की यात्रा की।इस दल में मध्यप्रदेश से केवल चार सदस्य थे उसमें आप शामिल थे।यात्रा से वापस आने के बाद आपकी पहली काव्य “संग्रह मैत्री के सेतुबंध” काफी चर्चा में रही।बहुत सराहा गया।इसका द्वितीय संस्करण 16 फरवरी 2016 को इतिहास एवं पुरातत्व शोधसंस्थान बालाघाट मध्यप्रदेश ने प्रकाशित किया और एक भव्य समारोह में आपको सम्मानित किया ।

अमीचन्द जी *’इंडिया सोवियत कल्चरल सोसाइटी,(इसकस)रायगढ़,* के उपाध्यक्ष थे। भारत की बहुत सक्रिय इकाई थी।इसलिए भारत-सोवियत सांस्कृतिक आदान प्रदान के तहत सोवियत रूस का एक जत्था रायगढ़ आया था।पूरे देश की नजर इस पर थी।एक गरिमामय कार्यक्रम रामनिवास टाकीज़ में आयोजित किया गया।जिसमें उज़्बेकिस्तानी वेशभूषा में आकर्षक व मनोहारी बैले नृत्य ,हिंदी फिल्मी गाने *”मेरा जूता है जापानी —–, “नील गगन के तले——।* की कलात्मक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया।

छत्तीसगढ़ पृथक राज्य का आंदोलन जोर पकड़ रहा था। छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक राजकीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पा रहा था ऐसी विकट परिस्थितियों में विदेशी साहित्य विशेषकर वियतनामी, रूसी, जापानी, मारीशस, युगांडा की लोक कथाओं एवं कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद एक ऐतिहासिक महत्व की बात थी। सोवियत साहित्य का छत्तीसगढ़ी में प्रथम अनुवाद *’भाषा का जादू’* 14 जनवरी2001 में प्रकाशित हुई।जिसकी विद्वानों ने प्रशंसनीय समीक्षा की।प्रकाशित कृतियाँ -*मैत्री के सेतुबंध,*नई सुबह की नई किरण (काव्य संग्रह),*भाषा का जादू सोवियत साहित्य का छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रमुख हैं।

अमीचन्द अग्रवाल ‘राहगीर’ एक मौन साधक की तरह अपने कर्म साधना में लीन रहे ।स्थानीय, राज्य,राष्ट्रीय एव अंतर्राष्ट्रीय मान-सम्मान की समृद्ध सूची है जो स्मृतियों एवं धरोहर के पटल पर चिर स्थायी रहेंगी और प्रेरणा देती रहेंगी।

सादर नमन।विनम्र श्रद्धांजलि।-(रवि मिश्रा एवं पी एस खोडियार के संस्मरण एवं सहयोग से साभार 

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