आज मेरी कहानी, अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस पर ःः राजीव रंजन प्रसाद .

3.12.2018

राजीव रंजन प्रसाद ,छतीसगढ के आदिवासियों पर लगातार लिख रहे हैं .नक्सलवाद और उसके दुष्प्रभाव तथा अन्य एतिहासिक संदर्भ पर लगभग 14 पुस्तकों के लेखक राजीव रजन ने अपने साथ हुई दुर्घटना का विवरण लिखा है.

आज अपनी कहानी। उन दिनों मैं इन्दौर के एंवायरन्मेंट इंजीनियरिंग सर्विसेज में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहा था। कैरियर ठीक दिशा की ओर जा रहा था। इसी मध्य अहमदाबाद में गुजरात पीएससी के इंटरव्यू से लौटते हुए मुझे उसी पैर में गंभीर चोट लग गयी जिसमें पहले से ही पोलियो था। नौकरी छोडनी पड़ गयी।

विशाखापट्टनम में ऑपरेशन हुआ, इलीजारोव तकनीक से लिम्ब लेंथनिंग की गयी। इलीजारोव तकनीक कितनी दर्दनाक प्रक्रिया होती है यह इससे गुजरने वाला व्यक्ति ही जानता है। मेरे पोलियो प्रभावित पैर की टीबिया-फेब्यूला दोनो हड्डियाँ तोड कर तीन स्थानों से आरपार सूईयाँ डाल कर, बाहर तीन लोहे के छल्लों से उन्हें जोड दिया गया। ये छल्ले हड्डियों के विकल्प के रूप में शरीर के बाहर समानांतर रॉड से जुडे हुए थे। दिन में चार बार इन रॉड में लगे नट-बोल्ट को घुमाना होता था जो हड्डीयों में गैप उत्पन्न करता, यही गैप बोल फ्लुईड से भरता जाता इस तरह लिम्ब की लम्बाई को साढेतीन इंच बढाना था। यह प्रक्रिया अपने हाथों अपने ही पैर पर बिना धार वाली आरी चलाने जैसी है। बोल्ट घुमाते ही बारह स्थानों से मांसपेशियाँ कटतीं, बारह स्थानों से रक्तस्त्राव होता, नसें खिंचती, असहनीय पीडा……।

 

पूरी तरह बिस्तर पर रहने के दौरान मैंने अपने भीतर निराशा को घिरता महसूस किया। अब बारी इससे लडाई की थी। ये लडाईयाँ मानसिक होती हैं। मैंने इस अवस्था में भी काम करने का निश्चय किया। रायपुर में इंडस टेक्निकल एण्ड फाईनेंशियल कंसल्टेंट के अध्यक्ष श्री ललित सिंहानिया जी से पत्र के माध्यम संपर्क किया। साक्षात्कार देने गया उस दौरान मेरे पूरे पैर ही नहीं कमर से कुछ उपर तक प्लाटर लगा हुआ था।

मुझ पर श्री सिंहानिया Singhania Lalit Kumar ने विश्वास दिखाया और मैंने पर्यावरण वैज्ञानिक के रूप में वहाँ फिर नयी शुरुआत की। इन समयों ने मुझे हताश नहीं किया था बल्कि एक पल को भी नहीं लगा कि अवरोध मुझे हरा सकते हैं। जब एनएचपीसी की रिटन परीक्षा देने गया था तब मेरे पैरों में रिंग लगे हुए थे और जब साक्षात्कार देने गया तब मैं प्लास्टर में था। प्लास्टर कटा, फिजियोथेर्पी के लिये अधिक समय नहीं मिला, मेरा एनएचपीसी में चयन हो गया और मैं पारबती परियोजना, कुल्लू , हिमाचल प्रदेश आ गया।

 

मैंने लेखन की अपनी दिशा भी टेबल पर बैठ कर की गयी कल्पनाशीलता को नहीं चुना। मेरा विषयवस्तु था बस्तर जो कि देश का आंतरिक सबसे भयावह युद्धरत क्षेत्र गिना जाता है। मैं यहाँ के कठिन से कठिन छोर तक गया, यहाँ के पहाडों के ऊँचे से ऊँचे शिखर को छुआ। कांकेर के गढिया पहाड पर चढा, ढोलकल शिखर पर तिरंगा फहराया। आज भी मुझे चलने के लिये छडी की सहायता लेनी पडती है लेकिन सच कहूं तो मेरे पंख सलामत हैं इसलिये फिक्र क्या? मुझे अपने आत्मबल पर गर्व है, मेरी कहानी किसी निराशावादी साथी के लिये प्रेरणा बन सकती है इसी लिये सामने रख रहा हूँ। आज अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस पर उन साथियों को सहर्ष शुभकामनायें, जो विशेष योग्यता के साथ इस धरती पर हैं।

 

राजीव रंजन प्रसाद

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