दस्तावेज़ ः तथ्यात्मक संदर्भों में ः गुरुघासीदास के पूर्व पेशवा मराठों के अत्याचार .ःः लखनलाल कुर्रे सुबोध .

3.12.2018

लखन लाल कुर्रे , सुबोध .
केन्द्रीय संयोजक, गुरूघासीदास सेवादार संघ .

1.मराठा शासकों ने आम लोगों को लूटने-खसोटने की नीति को राज्य की मान्य नीति बनाया। मराठों कर अधिकारी अत्यन्त निर्ममता से लगान व विविध राजनकीय टैक्स वसूला करते थे।खड़ी फसलों को लूट लिया जाता था।मराठा सिपाही फसल होने के तुरंत बाद लगान के लिए डेरा डाल देते थे और पूरा लूट खसोट करते थे।लोगों को आतंकित कर मारपीट करते।इन स्थितियों के बार-बार पुनरावृत्ति से कई लोग अन्यत्र पलायन का जाते थे।आज की ग्राम मड़वा(गिरौदपुरी से करीब 3-4की मि. दूर पर स्थित) जो गुरुघासीदास का ननिहाल गॉव है,के लोगों के पूर्वज इसी तरह की परिस्थितियों में रतनपुर राज को छोड़कर सोनाखाना राज इलाके में आकर बस गये थे।

2.बैठ -बेगार व्यवस्था जिसके अंतर्गत आम लोगों को सामंतों -कथित बड़े लोगों के कामों को बिना किसी मजदूरी कीमत के कभी भी कहीं भी करने के लिए बाध्य होते थे।को क्रूरतम रूप से लागू किया गया।खेतिहर/कृषक वर्ग ज्यादा से ज्यादा लूटखसोट से ऋण ग्रस्त होते गये।हारी-बीमारी में बड़े लोगोँ ,साहूकारों के चंगुल में फंसा होना करीब सभी आम लोगों की नियति थी।
लूट-खसोट का एक तरीका यह भी बनाया गया कि सैनिकों की तनख्वाह को रोककर उन्हें व्याज पर पैसा साहूकारों से दिलाया जाता और गुप्तचरों से सम्पन्न घरों का पता लगवाकर अपने सैनिकों से लुटवाता था।
खेतिहर सबेरे से सूर्यास्त तक काम करते थे।उन्हें रात दिन कोलहुं के बैल की तरह कभी अपने नियमित मालिकों या नये पुराने आक्रांताओं की गुलामी ढोना पड़ता था।

3.पूर्व में चल रहे आदिवासी राज-काज के विपरीत मराठों ने तानाशाही पूर्वक परिवर्तन करके समाज को लूटने के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू किया।मराठों से तय शर्तों व ठेका आधार पर राजकाज में मनमाने दोहन व लूटखसोट किया जाने लगा।ये ठेकेदार -सूबेदार अपने निजी स्वार्थों से प्रेसित होकर सिर्फ धन संचय करना ही उनका सर्वमान्य उद्देश्य होता था।इसी संचय से वे अपने एवं अपने उच्चतर आकाओं ,राजाओं व केंद्रीय हुक्मरानों की तिजौरियों को भरता था।इससे राज्य में केवल लूट-खसोट,आतंक,जुल्म-पीड़ा का ही वर्चस्व रहा।

4. प्रशासनिक उच्च अधिकारी,मंत्री आदि अपने स्वामी मराठा शासकों की तरह अत्यंत लोभी एवं भ्रष्ठ थे।पैसे की लालच में प्रशासनिक गोपनीयता को अंग्रेजो को पहुँचाते थे और हर तरह की साजिश रचते थे।

5.अपराध एवं न्याय व्यवश्था पूरी तरह वैदिक संहिताओं ,परंपराओं पर आधारित होता था ।सारा न्याय लुटेरों के पक्ष में एवं आमजनों के विरोध में होता था ।

6.आम लोगों के तन पर कपड़े नही हुआ करता था।सिर्फ लंगोट ही नाममात्र का वस्त्र था। वह सुंदर वस्त्र ,गहने, आभूषण पहनने का अधिकार नही था।जानवरों की तरह रहने-खाने के लिये आदेशित किया जाता था ।गन्दा पानी पीकर महामारियों के शिकार हुआ करते थे।जब लोग बीमारियों से मरते तो उल्टे उन्हें पाप की सजा मिलने का धार्मिक कानून कहा जाता था और उस महामारी का कारण अछूतों/कमजोरों पर मढ़कर उन्हें खूब पीटा जाता था।।

7.यहाँ का अधिकतम व्यापार जबलपुर एवम नागपुर से होता था।यहां के वनोपज फसल एवम बहुमूल्य मेवा अन्य उपज आदि को मिटटी के भाव में व्यापारी लेते (लूटते) थे और बाहरी जगहों में बेचकर बेहिशाब मुनाफा कमाते थे।मराठा शासकों ने आम आदमी को “मनी प्रोड्यूसिंग मशीन (धन पैदा करने वाली मशीन) माना और मनमाना शोषण किया।

8. मराठों के शासन के पूर्व यहां आदिम /प्राकृतिक चरित्र के धर्म को बोलबाला जिसे आमतौर पर गोंडवाना गोंडी,धर्म के नाम से संबोधित किया जाता है।ये अपने विश्वासों में सहज -स्वभाव आदिम-चरित्र के थे और वैदिक ( हिन्दू) धर्म के विपरीत ऊंचनीच -भेदभाव से मुक्त था।लेकिन मराठा शासक पूरी तरह से निरंकुश एवम मानवीय भेदभाव परक सामंती श्रेणी वर्ग को स्थापित करने एवं आम लोक समाज को लूटने में ही विशवास करने वाले धर्म को स्थापित किया।वर्ण ,जाति आधारित धर्म -राज्य व्यवश्था में सवर्ण किसी भी सम्पत्ति को बेहिचक हड़प सकता था।ब्राम्हणों को दान देने की राजकीय बाध्यता थी।

9. उच्च वर्ग का घर शोभयमान होता था लेकिन कथित निम्न लोग अपने घरों को कूडाकरकट के ढेर सा दिखने जैसा बनाने का राजकीय धार्मिक कानून था ।

10. कथित श्रेणी वर्ग उच्च सम्मान देने के लिए शूद्रों को अनेक उपक्रम करने होते थे।जैसे यदि किसी रास्ते मे ब्राम्हण जा रहा हो और उसी रास्ते के पिच्छे से शुद्र आ रहा हो तो शुद्र भले ही अपने बीमार बच्चे की दवा लाने जा रहा हो ,वह तेजी से चलकर ब्राम्हण के आगे नहीं निकल सकता था,क्योंकि ऐसा करने से ब्राम्हण का अपमान होता।

11.विवाह आदि शुभ अवसर पर धोती-कमीज ,जाकिट ,पनही,डोला प्रतिष्ठित आसन आदि चीजों को आमजन व्यवहार नही कर सकता ।उन्हें राजकीय धार्मिक आदेश था कि वे जो करें वह अभद्र व पशुवत व्यवहार सा दिखाई दे सवर्णों को सिवाय अन्य जन ,सवारी नही कर सकता था न ही अपने घर पर झंडा फहरा सकता था।

12. शूद्रों की स्त्रियों को मनचाहे उपभोग करने का अधिकार उच्च वर्णों को प्राप्त था ।यह जघन्य अपराध नहीं बल्कि राज्य व धर्म प्रदत्त दैवीय अधिकार समझा जाता था।स्त्रियां इंसान नहीं बल्कि उपभोग का साधन मात्र समझा जाता था।

13.आदि प्रकृति पूजक लोकधर्म में वैदिक धर्म जैसा किसी कर्म को हिंन घोषित कर उसके करने वाले को नीचा या अच्छूत नही माना जाता था।इसलिए आदिवासी राज व्यवश्था में हजाम बनाने के लिए नाई, वस्त्रादि सफाई के लिए धोबी तथा जूता बनाने के लिए चर्मकार अलग से मुकर्रर नही करते थे।इस काम को खुद सहज स्वरूप में कर लिया करते थे और इसे किसी भी तरह से हेय नहीं समझते थे।लेकिन मराठा शासक के अंतर्गत उनके धर्म प्रचारक व घुसपैठिये बहुत चालाकी एवं झूठ-मूठ के कथा -कहानी गढ़कर आदिवासियों के बीच भेदभाव को लागू करने लगे थे।अपनी पैठ मजबूत करने के लिए आदिवासी गीत-गायन ,श्रद्धा ,पूजा उपवास में वैदिक पौराणिक कथा पात्रों को रूपांतरित करते गये।

14. शूद्रों को तोड़ने उन्हें अलग-थलग करने के लिये छूत एवम अछूत शुद्र अर्थात जिन्हें छुआ जा सकता है और जिन्हें छुआ नही जा सकता है,के भेद को बनाये रखने के लिए जमीन आसमान एक करके हजारों कथा -कहानियों को गढ़ा-पढा गया ।अछूतों को जानवर के बांधने की जगह बिठाकर किसी अछूत के हाथों ही किसी पर्व आदि के मौके पर मिठाई पठा दी जाती थी।यह कई अछूतों के प्रति बहुत परोपकार एवं एहसान करने वाला माना जाता था।जातीय भेद -उत्पीड़न व असामानता अपनी चरम अवस्था मे थी।

15. स्त्री व शुद्र को विद्याध्यन का अधिकार नही था।उन्हें स्पस्ट एवं क्रूरतम रूप से विद्या -ज्ञान से बहुत दूर रखा जाता था।उन्हें जानवर से भी बददत्तर स्थिति में रहने को विवश किया जाता था।इससे वे घोर गरीबी ,बीमारी से ग्रस्त जीवन जीते थे।इस कारण उनमें डर-भय ,अंधविश्वास,पिछड़ापन रच-बस गया था।

16. वैदिक विधि -विधान के अनुसार ज्ञानवान होने पर भी विप्र की पूजा की जाती थी और शूद्र के अपार ज्ञानी एवं गुणी होने पर भी पूजा नहीं कि जाती थी।वैदिक धर्म का मूलमंत्र था जन्मना श्रेष्ठ -अश्रेष्ठ का सिद्धान्त मानना ।

17. ईश्वरीय चमत्कार तथा पाप-पुण्य का घनघोर चक्कर चलाकर स्त्रियों की इज़्ज़त लूटने के लिए देवदासी प्रथा का प्रचलन था ।उन्हें बहला फुसलाकर एवं ईश्वरीय प्रावधान बताकर पंडे-गुंडे जगगन्नाथ पूरी की यात्रा में ले जाते एवं धार्मिक मायाजाल में फँसाकर औरतों को देवदासी बनाकर मनमाने ढंग से भोगते,/लूटने का काम होता था।

18. समाज मे सती प्रथा विधवा विवाह निषेध ,नरबलि ,नवद्दोद्ध ,पालकी प्रथा (ऐसी घिनौनी प्रथा कि शादी के बाद बहु का उपभोग सामंत पहले करता था बाद में व्याहता पति करता था।आदि घृणास्पद क्रूरतम प्रथाएं विद्यमान थी।पूरे समाज मे राजा -सामंतों एंव उनके कारिंदों की मर्जी ही कानून हुआ करता था ।ऐसे सामंती समाज मे आमजन पूरी तरह बेबस व लाचार था।

19. विविध कुप्रथाओं, जुल्म ज्यादतियों के साथ आम जनमानस धर्म-ईश्वर की शरण मे अपनी पीड़ा को भुलाने विविध उपक्रम करता था।
ऐसे उपक्रम में से एक सत्संग व संगत का आयोजन कुछ समय के लिए उन्हें ईश्वर द्वारा न्याय करने की आस में समय बिताता था,लेकिन इस कुछ समय की सांत्वना के बाद आख़िरतौर पर वह ठोस धरातल में मौजूद सामंती शोषण -ज्यादतियों के चक्कर मे फंसा हुआ होता था।

ऊपरोक्त बिंदुओं के अध्ययन से यह स्पस्ट है कि गुरुघासीदास के जन्म के करीब 30 वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ में मराठा शासन का सामंती शोषण व अन्याय भयंकरतम रूप से मौजूद था।उस समय को दर्शानेवाला इतिहासग्रंथ एवं gvss के शोध निष्कर्षों से यह साफ है कि गुरुघासीदास की समकालीन परिस्थितियां आम लोगों के लिए बहुत भयावह था।

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लखन लाल कुर्रे , सुबोध .
केन्द्रीय संयोजक, गुरूघासीदास सेवादार संघ .

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