वेदान्त, इस्लाम और विवेकानन्द ःः कनक तिवारी .

30.11.2018.

हरिभूमि में प्रकाशित लेख 

विवेकानन्द वांग्मय में ‘इस्लाम‘, ‘मोहम्मद‘ जैसे शब्द सैकड़ों बार आए हैं। गुरु श्रीरामकृष्णदेव ने हिन्दू धर्म, इस्लाम और ईसाई मत में अपूर्व एकता खोजी। विवेकानन्द के मुताबिक श्रीरामकृष्णदेव उस एकता के अवतार थे।‘ (विवेकानन्द समग्र खंड-10, पृष्ठ-218) विवेकानन्द के लिये धर्म न तो सिद्वान्तों की थोथी बकवास, न ही मत-मतांतरो की मेरी मुर्गी की टांग या सिर फुड़ौव्वल और न ही महज बौद्विक सहमति है। अंतर में सत्य का अहसास ही धर्म है। विवेकानन्द ने कहा बौद्ध, इस्लाम और ईसाई धर्मांतरण करते हैं। उसमें मुसलमानों ने शक्ति का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया। अच्छाइयों के बावजूद इस्लाम की हिंसक प्रवृत्तियों को लेकर विवेकानन्द को परहेज था।

विवेकानन्द ने आज से एक सौ पच्चीस वर्ष पहले शिकागो धर्म सम्मेलन में कालजयी भारतीय संदेश दिया। इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर उससे भाईचारे और समझदारी का पौधा रोपा जा सकता है। चार अखबारों ‘हेराल्ड‘, ‘इंटर ओशन‘, ‘ट्रिब्यून‘ और ‘रेकाॅर्ड‘ ने उनके भाषण के अलग अलग हिस्से छापे। ‘हेराल्ड‘ रिपोर्ट बेहतर थी। उनके इस वाक्य पर धर्मसंसद में सबसे पहले तालियां बजीं। ‘मुझे आपको बताते हुए गर्व है मैं ऐसे धर्म को मानने वाला हूं जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में ‘एक्सक्लूजन‘ (बहिष्कार) शब्द का अनुवाद नहीं हो सकता।‘ मेरी लुईस बर्क ने 1958 तथा 1973 में ‘स्वामी विवेकानन्द-सेकेंड विजिट टू वेस्टः न्यू डिस्कवरीज़‘ शीर्षक से शोध सामग्री बटोरी। 1983 में प्रकाशित उनकी किताब में विदुषी लेखिका ने यही कालजयी वाक्य बीसवीं सदी की सांझ के हवाले किया।

विवेकानन्द ने भारत में इस्लाम के आगमन को ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण माना। इसलिए भारत में इस्लाम को समझने विवेकानन्द सहायक हैं।

1. ‘मुसलमानों के शासन ने सामंती एकाधिकारवाद को तोड़ा। मुसलमानों की भारत-विजय दलितों और गरीबों का मानो उद्धार करने के लिए हुई थी।‘ (5/1887)

2. इस्लाम दुनिया में यह प्रचार करने आया है कि उसके अनुयायियों का एक दूसरे के लिए भाईचारा इस्लाम का सारतत्व है। (4/136)

3. मुसलमानों के लिए हिन्दुओं को जीत सकना हिन्दुओं द्वारा दुनियावी समस्याओं की अनदेखी के कारण हुआ। सिले हुए कपड़े तक पहनना मुसलमानों ने सिखाया। (3/334)

4. इस्लाम जहां गया, मूल निवासियों की उसने रक्षा की। वे जातियां, भाषाएं और जातीय खूबियां आज भी मौजूद हैं। (10/113)

5. भारत के गरीबों में इतने मुसलमान क्यों हैं? यह बकवास है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला। जमींदारों और पुरोहितों से अपना पिण्ड छुड़ाने उन्होंने ऐसा किया। बंगाल में जमींदार अधिक हैं, वहां हिन्दुओं से अधिक मुसलमान किसान हैं। (3/330)

विवेकानन्द ने कहा कि हिन्दू ही मुगलों के सिंहासन के आधार थे। जहांगीर, शाहजहां, दाराशिकोह सभी की माताएं हिन्दू थीं। (10/59) शिक्षित मुसलमान सूफी हैं। हिन्दू विचार उनकी सभ्यता में रम गया है। मुगल सम्राट महान अकबर व्यवहारतः हिन्दू था। (4/332) वेदांत की आध्यात्मिक उदारता ने इस्लाम पर अपना मुकम्मिल असर डाला है। इसलिए भारत का इस्लाम संसार के अन्यान्य देशों के इस्लाम की अपेक्षा पूरी तरह अलग है। (10/377) विवेकानन्द के अनुसार मुसलमानों के मन में भरोसा कम होने से यहूदी या ईसाई उतनी घृणा के पात्र नहीं हैं जितने काफिर और मूर्तिपूजक होने के कारण हिन्दू हैं। फिर भी हिन्दुओं ने कभी भी धार्मिक उत्पीड़न का सहारा नहीं लिया। एक मुसलमान संत की दरगाह जो मुसलमानों द्वारा उपेक्षित और भुला दी गई है, वह हिन्दुओं द्वारा पूजी जाती है। (9/115)

विवेकानन्द समुद्र पार जाने वाले भारत के प्रथम यायावर हिन्दू संन्यासी थे। उन्होंने अमेरिका, इंग्लैंड सहित पश्चिम के कई पूंजीवादी मुल्कों की छाती पर भारतीय विचारों की श्रेष्ठता का परचम साहस के साथ फहराया। उनकी अमेरिकी यात्रा शेर की मांद में घुसकर चुनौती देने की कोशिश थी। उन्होंने आज की मालिक सभ्यता के पुरखे ईसाई धर्म की दार्शनिकता, इतिहास और अवयवों पर तार्किक प्रहार किये। उसका समानान्तर ढूंढ़ना मुश्किल है। विवेकानन्द सर्वधर्म समभाव के प्राचीन ऋषि आदर्शों का नया संस्करण बनकर अंतरिक्ष तक फैले। आज के सम्प्रदायवादियों और कठमुल्ला धार्मिक नेताओं के लिए विवेकानन्द ने कहा था, ‘धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सबकी परीक्षा करना आवश्यक है। धर्म यह दावा क्यों करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित नहीं होना चाहता। तर्क के मापदण्ड के बिना किसी भी प्रकार का सही फैसला धर्म के बारे में भी नहीं दिया जा सकता। (8/43)

धर्मनिरपेक्षता संविधान का उद्देश्य, ऐलान और अलंकरण है। उसकी व्याख्या, परिभाषा और नीयत को लेकर बावेला मचा हुआ है। क्यों नहीं विवेकानन्द के उद्गारों को संविधान की पोथी के माथे पर प्रत्येक भारतीय की शपथ के रूप में लिख दिया जाए। उन्होंने कहा था प्रत्येक सम्प्रदाय जिस भाव से ईश्वर की आराधना करता है। मैं उनके साथ ही ठीक उसी भाव से मुसलमानों के साथ मस्जिद में जाऊंगा। ईसाइयों के साथ मैं क्रूसित ईसा के सामने घुटने टेकूंगा। बौद्धों के मंदिर में बुद्ध और संघ की शरण लूंगा। जंगल में जाकर हिन्दुओं के पास बैठ उनकी तरह सबके हृदय को रोशन करने वाली ज्योति के दर्शन करने में सचेष्ट होऊंगा। (3/138)

विवेकानन्द को भारत और वैदिक धर्म के बुनियादी ढांचे की मजबूती का आत्मविश्वास था। वह उनके बाद गांधी में मिलता है। मातृभूमि के लिए दोनों विशाल मतों का सामंजस्य, हिन्दू धर्म और इस्लाम, वेदान्ती बुद्वि और इस्लामी शरीर, यही एक आशा है। मैं अपने भावी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूं जिसका इस विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप में वेदान्ती बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ उत्थान होगा। (6/405)

जड़, धर्मान्ध, कट्टर साम्प्रदायिक, हठधर्मी तथा संकीर्ण बुद्धिजीवियों का जमावड़ा विवेकानन्द को महान् ‘हिन्दू संत‘ सिद्ध करने में लगा है। ताजा हवा के झोंके की मानिन्द भारतीय इतिहास में आए विवेकानन्द व्याख्याओं की भिंची मुट्ठी में कैद नहीं किए जा सकते। उनके कुछ और वाक्य कुरेदते हैं, जिनके बरक्स कुछ लोग महान् भारत की जड़ें खोद रहे हैं-

(अ) बौद्ध , ईसाई, मुसलमान, जैन सबका भ्रम है कि सबके लिए एक ही कानून और नियम हैं। जाति और व्यक्ति के प्रकृति भेद से शिक्षा और व्यवहार के नियम सभी अलग अलग हैं। बलपूर्वक उन्हें एक करने से क्या होगा?

(आ) संसार में एक दूसरे के धर्म के प्रति सहिष्णुता का यदि थोड़ा बहुत भाव आज कहीं मौजूद है तो भारत में है। हम भारतवासी मुसलमानों के लिए मस्जिदें और ईसाइयों के लिए गिरजाघर भी बनवा देते हैं। (5/14)

(इ) जब दूसरे देशों के मुसलमान यहां आकर भारतीय मुसलमानों को फुसलाते हैं कि तुम गैर मजहबियों के साथ मिल जुलकर कैसे रहते हो। तब ही अशिक्षित कट्टर मुसलमान उत्तेजित होकर दंगा फसाद मचाते हैं। (10/377)

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