28.11.2018. सविता तिवारी

💠 हां, कुछ बदल सी गई है सवि .

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खुद का कदर करना सीख गई है,
खुद के लिये जीना सीख गई है सवि,
त्याग दिया है उसने बेकदरों का साथ,
अब पूरे आल्हादित मन से खुद के लिये मुस्काती हैं सवि
खुद के लिये सजती संवरती और खुद पर ही इतराती है सवि
औरों के गम में गमगीन नहीं रहती
लाल चुनरिया हवा में लहराकर, खुद पर खुशियां बरसाती हैं सवि
हां, कुछ बदल सी गई है सवि ,
हां कुछ बदल सी गई है सवि,
हां, कुछ मुक्त मन से कुछ आल्हादित मन से .
पूरे आसमान को बांहों में समेटकर
उन्मुक्त , निश्चल ,मासूमियत के साथ
खुद के लिये मुस्कराना चाहती हूं, मैं.
हां, कुछ बदल सी गई हूं मैं .
कुछ बदल सी गई हूं मैं ,
क्योंकि परख़ से परे हैं मेरी शख्शियत मेरी .
मैं उन्हीं के लिये हूं जो समझें कद़र मेरी ..

मेरी कलम से मेरी भावनायें

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सुनो

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सुनो सावि उन सबसे ,
उन सब की खुशी के लिये .
हमेशा हमेशा के लिये अलग हो जाना.
जिन्हें तुम्हारी हर शय से एत़राज हैं ,
पर सुनो
तुम मायूस न होना
में हमेशा तुम्हारे साथ हूं.
मुझे कद़र हैं तुम्हारी …

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आज कुछ अजीब सा समय है .
तक़लीफ़ को निकाल फेंकने का ,
सकून हैं मन में.
पर
जिनसे तकलीफ मिली उन्हें
उन्हें तकलीफ जताकर सुनाकर
फिर से उन्हें तकलीफ देने का दुखः भी हैं, मन में.
सुकून और दुखः , कुछ, अजीब सा समय है आज .

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मन में जब कुछ ज्यादा दर्द होता है ,
तो चेहरे पर कुछ ज्यादा ही मुस्कान बिखरती है..

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सविता तिवारी मूलतः कवि नहीं हैं लेकिन कवितायें खूब लिखती है ,गध् भी खूब लिखती हैं .पेंसिल स्कैच की इनकी श्रंखला हैं .छतीसगढ खादी तथा ग्रमोध्योग में कार्यरत हैं .जब तक मे उनके साथ था तब तक उनकी इस प्रतिभा से अनजान ही था .

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