किसान मुक्ति मार्च ःः  मुश्किलें असाधारण होती हैं तो उनका प्रतिरोध भी असाधारण होता है.ःः बादल.सरोज.

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29.11.2018

आज दिल्ली में सब कुछ असाधारण था। देश भर से आये हुए हजारों किसान दिल्ली के चार कोनों ; सराय काले खां के पास #बाला_जी_साहब_गुरुद्धारे , #मजनू_का_टीला, #आनंद_विहार और #बिजवासन पर इकट्ठा हुये । पैदल पैदल मार्च करके रामलीला मैदान पहुंचे।

● रास्ते में उन्हें रोककर दिल्ली और जेएनयू विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर्स, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक और चिकित्सकों ने नाश्ते के पैकेट्स खिलाकर – पानी पिलाकर उनकी आवाज में आवाज मिलाई।

● दिल्ली और गाज़ियाबाद के मजदूर सीटू के झंडे और राष्ट्रीय नेताओं के साथ उसके साथ कदम से कदम मिलाकर न सिर्फ रामलीला मैदान तक की दूरी नाप रहे थे बल्कि मजदूर और किसान के बीच की दूरियां भी पाट रहे थे।

● रामलीला मैदान में उनकी तीमारदारी और देखरेख के लिए एम्स, ए एम यू और न जाने कितने कितने मेडिकल कॉलेजेज के महिला-पुरुष डॉक्टर्स ने तो जैसे अपनी पूरी फ़ौज ही उतार दी।

● वरिष्ठ पत्रकार पी साईंनाथ की अगुआई में बने नेशन फॉर फार्मर्स के साथ जुड़े अनेक युवा एक्टिविस्ट – जो अभी तक एक्टिविस्ट नहीं बने हैं वे भी – कई दिनों से इसकी तैयारी में जुटे थे। वे भी आज के समावेश में थे। कल भी रहेंगे।

● जेएनयू-दिल्ली विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं चारों कोनो के मुक्ति_मार्च से लेकर रामलीला मैदान तक अनथक रूप से वालंटियर बने हुए थे – ऊर्जा से सराबोर कभी 50-50 किलो की बोरियां, तो कभी बिछात की दरियाँ इधर उधर करते। मुक्तिकामियों को उनके लिए बनाये गए स्थान तक पहुंचाते। अँधेरे में डूबे कैंप को कभी अपनी मोबाइल की तो ज्यादातर अपनी आँखों की चमक से रोशन करते।

● ये किसान अपनी मुश्किलों – वे जगजाहिर हैं – की याद दिलाने नहीं आये थे। यूं भी अब वे उनकी नहीं रहीं समूचे भारतीय समाज का संकट बन गयी हैं। उन मुश्किलों से तो वे देश भर में अपने अपने इलाकों में लड़ ही रहे हैं।
#वे_आये_हैं “अपने” लोकतन्त्र में अपना हिस्सा मांगने ; यह मांग करने कि भारतीय संसद का एक विशेष अधिवेशन सिर्फ खेती-किसानी पर चर्चा के लिए बुलाया जाए। इस में दो क़ानून
(एक)फसल का लागत से ड्योढ़ा दाम देने का ऐसा क़ानून बनाया जाए जिसे लागू करने की बाध्यकारी जिम्मेदारी तय हो, सारी फसलें इसमें जोड़ी जाएँ।
(दो) किसान को हर तरह के कर्ज से पूर्ण मुक्ति देने वाला क़ानून बनाया जाए और केरल की तरह एक किसान ऋण राहत आयोग की स्थापना की जाए।

● यह मांग किसानों भर की मांग नहीं है। देश और समाज की मांग है। तार्किक बात है कि उनके वोटों से चुनी संसद जब अमरीका के राष्ट्रपति को सुनने के लिए, जीएसटी बिल पारित करने के लिए अपना विशेष अधिवेशन बुला सकती है तो उनकी सुनंने के लिए क्यों नहीं ?

● इन पंक्तियों को लिखते समय देश रामलीला मैदान में बैठा है। दिल्ली की सर्दी से निबटने के लिए समूहों में इकट्ठा होकर जोर जोर से गए रहा है, नाच रहा है, कविता-नाटक से अपनी व्यथा सुना रहा है। कल पार्लियामेंट स्ट्रीट पर जाकर प्रदर्शन करने की तैयारी में सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की रेल और दिन भर की पैदल यात्रा की थकान उतार रहा है।

● किसान जाग रहा है। 6 जून 2017 को जब मंदसौर में गोलियों से डराकर उसे सुलाने की कोशिश की गयी तबसे तो और भी गुस्से में जाग रहा है। अब वह 208 किसान संगठनों के साझे अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के झंडे तले मिलकर जाग रहा है। 29 को उसकी जगार दिल्ली ने देखी और 30 नवम्बर को उसकी हुंकार दिल्ली देखेगी – उसी के साथ देखेगी समाज के बाकी जागरूक और मेहनतकशों का उसकी हिमायत में होती कतारबंदी ।

● अपने संघर्षों और उसकी एकता को व्यापक से वृहत्तर करते हुए किसान एक इतिहास रच रहा है ; इतिहास गवाह है कि जो हुक्मरान उसकी नहीं सुनता उसे वह इतिहास के हाशिये से भी बाहर करने की ताब रखता है।

#किसान_मुक्ति_मार्च #Kisan_Mukti_March
(29-30 November 2018)

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