बाबरी मस्जिद  गिराने वाले बलवीर अब आमिर बनकर बनवा रहा है मस्जिदें : कट्टर हिंदू कैसे बन गया मुसलमान !

Manoj Singh Baghel

28.11.2018

मुंबई. कहते हैं कि धर्म का नशा अफीम से भी तगड़ा होता है. इंसान इस नशे में क्या न कर जाए. जब नशा उतरता है तो काफी देर हो चुकी होती है. एक ऐसे ही इंसान की कहानी जो धर्म के नशे में मस्जिद गिरा देता है और जब उसे अपनी गलती का एहसास होता है तो न सिर्फ वो उस मजहब को छोड देता है बल्कि प्रायश्चित करने के लिए 100 मस्जिदों के निर्माण की शपथ लेता है.
मोहम्मद आमिर की कहानी में एक्शन, रोमांच और ड्रामा सबकुछ है. इतिहास, राजनीति शास्त्र और अंग्रेजी में मास्टर्स की डिग्री लिए मोहम्मद आमिर के बारे में जानने के लिए 25 साल पीछे जाना पड़ेगा. आज मालेगांव के अपने आफिस में बैठकर कामकाज संभालते आमिर मालेगांव की मुस्लिम बिरादरी में जाना पहचाना चेहरा हैं. कभी कट्टर हिंदू रहा ये शख्स आज कट्टर धार्मिक मान्यताओं को पानी पी-पीकर कोस रहा है.

बलवीर सिंह ने हथौड़े से तोड़ी मस्जिद

करीब 25 साल पहले बलवीर सिंह उन मुट्ठीभर कारसेवकों में से एक थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद की गुंबद पर चढ़कर हथौड़े से वार किया था. ये उन चंद कारसेवकों में से एक थे जिन्हें बालासाहेब ठाकरे ने अपने आदमी कहा था. बलवीर सिंह से मोहम्मद आमिर बनने की यात्रा के बारे में वो कहते हैं कि मैं हरियाणा के पानीपत के पास एक गांव का रहने वाला राजपूत हूं. मेरे पिता दौलतराम कट्टर गांधीवादी व्यक्ति थे. उन्होंने बंटवारे के दंश को झेला था. उनकी पूरे जीवन भर ये कोशिश रही कि क्षेत्र के मुसलमान हमेशा सुरक्षित महसूस करें. वह अपने बेटों से भी उन्ही विचारों पर चलने के लिए कहते थे. बलवीर जब 10 साल के थे तब उनका परिवार गांव से पानीपत आ गया ताकि बच्चे शहर में आगे की पढ़ाई कर सकें. उनके मुताबिक शहर में गांव देहात से उनके जुड़ाव के कारण साथी बच्चों और स्कूल में हमेशा भेदभाव का सामना करना पड़ता था. उनके मुताबिक शहर में सिर्फ आरएसएस की शाखा ऐसी जगह थी जहां उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाता था. उन्हें पहली बार शाखा में आप कहकर संबोधित किया गया. जिसने तबके बलवीर को अंदर तक छू लिया.

 

90 के दशक में कैसे फैलती थी नफरत?

करीब 10 साल बाद बलवीर ने शिवसेना ज्वाइन कर लिया. अपने परिवार के बिजनेस को संभालने के साथ साथ बलवीर ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. उनके शाखा प्रेम से लोग ऐसा समझने लगे कि वो कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार हैं जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. नब्बे के दौर को याद करते हुए बलवीर कहते हैं कि मुसलमानों के खिलाफ संगठित रूप से नफरत फैलाने का काम जारी था. अगर आप बाएं हाथ से काम करते हैं तो लोग कहना शुरू कर देते थे कि तुम मुसलमान हो क्या. मुसलमानों के बारे में उनके इर्द गिर्द इस किस्म की बातें आम थी कि वो बाहर से आए हैं औऱ उन्होने हमारी जमीनों औऱ मंदिरों को नष्ट किया है. हरियाणा में उस वक्त मुसलमानों के खिलाफ एक माहौल बन गया था. ऐसे में वे भी उस मौके की तलाश में थे जिसमें वो अपनी मर्दानगी साबित कर सकें. अयोध्या विवाद ने उन्हें वो मौका दे दिया. बलवीर कहते हैं कि जब हम दिसंबर के पहले हफ्ते में घर से अयोध्या के लिए निकल रहे थे. तभी हम सबने तय कर लिया था कि कुछ किए बिना वापस नहीं आना है.

क्या हुआ जब 5 दिसंबर की रात को ?

5 दिसंबर को अयोध्या पहुंचने पर हर तरफ विश्व हिंदू परिषद के लोग फैले थे. एक तरह से उन्होंने फैजाबाद शहर को कब्जे में ले लिया था. भड़काऊ नारों ने उत्तेजना चरम पर पहुंचा दी थी. वो उस पल का इंतजार कर रहे थे जब किसी भी तरह से मस्जिद पर चढ़ सकें. घटना को अंजाम देने के बाद बलवीर जब अपने दोस्तों के साथ पानीपत पहुंचे तो उनका हीरो की तरह स्वागत किया गया. उन्होंने अयोध्या से विवादित स्थल की दो ईंटें भी उठा ली थी जिनको पानीपत के शिवसेना कार्यालय में रखा गया. उनकी इस हरकत से आहत गांधीवादी पिता ने बलवीर के वापस लौटते ही फरमान जारी किया कि या तो वह घर में रहेंगे या फिर उनके पिता. उन्होंने उसी वक्त घर छोड़ दिया. कई महीने घर से बाहर बिताने के बाद एक दिन उनको पता चला कि उनके पिता की मौत हो गई. जब बलवीर घर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनके पिता ने अपनी मौत से पहले कह दिया था कि वो उनके लिए मर चुके हैं और उनका अंतिम संस्कार उनका दूसरा बेटा ही करेगा. बलवीर के लिए ये किसी झटके से कम नहीं था.

दंगों ने हिलाकर रख दिया था

पिता की मौत से बलवीर उबरे भी नहीं थे कि उनके लिए दूसरा झटका इंतजार कर रहा था. मस्जिद गिराने में उनके सहयोगी रहे योगेंद्र पाल ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. योगेंद्र के मुताबिक 6 दिसंबर की घटना के बाद हुए दंगों ने उन्हें हिलाकर रख दिया था. उनके क्षणिक आवेग ने देश को संकट में ला दिया था. योगेंद्र ने बलवीर को बताया कि इस्लाम ने उनको उस पागलपन और आवेश से उबरने में मदद की जिसके वशीभूत होकर उन्होंने ऐसा कदम उठाया था.

कारसेवक से इस्लाम अपनाने की दास्तां

योगेंद्र से मुलाकात के बाद बलवीर सोनीपत के मौलाना कलीम सिद्दीकी से मिलने पहुंचे जिन्होंने योगेंद्र को इस्लाम में परिवर्तित कराया था. मौलाना से मिलने पहुंचे बलवीर ने कहा कि मैं सिर्फ उनसे मिलकर अपनी हरकत पर पश्चाताप करना चाहता था. मैंने मौलाना से कुछ दिन मदरसे में रहने की गुजारिश की. मौलाना ने कहा कि आपने एक मस्जिद गिराई है लेकिन आप कई मस्जिदों के निर्माण में सहयोग दे सकते हैं. मौलाना के सीधे औऱ साफ शब्दों ने बलवीर की जिंदगी बदल दी. बस उसी वक्त उन्होंने इस्लाम अपनाने का फैसला कर लिया. मुजफ्फरनगर के नजदीक फलौत के मदरसे में बलवीर अब आमिर बन चुके थे और उन्होंने अरबी के साथ साथ कुरान का अध्ययन शुरु किया. अब आमिर मदरसे के बच्चों को अंग्रेजी भी पढ़ाने लगे. कुछ दिन बाद उनका परिवार भी फलौत पहुंच गया औऱ उसने भी अपनी मर्जी से इस्लाम स्वीकार कर लिया. इसी बीच उनके भाई की पत्नी का देहांत हो गया औऱ बलवीर ने अपनी पत्नी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वो उनके भाई के साथ शादी कर लें क्योंकि उनके बच्चे छोटे थे और उन्हें मां की बेहद जरूरत थी. इसके बाद उनके भाई ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया. आमिर ने इसके बाद एक विधवा शहनाज बेगम से शादी कर ली.

मस्जिद ढहाने वाले बाले बलवीर से आमिर बनकर बना चुके हैं कई मस्जिद

1993 से लेकर 2017 के दौरान उन्होंने कई मस्जिदों के निर्माण में योगदान दिया. उन्होंने कई मस्जिदों का पुनर्निमाण कराने में भी अपना योगदान दिया. उनका मकसद 100 मस्जिदों का निर्माण कराना है. जमीयत इमाम वलीउल्लाह ट्रस्ट जिससे आमिर जुड़े हैं. वो उन्हें बेहद समर्पित औऱ समाजसेवा के लिए तत्पर इंसान बताती है. अपने बारे में आमिर बताते हैं कि मैं बेहद मामूली आदमी हूं औऱ मैं सिर्फ अमन के बारे में बात कर सकता हूं क्योंकि मुझे इस्लाम से यही मिला है. वो कहते हैं कि कभी मैं भी मुसलमानों के प्रति नफरत से भरा हिंदू हुआ करता था लेकिन मैं सबसे यही अपील करूंगा कि खुद से नफरत करने वाले को माफ करना बेहद मुश्किल काम है लेकिन अगर आप ऐसा कर पाते हैं तो ये बहुत बड़ी चीज होगी. आमिर आज भी उस वक्त को नहीं भूलते जब उनके एक पागलपन भरे कृत्य ने न सिर्फ उनके पिता की जान ले ली बल्कि देश को बेवजह दंगों की आग में झोंक दिया था. बलवीर सिंह से आमिर बनने की इस यात्रा में बेशक धार्मिक उन्माद औऱ उसकी बेहद भयावह नतीजों की तस्वीर सामने आती है. लेकिन एक उन्मादी के एक सहिष्णु इंसान बनने की कहानी बेशक बेहद रोचक है. उम्मीद है उनकी इंसानियत की बातें नफरत करने वालों के दिल में असर करेंगी और आमिर ऐसा करके अपने एक पाप का प्रायश्चित कर सकेंगे.

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