दस्तावेज़ ःः    सवाल करने पर विज्ञान इनाम और धर्म देता है सजा ःः  “विज्ञान एवं संस्कृति” विषय पर आयोजित वैचारिक सत्र .

 “धर्म का उपयोग जोड़ने में नहीं तोड़ने में किया जा रहा है।
अंतिम रूप से इंसान एक है,
उसकी बनावट एक है
यह विज्ञान हमें बताता है” 
-भगत सिंह

 

हरनाम सिंह एवं 
सारिका श्रीवास्तव, इंदौर

इप्टा सम्वाद 3 के वैचारिक सत्र “विज्ञान और संस्कृति”

30 अक्टूबर, 2018, इप्टा के प्लेटिनम जुबली समारोह के भारतीय नृत्य कला मन्दिर बहुउद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में होमी जहाँगीर भाभा एवं यशपाल की स्मृति में “विज्ञान एवं संस्कृति” विषय पर आयोजित वैचारिक सत्र में मुख्य वक्ता थे वैज्ञानिक गौहर रज़ा एवं खगोलशास्त्री अमिताभ पांडे.

इप्टा सम्वाद 3 के वैचारिक सत्र “विज्ञान और संस्कृति” की शुरुआत करते हुए गौहर रजा ने कहा कि राष्ट्र आधारित विज्ञान के दावे निरर्थक हैं। मतलब विज्ञान किसी देश विशेष की सम्पत्ति या पूँजी नहीं है। विज्ञान पर सबका उतना ही समान हक या अधिकार है जितना प्रकृति में हवा पर। धर्म की ध्वजा तो देश पर फहराई जा सकती है लेकिन विज्ञान की नहीं। विज्ञान को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। विज्ञान में सवाल उठाने, अन्वेषण करने पर इनाम मिलता है जबकि धर्म इसके बिल्कुल विपरीत है। प्रारम्भ से लेकर अब तक धर्म पर सवाल उठाने पर सजा मिलती है। वरना सुकरात को जहर पीने की जरूरत कभी न पड़ती.

वर्तमान में संस्कृति के नाम पर विज्ञान को कुचला जा रहा है। क्योंकि पूरी राजनीति में धर्म और संस्कृति के नाम पर वोट बटोरे जा रहे हैं। आज के निर्णय भविष्य का निर्माण करेंगे इसलिए उज्जवल भविष्य के लिए विज्ञान को सरंक्षण देना सबकी जिम्मेदारी है।

विज्ञान को समझने के लिए ब्रह्मांड से समाज तक को समझने की जरूरत है। लेकिन आज विश्व के सारे सत्तालोलुप धर्म के नाम पर सत्ता कायम रखने या हासिल करने के लिए जनता को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। ये लोग नहीं चाहते कि ब्रह्माण्ड या समाज के वैज्ञानिक तथ्यों से लोग वाकिफ हों या वैज्ञानिक चेतना लोगों तक पहुंच पाए। सत्ता हासिल करने का सबसे आसान रास्ता धर्म है। सत्ता हासिल करने के लिए अपनाए धर्म के रास्ते में विज्ञान उनकी इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा जो है। इसलिए ये सभी धर्ममार्गी सत्तालोलुप इस सृष्टि, समाज और इंसान को समझने का दावा करते हैं। और इसलिए इन्होंने ब्रह्मांड के संचालन हेतु भगवान को जन्म दिया।

न्यूटन का ब्रह्मांड रुका हुआ है, जो न फैलता है न ही सिकुड़ता है। अब बिग बैंग का मॉडल है जिसके अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार होता रहेगा। ब्रह्मांड क्या है विज्ञान के पास हर बार नया जवाब मिलता है। कल और आज में विज्ञान और उसके नियम बदलते हैं जबकि धर्मों का सच जमा हुआ स्थिर सच है। धर्म पुरानी पोथियों में जवाब ढूंढता है। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यूरोप ने विज्ञान और धर्म के बीच के टकराव को देखा और वही टकराव आज हम भारत में देख रहे हैं। हम चाहें या ना चाहें इस संघर्ष में हमें शामिल होना होगा।

गौहर रजा ने कहा कि वैज्ञानिक तर्कों को दरकिनार कर प्रधानमंत्री जब गणेश की सर्जरी पर बोलते हैं तो यह राजनीति ही है। वे सबकुछ जानते-बूझते ही बोलते हैं जिससे लोग तर्क न करें और इनकी दुकानें दिन दूनी रात चौगनी रफ्तार से प्रगति करती रहें। उनकी इस तरह की अतार्किक बातों से विज्ञान विरोधी खुश होते हैं। और प्रधानमंत्री के उस एक वक्तव्य के बाद तो इस तरह के अतार्किक और मनगढ़ंत अविष्कारों की बाढ़ सी आ गई। गाय द्वारा अक्सीजन छोड़ने, गोमूत्र से हवाई जहाज चलाने के दावे से लेकर गंदी नाली से पैदा होने वाली गैस से भोजन पकाने के अविष्कार की अजीबो-गरीब जानकारी से देश हतप्रभ है। बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि एक मंत्री ने तो घोषणा तक कर दी कि भारत में इंसान शुरू से इंसान ही था और बन्दर हमारे पूर्वज नहीं हैं इसलिए हम डार्विन को नहीं पढ़ाएंगे। 

इधर सरकार गोमूत्र रिसर्च पर, लुप्त हो चुकी नदी की तलाश और एक जड़ी-बूटी की तलाश के लिए धन आवंटित कर रही है और उधर जनता को बरगलाने के बाद खुले तौर पर विज्ञान के बजट में निरंतर कटौती करती जा रही है। यह सत्ता की लड़ाई में शामिल पूंजीपति राजनीतिक दलों की विज्ञान और उसके सोच को अंदर से खत्म करने की सोची-समझी साजिश है। सत्तर वर्ष पूर्व जो निर्णय लिया गया कि हमारी तरक्की का आधार विज्ञान होगा उसी का लाभ हमें वर्तमान में मिल रहा है। तो जाहिर है कि आज लिए गए फैसले भविष्य का निर्माण करेंगे। विज्ञान में एक दिन पिछड़ना एक सदी पीछे हो जाने के समान होता है। और ये सरकारें हमें सदियों पीछे ले जा रही हैं। यदि यही हाल रहा तो देश का भविष्य अंधकारमय ही होगा। विज्ञान के सरंक्षण की लड़ाई संस्कृति से लेकर भविष्य तक की लड़ाई है।

अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि पुरानी मान्यताओं और रूढ़ियों को छोड़ना और नए को स्वीकार करना ही वैज्ञानिकता है। कोई भी परिकल्पना भविष्य के आविष्कारों का आधार नहीं बन सकती। धर्म ग्रंथ इन कल्पनाओं से भरे हुए हैं। पहले विज्ञान को मान्यता के लिए धर्म के पास जाना होता था। अब सारे धर्म स्वयं को साबित करने के लिए विज्ञान से प्रमाण पत्र मांग रहे हैं। और यही विज्ञान की सबसे बड़ी जीत है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा था कि विज्ञान ने संस्कृति को आम इंसान तक पहुंचा दिया है। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, गायन आज तकनीक के कारण ही घर-घर पहुंचे हैं। जबकि धर्म ग्रंथ हिंसक हैं धार्मिक कट्टरपंथी इन्हीं से प्रेरणा लेकर मानवता विरोधी कार्य कर रहे हैं।

खगोल विज्ञानी अमिताभ पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि ब्रह्मांड अपने विस्तार में इतना बड़ा है कि उसके सामने हम बोने से हैं। एक व्यक्ति को एक अरब की संख्या गिनने में ही तेंतीस वर्ष लगते हैं। हम कुदरत के मालिक नहीं हैं बल्कि उसका एक छोटा सा भाग हैं। इसी प्रकृति को समझने की ताकत का नाम विज्ञान है। विज्ञान एक प्रक्रिया है इस से हमारी संस्कृति, साहित्य, दर्शन, राजनीति, सामाजिक मूल्यों का निर्माण होता है। आज की दुनिया को कलयुग बताया जाता है उसकी बुराई की जाती है, जबकि प्राचीन से वर्तमान बेहतर है। धर्मनिरपेक्षता और मानवता की जड़ों में विज्ञान का योगदान है। प्रकृति किसी अलौकिकता से संचालित नहीं होती। बंदर और हमारे पुरखे कभी एक ही थे। सारी दुनिया के इंसान बराबर हैं। पशुओं में भी मातृत्व सद्भाव के गुण मिलते हैं। जानवर भी हमारे साथी हैं, पराए नहीं हैं। हमें जरूरत है इस पर विचार करने की कि विज्ञान यूरोप में ही क्यों पैदा हुआ और फला फूला? हमारे यहां क्यों नहीं? जबकि भारत डेढ़ हजार वर्ष पूर्व आर्यभट पैदा कर चुका था। भारत में जातिवाद ने विज्ञान के विकास को रोका है। हाथ और दिमाग के मेल से ही विज्ञान विकसित होता है। धर्म से दो-दो हाथ करने का यही समय है। जो सामाजिक दर्शन और विचारधारा, मानवीयता, जनतांत्रिक मूल्यों को नष्ट करें उससे निपटना ही होगा। देश में सांस्कृतिक संघर्ष की जरूरत है। संस्कृति केवल नाटक, कहानी, कविता नहीं है। हमें मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए नए वैचारिक हथियार विकसित करना होंगे। विज्ञान के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग की वजह से  पृथ्वी केवल पच्चीस वर्ष तक ही रहने लायक है। विज्ञान में कोई विश्व गुरु होने का दावा नहीं कर सकता। वैज्ञानिक नजरिया संस्कृति का आधार कैसे बन सकता है इस पर विचार करने की जरूरत है। पाखंड और धर्मांधता के खिलाफ भक्ति काल के कबीर से लेकर पेरियार तक विरोध के स्वर उठाते रहे लेकिन हम तब भी चुप थे और आज भी चुप हैं।

इस सत्र का संचालन किया अजय आठले ने। संगोष्ठी के प्रारंभ में पंजाब इप्टा के कलाकारों ने जनगीत, जगतार सिंह की ग़ज़ल तथा इप्टा उरई के कलाकारों ने गीत प्रस्तुत किए।

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