अयोध्या ःः यह धमकी बाबर को नहीं, सुप्रीम कोर्ट के गुम्बदों को . ः सुनील कुमार .

23.11.2018

अयोध्या एक बार फिर बेकाबू होते दिख रहा है। वहां बाबरी मस्जिद गिराने की चौथाई सदी पूरी हो चुकी है, और अब एनडीए-भाजपा के करीबी लोगों, संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की राह देखे बिना जिस आक्रामक, अराजक, अलोकतांत्रिक, और साम्प्रदायिक अंदाज में मंदिर वहीं बनाएंगे, और अभी बनाएंगे का आंदोलन शुरू किया है, उससे पूरा देश एक बार फिर 1992 की तरह हिंसा में डूब सकता है। और अब कुछ महीने बाद जिस तरह लोकसभा के चुनाव सामने खड़े हैं, उसे देखते हुए ऐसा लगता है यह अभियान राम केन्द्रित न होकर आम चुनाव केन्द्रित है, और इसलिए इससे निपटना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती, एक बड़ा खतरा उस वक्त भी होंगे जब अगर सरकार की नीयत इससे निपटने की होगी। और यह भी हो सकता है कि सरकार की नीयत इससे निपटने की हो ही नहीं।

इस बार मोदी के घोर विरोधी और विश्व हिन्दू परिषद से तड़ीपार किए गए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा के पास मोदी से निपटने, उन्हें नीचा दिखाने, और अपने नए हिन्दू संगठन को खड़ा करने का यह एक सुनहरा अवसर है। ठीक इसी तरह का सुनहरा अवसर इस बार उद्धव ठाकरे के सामने है जो कि अपने पिता बाल ठाकरे का यह दावा दुहरा रहे हैं कि बाबरी मस्जिद को शिवसैनिकों ने गिराया था। हजारों शिवसैनिकों के साथ वे अयोध्या पहुंच रहे हैं, और यह शहर एक बार फिर अराजक हिंसा की लपटों में जाते दिख रहा है। लोगों को याद होगा कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब भी उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार थी, जो कि आज भी है। उस समय के भाजपा मुख्यमंत्री के मुकाबले आज के भाजपा मुख्यमंत्री हजार गुना अधिक आक्रामक हिन्दू हैं और लोकतंत्र पर उनका धेले भर का भरोसा नहीं है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की यह मांग नाजायज नहीं लगती है कि अयोध्या में सेना तैनात की जाए। योगी के उत्तरप्रदेश में पुलिस का ऐसा साम्प्रदायीकरण हो चुका है कि वहां तैनात पुलिस वाले वर्दी में ही मंदिर बनाने को ईंट-पत्थर ढोने लगें तो किसी को हैरानी नहीं होगी।

दरअसल अगले आम चुनाव को लेकर देश के बहुत से लोगों के मन में कई किस्म की आशंकाएं पहले से चली आ रही हैं। कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ सरहद पर कोई बड़ा तनाव खड़ा कर सकती है, और देश एक बार राष्ट्रवाद के सैलाब में डुबाया जा सकता है। दूसरी बात लोगों को यह लगती है कि देश की अलग-अलग कई साम्प्रदायिक ताकतें अपने बूते ही, या अलग-अलग सरकारों की मदद से एक ऐसा तनाव खड़ा कर सकती हैं कि उसमें बहुसंख्यक तबके और अल्पसंख्यक तबकों के अलग-अलग ध्रुवीकरण किए जा सकें, और आम चुनाव लोकतंत्र का न होकर धर्मों की जनगणना का जलसा होकर रह जाए। ऐसी कई आशंकाएं लोगों के मन में हैं। और आज जिस तरह देश भर के स्वघोषित साधू-संत भगवे कपड़ों में अयोध्या में जुट रहे हैं, और अपनी तथाकथित धर्मसंसद में फैसले लेकर देश को धर्मान्धता में डुबाने पर आमादा हैं, मोदी सरकार उसके साथ है, या साथ नहीं है, अभी यह साफ नहीं है। जिस तरह बस्तर के नक्सल-कब्जे के इलाकों में नक्सली जनसुनवाई के नाम पर अपनी अराजकता की अदालत लगाते हैं, और वहां पर फैसले लेकर किसी को भी पुलिस का मुखबिर बताकर उसका गला काटते हैं, कुछ उसी किस्म का काम अयोध्या में धर्मसंसद नाम का एक पाखंड करने जा रहा है जिसका इस देश के सबसे बड़े धर्म, लोकतंत्र, से सीधा टकराव है, संविधान से जिसका सीधा टकराव है।

यह पूरा सिलसिला भारत में सुप्रीम कोर्ट की सत्ता को कुचलकर रख देने का है, और यह अदालत के पिछले कुछ और फैसलों को लेकर भी तरह-तरह से सामने आया है। यह बात भी कही गई कि अदालत को वैसे ही फैसले देने चाहिए जो लागू किए जा सकें। कानून के राज में अदालत को ऐसी चुनौती लोकतंत्र के लिए खतरा है। आज अयोध्या में जो हो रहा है वह ताकत बाबर को नहीं दिखाई जा रही है, वह ताकत सुप्रीम कोर्ट को दिखाई जा रही है कि अयोध्या की जमीन पर मालिकाना हक के मुकदमे का फैसला करने के पहले वह इस ताकत को देख ले, वरना बाबरी मस्जिद के गुम्बदों की तरह सुप्रीम कोर्ट के गुम्बदों को भी गिरा देने की ताकत इस भीड़ में है।
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सुनील कुमार ,संपादक .सांध्य दैनिक छतीसगढ .

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