दस्तावेज़ ःः इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह में प्रदर्शनियाँ .

“फ़िलहाल तस्वीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे ।”

 

हरनाम सिंह, इंदौर
सारिका श्रीवास्तव, इंदौर

 

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के मौके पर भारतीय नृत्य कला मंदिर के बहुद्देश्यीय सांस्कृतिक परिसर की गैलेरी में प्रदर्शनियाँ लगाई गईं। इस बहुद्देश्यीय परिसर को मशहूर चित्रकार और इप्टा आंदोलन से जुड़े चित्त प्रसाद को समर्पित किया गया है। चित्त प्रसाद ने ही इप्टा का लोगो (नगाड़ा बजाते इन्सान) बनाया था। तीन गैलेरी में फैली इस प्रदर्शनी में इप्टा से जुड़े अहम दस्तावेज, संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से सम्मानित कलाकारों की तस्वीरें, गांधी जी की 150वीं जयंती पर उनके विचार, कविता पोस्टर और कंधमाल हिंसा पर फ़ोटो शामिल किये गए। और इन तीन गैलरियों को क्रमशः सुनील जाना, सोमनाथ होर, जैनुल आबेदीन के नाम दिए गए.

समय और परिस्थितियाँ हमेशा से एक जैसी रही हैं। बस साधन बदलते रहते हैं। जोखिम हमेशा ही रहे और उनसे निपटने के तरीके भी उन जोखिमों के बीच से ही निकाले जाते रहे। लोगों को जगाने के लिए, उन तक सच्चाई पहुँचाने के लिए शुरू से अब तक भाँति-भाँति की तरकीबें निकाली जाती रहीं। आज नैनो तकनीक के वर्तमान समय में असर कारक संदेश पहुंचाने के लिए पोस्टर उम्दा जरिया है। आकर्षण चित्रों, कविता, विचार वाक्य, रंगबिरंगे कागज-कपड़ों से तैयार किए पोस्टर्स लोगों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। इसलिए तो मुक्तिबोध भी कहते हैं.

अपने लिए नहीं वे !!
ज़माने ने नगर से यह कहा कि
ग़लत है यह, भ्रम है
हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और
छीनने का दम है ।
फ़िलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे ।
हम धधकायेंगे ।
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!
वेदना के रक्त से लिखे गये
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर !!
चटाख से लगी हुई
रायफ़ली गोली के धड़ाकों से टकरा
प्रतिरोधी अक्षर
ज़माने के पैग़म्बर
टूटता आसमान थामते हैं कन्धों पर
हड़ताली पोस्टर

साहित्य के क्षेत्र में कई बार जो प्रभाव कई पृष्ठों का उपन्यास पूरा पढ़ने के बाद सामने आता है, वही काम एक पृष्ठ की छोटी सी कविता भी कर लेती है। इसी सोच के साथ समसामयिक मुद्दों पर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय साहित्यकारों, कवियों, शायरों, मानवतावादी दार्शनिकों की वैचारिक उक्तियाँ, कविता की चुनिंदा पंक्तियों को पोस्टर के माध्यम से प्रदर्शित किया मध्य प्रदेश इप्टा के साथी अशोक दुबे और मुकेश बिजौले ने.

पटना में इंदौर की प्रदर्शनी-

इप्टा के राष्ट्रीय प्लेटिनम जुबली समारोह के अनगिनत सांस्कृतिक आयोजनों में एक आयोजन पोस्टर प्रदर्शनी का भी था। जिसमें इंदौर इकाई की भागीदारी अन्य कार्यक्रमों के अलावा पोस्टर प्रदर्शनी के माध्यम से दिखाई दी। हालांकि पोस्टर प्रदर्शनी का शुभारंभ इंदौर में ही हो गया था। 23 अक्टूबर 2018 को पटना जाने के पूर्व इंदौर के प्रीतमलाल दुआ सभागार में इन्हीं पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाई गई, जिसे बड़ी तादाद में नगरवासियों ने देखा और सराहा ।

पटना के चित्त प्रसाद सांस्कृतिक परिसर (भारतीय नृत्य कला मंदिर) की तीन मंजिला इमारत के प्रथम तल “सुनील जाना कला दीर्घा” में इंदौर इप्टा इकाई के पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाई गई थी । दारियो फो, जानिसार अख्तर, राहुल सांकृत्यायन, केदारनाथ अग्रवाल, फैज अहमद फैज, एली विजल, जिगर मुरादाबादी, ब्रेख्त, कैफी आज़मी, पाब्लो नेरुदा, अन्नाभाऊ साठे, ताज भोपाली, डॉ मार्टिन लूथर किंग, गोरख पांडे, चितुवा अचेबे, रामस्वरूप चौधरी “जप्त”, मुक्तिबोध, इकबाल की चुनिंदा पंक्तियों के साथ “इप्टा के दिग्गज और दिग्गजों की इप्टा” पोस्टरों में सरोजिनी नायडू से लेकर फारुख शेख तक 42 अपने समय के कलाकारों, मनीषियों को याद किया गया।

भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा की इंदौर इकाई ने पहले इंदौर फिर खंडवा और अंतिम पड़ाव पटना में प्लेटिनम जुबली समारोह में निर्धारित थीम “ये वक्त की आवाज है मिल के चलो” पर 30 पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाई।

अशोक दुबे की परिकल्पना पर चित्र उकेरे अशोकनगर इप्टा के साथी मुकेश बिजौले ने और फिर रितिका श्रीवास्तव एवम पवन वर्मा के संयुक्त तकनीकी प्रयासों के परिणाम बेहद प्रभावशाली और अपने समय में हस्तक्षेप करते दिखे।

“दारियो फो” का पोस्टर जब कहता हो कि “अभिव्यक्ति का कोई भी रूप थिएटर, साहित्य या कला जो अपने वक्त के बारे में कुछ नहीं कहता अप्रासंगिक है …” यह उक्ति किसी भी विवेकवान, संवेदनशील व्यक्ति को विचार करने पर विवश करती है।

ऐसे ही “एली विजल” के ये विचार आज यदि प्रभावी तरह से या पोस्टर पर न लिखे जाएँ तो शायद लोगों को इतने प्रभावित नहीं कर पाएँगे। क्योंकि लोगों में अब पढ़ने की न तो आदत रही न ही समय।

“ऐसे मौके आ सकते हैं, जब हम अन्याय को रोक पाने में खुद को कमजोर पाएँ।
लेकिन ऐसा कोई मौका हरगिज नहीं आना चाहिए, जब हम अन्याय का विरोध करने में चूक जाएँ।”
जानिसार अख्तर कहते हैं “अपने सभी सुख एक हैं अपने सभी दुख एक…” वहीं जिगर मुरादाबादी कहते हैं “उनका जो काम है वह अहले सियासत जाने, अपना पैगाम है मोहब्बत, जहां तक पहुंचे”।
यही प्रभाव शेष पोस्टरों पर प्रदर्शित पंक्तियों का भी रहा है .

इसी प्रदर्शनी को लेकर इंदौर इप्टा के साथी अशोक दुबे, विनीत तिवारी, सारिका श्रीवास्तव, विजय दलाल, अरविंद पोरवाल, एस के दुबे, विकी शुक्ला दीपिका मिश्रा, शारदा मोरे, संजय वर्मा, प्रमोद बागड़ी और हरनाम सिंह पटना के लिए रवाना हुए। पहले पड़ाव खंडवा के रेलवे प्लेटफार्म पर भी पोस्टर प्रदर्शित किए गए ।

इसी के सामने लगीं थी अशोकनगर, मध्य प्रदेश के साथी पंकज दीक्षित के चित्रों की पोस्टर प्रदर्शनी। पंकज अपनी फेसबुक वॉल पर रोज ही एक पोस्टर चित्र सन्देश भेजते हैं जिनका उपयोग अनेकों बार बहुत सारे लोग करते हैं। कोई अनुमति ले लेता है कोई नहीं। पंकज दीक्षित, अशोक दुबे, मुकेश बिजौले कई वर्षों से लोगों के बीच अपनी कला के जरिए अलख जगाने के काम में लगे हुए हैं और आगे भी लंबे समय तक लगे ही रहने वाले हैं।

इसी परिसर में एक और मानीखेज पोस्टर प्रदर्शनी थी जिसमें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित किए कलाकारों की तस्वीरों की प्रदर्शनी का उल्लेख यदि न किया जाए तो इप्टा के साथियों को श्रद्धांजलि पूरी नहीं होगी। इसकी परिकल्पना परवेज़ अख़्तर की थी और उनके सहयोगी थे योगेश कुमार पाण्डेय और नासिरुद्दीन।

अन्य प्रदर्शनियाँ-

कॉमरेड पी सी जोशी से शुरू हुई ये पोस्टर प्रदर्शनी इप्टा के इतिहास को भी बयान कर रही थी।
कॉमरेड पी सी जोशी पर केंद्रित चित्र प्रदर्शनी आज के समय की जरूरत थी जो आत्मावलोकन कराती है। हमें भी, संगठन को भी और राजनीतिक पार्टी को भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महासचिव कॉमरेड पूरन चंद जोशी ने इस बात को समझा कि एक दृढ़ राजनीतिक जागृति का आधार सांस्कृतिक और सामाजिक जागरुकता ही हो सकती है।

कॉमरेड पी सी जोशी के जरिये पार्टी के सहयोग से किस तरह एक विचारधारा को फैलाया गया। कलाकारों और फिर उनकी कला के जरिए आम जनता तक किस तरह विचार को पहुँचाया जा सकता है।
कॉमरेड पी सी जोशी के जीवन वृत को बहुत ही ज्ञानवर्धक, सुन्दर, रोचक और आकर्षक तरीके से इस प्रदर्शनी के जरिए लोगों तक पहुँचाया गया।

इप्टा के इतिहास पर लगी प्रदर्शनी पोस्टर जैसे इप्टा की पूरी कहानी कह रहे थे। बंगाल के अकाल से लेकर इप्टा के बनने, कला के जरिए लोगों के बीच सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाने से लेकर बिखरने और फिर से अपने विचार पर कायम रहते हुए उठ खड़े होने की कहानी कहते ये पोस्टर बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन उतना ही महत्त्वपूर्ण ये भी है कि ये केवल इस प्लेटिनम जुबली के आयोजन या पटना तक सीमित होकर न रह जाएँ।
इप्टा से जुड़ना या नए लोगों को जोड़ना है तो बहुत जरूरी है उसके इतिहास की पूरी जानकारी होना। किस उद्देश्य के साथ कब, कहाँ, किन परिस्थितियों में शुरुआत हुई? इन सारी जानकारियों, चित्रों, तस्वीरों से लैस थी ये प्रदर्शनी।
वरना आने वाली पीढ़ी को ये बताने वाला कोई न रहेगा कि एक समय में आज की जानी-मानी इतिहासकार रोमिला थापर भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की पहली राष्ट्रीय सचिव अनिल डिसिल्वा की असिस्टेंट के तौर पर उनके साथ काम किया है।

न ही लोग ये जान पाएँगे कि “इक़बाल की रचना सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, को हम सब आज भी जिस धुन पर गाते हैं, वो धुन इप्टा के लिए पंडित रविशंकर ने ही बनाई थी. और वामिक़ जौनपुरी का गीत इप्टा के ज़रिए पूरे देश में बंगाल के अकाल पीड़ितों की आवाज़ बना-

पूरब देस में डुग्गी बाजी,
फैला दुख का जाल
दुख की अग्नी कौन बुझाए,
सूख गए सब ताल
जिन हाथों ने मोती रोले,
आज वही कंगाल
रे साथी,
आज वही कंगाल
भूखा है बंगाल रे साथी,
भूखा है बंगाल।”।

1942-43 में बंगाल की भीषण अकाल की पृष्ठभूमि में देश भर के कलाकार इक्कठ्ठा हुए और एक संवेदनशील समूह के रूप में जुड़ें। यह समूह दिन-रात बंगाल के अकाल पीड़ितों के राहत के लिए अपने सांस्कृतिक प्रदर्शन करने लगे। 1942 में श्रीलंकाई मूल की अनिल डिसिल्वा के नेतृत्व में इप्टा की स्थापना हुई और इसका नामकरण वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने किया अौर इप्टा के सबसे पहले अध्यक्ष ख्वाजा अहमद अब्बास बनें। उन्होंने कहा कि इप्टा से जुड़ने वालों में सिर्फ अभिनेता-अभिनेत्री, वैज्ञानिक, संगीतकार, नर्तक रहे बल्कि मजदूर-किसान और इनके लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति भी रहे हैं। देश में पहली बार इप्टा ने नारा दिया ‘इप्टा की नायक जनता है। इप्टा की विरासत सिर्फ नाटक करना, गीत गाना नहीं है, मजदूरों, गरीबों के बीच उनकी भाषा में उनकी बात करना है।
इन सारी जानकारियों के साथ बनी इस पोस्टर प्रदर्शनी की परिकल्पना नासिरुद्दीन की थी और इसमें उनका सहयोग किया संजय सिन्हा, फ़रीद खां, तनवीर अख़्तर और फ़ीरोज़ अशरफ़ खां ने।

उड़ीसा के कंधमाल हादसे के दस साल पूरे होने पर एक छाया-चित्र प्रदर्शनी की परिकल्पना कर्नाटक के फ़िल्मकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता के.पी.षषि ने की थी। इस साम्प्रदायिक दंगों की आग से जब पूरा इलाका जल रहा था उस समय बेघर और पीड़ित लोगों को अपने घर में पनाह देने का साहस करने वाली साहसी महिला सत्यभामा इस प्लेटिनम जुबली समारोह में पूरी सक्रियता के साथ उपस्थित थीं।

नट-मंडप द्वारा महात्मा गाँधी के जन्म के 150 साल पूरे होने पर उनकी तस्वीरों, उद्धरणों और उनके आन्दोलन से सबंधित प्रदर्शनी लगाई गई।

लखनऊ इप्टा द्वारा उत्तर प्रदेश में इप्टा के नाटकों, आन्दोलनों और गतिविधियों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।

कला का उपयोग जन संस्कृति के विस्तार एवं आपसी भाईचारे को बढ़ाने का लक्ष्य लेकर ही 75 वर्ष पूर्व इप्टा की स्थापना हुई थी। इप्टा एक सांस्कृतिक आंदोलन है, 75 वर्ष पड़ाव का लक्ष्य है समतावादी समाज निर्माण तक तो अभी पहुंचना है।

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