स्मृति शेष ःः “मैं भंगी हूं” जैसी कालजयी किताब के लेखक सामाजिक, राजनैतिक चिंतक एडवोकेट भगवानदासः के.पी.सिंह

ख़ेराजे अक़ीदत..
भारत के सबसे पहले अंबेडकरवाद मार्क्सवाद की एकजुटता के सशक्त (स्पष्ट) पक्षधर, सामाजिक क्रांतिकारी एड भगवानदास आज ही के दिन इस दुनियाए फ़ानी से कूच कर गए थे…
(23.4.1927-18.11.2010)

प्रस्तुति ःः जुलैखा जबीं ,दिल्ली 

मैं भंगी हूं” जैसी कालजयी किताब के लेखक सामाजिक, राजनैतिक चिंतक एडवोकेट भगवानदास जी को जानने के लिए पढ़िए “के पी सिंह “मुक्त” जी की क़लम से निकली ये बातें–

भगवान दास जी का जन्म 23.4.1927 को जतोग कैंट शिमला हिमाचल प्रदेश में एक एससी परिवार में हुआ। स्कूली शिक्षा शिमला में, एमए पंजाब यूनिवर्सिटी तथा एलएलबी दिल्ली यूनिवर्सिटी से की। दिल्ली में वकालत की।

शुरू से ही अनेक बौद्ध, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक, वकीलों की संस्थाओं से ताल्लुक़ रहा। 1968 में अंबेडकर मिशन सोसाइटी की स्थापना की। 1987 में अंबेडकर मिशन एडवोकेट्स एसोसिएशन तथा लीगल एड सोसाइटी स्थापित की। 1984-1992 सुप्रीम कोर्ट में यूनाइटेड लायर एसोसिएशन के महासचिव रहे। 1978 में समता सैनिक दल का पुनरुत्थान किया और काफी समय तक उसके चेयरमैन के पद पर रहे। 1981 से एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के डायरेक्टर रहे। वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस (भारत शाखा) के संस्थापक सदस्यों में रहे। 1993 में उसके प्रधान चुने गए। 1992 में दलित सॉलिडेरिटी प्रोग्राम की स्थापना की गई। देशभर में 50 से अधिक कार्यक्रम किए गए। 1998 दोबारा मॉडरेटर प्रेसिडेंट चुने गए। इस संस्था का उद्देश्य बौद्ध ईसाई इस्लाम सिक्ख हिंदू आदि धर्म के मानने वाले बहुजनों को एक झंडे तले संगठित करना है। उनके नेतृत्व में इतिहास में पहली बार भारत पाकिस्तान नेपाल श्रीलंका और जापान में अछूत माने जाने वाले लोगों को संगठित करने का प्रयास किया गया।

1983 में जिनेवा में यूनाइटेड नेशंस सब कमेटी के 36वें अधिवेशन में भाग लेकर भारत नेपाल पाकिस्तान बांग्लादेश आदि देशो में बसने वाले अछूतों के पक्ष में साक्ष्य दिया। 1970 में क्योटो जापान में आयोजित वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस असेंबली में भाग लिया। 1989 में प्रिंसटन USA, 1984 में नैरोबी केन्या, 1981 में नई दिल्ली में आयोजित एशियन कांफ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस, 1987 सियोल कोरिया में, 1989 मेलबर्न में तथा एशियन कांफ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस (ACRP) की एग्जेक्यूटिव कमेटी बैंक में भाग लिया

स्पीच/पेपर

*1980 में ओसाका टोक्यो जापान में विभेदीकरण पर
*नॉर्थ फील्ड कॉलेज मिनियापोलिस USA व 1979 में विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी यूएसए में अछूत समस्या तथा जाति प्रथा पर
*मिलिंद महाविद्यालय औरंगाबाद तथा नागपुर यूनिवर्सिटी में अंबेडकर मेमोरियल पर
*नागपुर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी कॉलेज नागपुर में अंबेडकर एक राष्ट्र निर्माता,धार्मिक नेता तथा नारी मुक्ति दाता पर
*1991 में ट्रोंडन विश्वविद्यालय स्वीडन तथा हल्ल विश्वविद्यालय इंग्लैंड में जाति विषय पर
*1994 में अकोल, अमरावती तथा औरंगाबाद के मराठवाडा यूनिवर्सिटी में अंबेडकर पर
*1996 में मद्रास यूनिवर्सिटी चेन्नई में राम मनोहर लोहिया, पेरियार तथा डॉ आंबेडकर पर
*1998 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर राजस्थान में भारत में औद्योगीकरण और डॉ अंबेडकर का योगदान पर, जर्मनी में फ्रैंकफर्ट, बौन एवं हैलदेशम विश्वविद्यालयों में धर्म विषय पर
*वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज जेनेवा, मानवाधिकार संस्थाएं योकोहामा, ओसाका जापान में नस्ली भेदभाव तथा अछूत समस्याओं पर

प्रमुख किताबें

1.मैं भंगी हूँ
2.अंबेडकर एक परिचय
3.गांधी और गांधीज्म
4.दलित सॉलिडेरिटी
5.दस स्पोक अंबेडकर
6.रिवाइवल ऑफ़ बुद्धिज़्म इन इंडिया एंड डॉ. अंबेडकर्स रोल
7.भारत में बौद्ध धर्म वर्तमान स्थिति एवं समस्याएं
8.डाॅ अम्बेडकर और भंगी जातियां
9.बाबा के चरणो में
10.सफाई कर्मचारी दिवस
11.क्या वाल्मीकि अछूत थे
अन्य लेखन
500 के करीब लेख तथा लघु कथाएं उर्दू हिंदी तथा अंग्रेजी अखबारों में छपे।

वे लेखन, अछूत आंदोलन, राजनीति मानवाधिकार आंदोलन तथा बौद्ध धम्म के प्रचार आदि में निरंतर लगे रहे।

“भगवान दास जी के अनुसार अमीचंद शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक “बाल्मीकि प्रकाश” पंजाब के एक बाल्मीकि सोशल वर्कर पंडित बख्शीराम के “बाल्मीकि चमत्कार” और इलाहाबाद के बद्री प्रसाद बाल्मीकानंद जी द्वारा लिखित पुस्तक “बाल्मीक” आदि वाल्मीकि को भंगी जाति से जोड़ने की ब्राह्मणी प्रोपेगंडा की कोशिश हैं। यह भंगी का इतिहास और समस्याओं पर लिखी पुस्तके नहीं है। हिंदुओं ने 19वीं सदी की आख़िरी दशकों में जनगणना में मुसलमानों के मुकाबले में हिंदुओं की जनसंख्या कम हो जाने के डर से अछूतों को बेवकूफ बनाने के लिए उनमें हिंदू धर्म का प्रचार शुरू किया। इसी प्रोपेगंडा के प्रभाव में आकर पंजाब की चुहड़ा जाति के लोगों ने अपनी जाति का नाम वाल्मीकि लिखना शुरू किया। दुख की बात यह है कि उससे न केवल उनकी मानसिक राजनैतिक आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति रुक गई बल्कि एक बहुत बड़ा नुकसान यह हो गया की इस जाति के लेखक उनकी अन्य समस्याओं गरीबी, पिछड़ेपन, अंधविश्वास, सामाजिक बुराइयां, अन्याय तथा बहुजन लोगों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में सोचने और उस पर लिखने की बजाए वाल्मीकि के पीछे पड़ गए। जिसका शायद भंगी जाति से कोई सीधा संबंध नहीं। भंगी जाति में जन्मे प्रसिद्ध पंजाबी कवि गुरुदास राम “आलम” को छोड़कर बाकी सभी लेखक धर्मगुरुओं आत्मा-परमात्मा तथा बाल्मीकि के चक्कर में ही फंसे हुए हैं। नतीजे के तौर पर वे हर क्षेत्र में पीछे होते जा रहे हैं।

 

फैज अहमद फैज प्रसिद्ध उर्दू शायर ने मजदूर, शोषित और अछूत वर्ग की स्थिति को सामने रखकर लिखी अपनी प्रसिद्ध नजम “कुत्ते” में मजदूर वर्ग की छुपी शक्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा है-

“कोई इनको एहसास-ए-जिल्लत दिला दे,
कोई उनकी सोई हुई दुम हिला दे।”

मैंने सोई हुई दुम हिलाने की कोशिश ही नहीं की बल्कि एक आशा, एक आदर्श, एक लक्ष्य भी उनके सामने रखने का प्रयास किया है- भगवान दास (मैं भंगी हूं)

Rama Shankar

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