दस्तावेज़ ः इप्टा का राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह 27 से 31 अक्टूबर 2018 को बिहार के पटना ः विस्तृत रिपोर्ट .

 

15.11.2018  

इप्टा का राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह 27 से 31 अक्टूबर 2018 को बिहार के पटना में आयोजित हुआ .निश्चित ही यह आज के समय की बड़ी परिघटना हैं. समारोह मे गये साथियों से टुकड़ों टुकड़ों में जानकारी मिलती रही ,हम सबकी इच्छा थी कि संपूर्णता में पूरा आयोजन पढ पाते विशेषकर वह साथी जो नहीं जा पाये थे . हमारे पास यही रास्ता था कि विभिन्न रिपोर्ट को खोजा और खंगाला जाये.

हम आभारी है देश की जानी मानी रंगकर्मी और साहित्यकार छत्तीसगढ़ की उषा वैरागकर आठले जी का जिन्होंने अधिकतर रिपोर्ट ,वीडियो और चित्र उपलब्ध करा दिये.
हम एक बार फिर विनम्रता पूर्वक लिख रहे हैं कि यह स्वयं में अपनी कोई रिपोर्ट नहीं हैं ,सिर्फ़ विभिन्न श्रोतों से एकत्रित की गई जानकारी का संकलन है , जहाँ से इसे लिया है उसका रिफरेंस दिया गया हैं .उन सबका आभार विशेषकर उषा जी का जिन्होंने यह अवसर प्रदान किया.

सीजीबास्केट .

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राष्ट्रीय कन्वेंशन के लिए प्रस्ताव :

जन-अभिव्यक्तियों का राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच

सांस्कृतिक साझा मंच बनाने हेतु समान विचारधारा के अनेक व्यक्ति और संगठन मंच पर थे। इनमें कांचा इलैया, एम.के.रैना, संभाजी भगत, राजेन्द्र राजन, राजेश जोशी, संजना कपूर, मेघा पानसरे, गौहर रज़ा आदि थे। एक प्रस्ताव जावेद अख्तर खाँ और हृषिकेश सुलभ ने संयुक्त रूप से तैयार कर प्रस्तुत किया गया। इसपर लगभग तीन घंटे चर्चा हुई और जसम की ओर से दिसम्बर में एक बैठक किये जाने का ऐलान किया गया.

इप्टा@75 पटना समारोह 2018 का उद्घाटन भाषण मशहूर अदाकारा शबाना आज़मी के द्वारा; 27 अक्टूबर 2018

प्रस्ताव

इप्टा के प्लेटेनिम जुबली समारोह में आप सबका अभिनन्दन है. इप्टा की विरासत और परम्परा और उसके मौजूदा सांस्कृतिक-रचनात्मक हस्तक्षेप से आप सब परिचित हैं. देश की आजादी के पूर्व और आजादी मिलने के बाद के कई दशकों की इप्टा की सक्रियता की कई मिसालें हैं, लेकिन उन सबकी चर्चा का यह सत्र नहीं है.

दरअसल यह इप्टा के वर्तमान नेतृत्व की समझदारी है और यह उसकी तरफ से ही आया एक प्रस्ताव है कि यहाँ एकत्र देश के सभी हिस्सों से आए संस्कृतिकर्मी, गोकि वे संभवतः बड़ी संख्या में इप्टाकर्मी होंगे, लेकिन साथ ही वे स्वतंत्र कलाकार और अनेक जन सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि भी होंगे, जो इस समय अपनी जगह ज़रूरी हस्तक्षेप कर रहे हैं, मिलकर एक ऐसा साझा प्रस्ताव तैयार करें, जिसके आधार पर इप्टा-सहित वे तमाम जन संस्कृतिकर्मी, जो अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग नामों से या बिलकुल स्वतंत्र रूप में, व्यक्तिगत स्तर पर कला-सृजन कर रहे हैं, वे एक होकर अपनी समवेत आवाज़ से राष्ट्र को संबोधित करें. यह रचना-कर्म में लगे लोगों के लिए चुनौतियों से भरा समय है. पेशेवर-गैर-पेशेवर कलाकर्मी सभी इन चुनौतियों का सामना कमो-बेश कर रहे हैं. नए मीडिया और तकनीकी बदलाव नई कला-संभावनाएँ पैदा कर रहे हैं, और नई पीढ़ी में वे अपनी जगह बना रहे हैं. आज वे सबसे ज्यादा आज़ाद आवाजें हैं.

क्या हम इप्टा की विरासत को संभाले हुए, अनेक जन संस्कृति-मंचों की कला-अभिव्यक्तियों को समोए हुए, अनेक स्वतंत्र जन-अभिव्यक्तियों को धारण किए हुए देश के उन अनेक-अनगिनत पेशेवर-गैर-पेशेवर लोकतांत्रिक स्वरों के किसी साझा मंच की तरफ बढ़ सकते हैं? यह राष्ट्रीय कन्वेंशन इसी सवाल को केंद्र में रखकर एक साझे प्रस्ताव को देश के सामने लाने के लिए आयोजित है. इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह की आयोजन-समिति ने हमें यह मौक़ा दिया है कि हम ऐसा कर सकें, जिसमें उसके सांगठनिक सदस्य देश के तमाम स्वतंत्र कलाकारों और अलग-अलग जन-संगठनों के सदस्यों की तरह केवल प्रतिनिधि के रूप में शामिल होंगे, यह अवसर देने के लिए आयोजन-समिति के प्रति हम आप सबकी तरफ से अपना आभार प्रकट करते हैं.

दोस्तो,

आज जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे ज्यादा सीधे, तीखे, बारीक और कई बार लगभग अदृश्य हमले बढे हैं, आज़ाद आवाज़ों को न केवल अनसुना किया जा रहा है, उन्हें दबाया-कुचला-बिगाड़ा-बदनाम किया जा रहा है, जब झूठ की बादशाहत है और सच को भीड़ कुचल रही है, आज़ादी से लिखने-बोलने वालों की हत्याएँ हो रही हैं, विरोध और असहमति को ‘देशद्रोह’ कहा जा रहा है, एक ऐसे समय में जब निरपराध लोगों को सत्ता के संरक्षण में उन्मादी-अपराधी झुंड में बदल देने की तरफ देश चल पड़ा है, और जब इस खतरनाक पृष्ठभूमि में देश अगले आम चुनाव की तरफ बढ़ रहा है, हर तरह की आज़ाद और असहमत आवाजों को एक मंच पर, अथवा कहना चाहिए, एक साथ अनेक मंचों पर, आना ऐतिहासिक ज़रूरत है. आज का कन्वेंशन इसी मंच का एक प्रस्ताव है.

दोस्तो,

ताक़तवर और मज़लूमों की लड़ाई नई नहीं है. इस लंबी-अनथक लड़ाई के बेहतर नतीजों को अब छीना जा रहा है और अगर समय पर जन एवं संवैधानिक हस्तक्षेप न हो, तो कहना चाहिए कि हम कमज़ोरों-पिछड़ों-आदिवासियों-औरतों-दलितों को पशुसमान नकेल पहना देने के दौर से गुज़र रहे हैं. और ये हमें काबू करनेवाले कौन लोग हैं? ये वही ताक़तवर लोग हैं, जो मुट्ठी-भर तो हैं, लेकिन, जिनका देश के संसाधनों पर पूरा कब्जा है. मीडिया इनकी चाकरी करता है, इनमें सरकार को बदल देने की कूवत है, ये देशी-विदेशी कॉरपोरेट लाव-लश्कर की मदद से देश में कुछ भी कर सकते हैं, ये अकूत संपदा के मालिक हैं और देश की संपदा लेकर ये देश के बाहर कभी जा सकते हैं, और जब चाहे लौटकर राज्यसभा के सांसद तक बन जा सकते हैं, ये हर तरह की तिकड़म में माहिर और मूलतः षड्यंत्रकारी लोग हैं, इनकी शक्ति और क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये ताक़तवर लोग इस समय अपनी मन-मर्ज़ी से कुछ भी कर सकते हैं!

दोस्तो,
हम इस समय दूसरों को दुश्मन घोषित कर देने और उन्हें नेस्तनाबूद कर देने की उन्मादी मानसिकता के दौर से गुज़र रहे हैं. हमें दूसरों की निजता का सम्मान करने के बजाय यह बताया जा रहा है कि जो जितना अलग है, वह उतना खतरनाक है, यह ‘अलगाव’ सर्वत्र लागू है. जान-बूझकर अंधराष्ट्रीयता को बढ़ावा दिया जा रहा है. देश का मतलब भूमि का टुकड़ा बताया-बनाया जा रहा है, जहाँ से संपदा बटोरने के लिए लोग बेदखल किए जाएँगे (लोग बेदखल किए जा रहे हैं) और ये ‘बेदखली’ दो तरह से की जाएगी (की जा रही है) – मूलवासियों को राष्ट्रद्रोही-उग्रवादी घोषित करते हुए धीरे-धीरे उनका सफाया करना, या सैन्यबलों और उन्मादी भीड़ द्वारा उन्हें धकेल कर एक बाड़े में रहने को मजबूर करना.

इस दौर में हमें साफ़ समझना होगा कि वे कौन लोग हैं, जो देश के दलितों-आदिवासियों-औरतों-मुसलमानों-ईसाइयों को घेरे में ले रहे हैं, और उनके हिमायती बुद्धिजीवियों को डरा-धमका रहे हैं, पुलिस-कानून का इस्तेमाल कर उन्हें जेल में डाल रहे हैं, देश के लोगों से सर्वाधिक प्रेम करने वालों को ‘देशद्रोही’ और ‘शहरी नक्सल’ बता रहे हैं?

वे लोग कौन हैं, जो गप्प-कपोल कल्पना को विज्ञान की जगह दे रहे हैं और अपनी ‘सनक’ और प्रचार पाने के सुख (जैसे ‘नोटबंदी’) को अभूतपूर्व राजनयिक पहल बता रहे हैं! वे कौन लोग हैं, जो विद्वानों-पत्रकारों-तर्कवादियों की हत्याएँ कर रहे हैं? क्या हम ऐसे दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ षड्यंत्रकारी कभी पकड़ा नहीं जा सकेगा? समय की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि मूर्खता और अंधविश्वास राज करे और लोग प्रसन्न हों! निश्चित रूप से हम ऐसे राजनीतिक दौर में पहुँच चुके हैं, जो सीधे-सीधे ‘फ़ासिस्ट’ न भी हो, लेकिन जिसके कई सुस्पष्ट लक्षण सामने आ चुके हैं.

एक समय पूरी दुनिया के बौद्धिकों ने मिलकर फ़ासिस्ट-विरोधी मोर्चा बनाया था, अब हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं, जब फ़ासिस्ट-विरोधी होना या खुद को फ़ासिस्ट-विरोधी घोषित करना भी वर्तमान शासन-सत्ता को असहज कर सकता है!

कन्हैया कुमार का वक्तव्य 

आज़ादी के बाद गाँधी की हत्या पहली राजनीतिक हत्या थी और अब यह राजनीति खुल्लमखुल्ला हमारे सामने खड़ी है. हत्या की इस कड़ी में गौरी लंकेश तक का क्रम यह साबित करता है कि बहुसंख्यकवादी-हिंदुत्ववाद को पूर्णतः परास्त किए बिना हम एक न्यायपूर्ण भारत नहीं बना सकेंगे और न ही हम पितृसत्ता-अंधराष्ट्रीयता-वर्णवाद का मुकाबला कर सकेंगे.

दोस्तो,
यदि हम कुछ नारों-माँगों के ज़रिए इस मंच की अहमियत को समझें, तो इसकी ज़रूरत को भी हम समझ सकेंगे :

1. उग्र हिंदूवादी संगठनों-समेत उन सभी संगठनों, जिनके सदस्य विभिन्न प्रकार की हिंसक वारदातों में संलिप्त रहे हैं, पर पाबंदी लगाओ.
2. मानवाधिकार कार्यकताओं पर किए जा रहे हमले रोको और उन पर किए गए झूठे मुक़दमे वापस लो.
3. दुश्मन राष्ट्र का प्रचार बंद करो.
4. सैनिक अभियानों का राजनीतीकरण बंद करो.
5. औरतों-दलितों-आदिवासियों-मुसलमानों-ईसाइयों पर हमले बंद करो और उन्हें अलग-थलग करने की साजिश का विरोध करो.
6. फाँसी की सज़ा को ख़त्म करो.
7. किसी भी तरह की हिंसा का विरोध करो.
8. असहमतियों का सम्मान करो.
9. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को बहाल करो.
10. कॉरपोरेट लूट पर प्रभावी रोक लगाओ.
दोस्तो, लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं, जितने हमले बढ़े हैं, प्रतिरोध बढ़ा है. आम भारतीय जन, नागरिक-बुद्धिजीवी और नौजवान केवल विपक्षी राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं, अपनी पहल पर विरोध और असहमति के उदहारण पेश कर रहे हैं. मानव-अधिकारों और निजता की हिफाज़त के लिए, औरतों पर की जा रही हिंसा के खिलाफ़, स्वतंत्र-निजी यौनिकता के सम्मान के लिए, दलितों-मुसलमानों-ईसाइयों पर हो रहे हमले के सवालों को लेकर जनता के कई समूह बिना पहले से तय की गई किसी राजनीतिक वफादारी के सड़कों पर उतरे हैं. ये सत्ता की गोदी में बैठे मीडिया के झूठ और प्रचारित-प्रसारित अर्द्धसत्यों के बरक्स सही तथ्य और नए वृतांतों को सामने ला रहे हैं. यह अवश्य है कि ये पाबन्द किए जा रहे हैं, डराए-धमकाए-ललचाए जा रहे हैं, इन पर हमले हो रहे हैं, इसके बावजूद ये बेख़ौफ़ सामने आ रहे हैं. बेख़ौफ़ आवाजों के ये समूह आज के समय की सबसे बड़ी ताक़त हैं. “जन-अभिव्यक्तियों का राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच” ऐसी बेख़ौफ़ आवाजों का खुला मंच है.

 

दोस्तो,
यह मंच कैसे काम करेगा, कब तक करेगा, क्या करेगा, कौन-से लोग या संस्थाएँ इसका हिस्सा होंगी, उसका एक संक्षिप्त खाका प्रस्तावित है :

 

1. मंच की कार्यावधि किसी राष्ट्रीय कन्वेंशन में ही तय होगी.
2. इस मंच की किसी राजनीतिक दल के प्रति कोई वफादारी नहीं होगी.
3. मूल प्रस्ताव से पूर्णतः या अंशतः सहमत कोई भी व्यक्तिगत स्तर या सांगठनिक स्तर पर इस मंच से सम्बद्ध होगा, और जब चाहे बिना किसी कथित अनुमति के, उसे इस मंच से अलग होने का अधिकार भी होगा.
4. यह मंच पारम्परिक मीडिया के स्थान पर नए मीडिया के माध्यम को विकसित करेगा.
5. यह मंच एक व्यापक “सामाजिक मीडिया” का रूप ले सकता है, जिसके सभी सदस्य होंगे और अपने विचार खुलकर व्यक्त करेंगे.
6. इसके संयोजन-संचालन और समय-समय पर मुद्दों पर सुझाव देने के लिए एक “मॉनिटरिंग कमिटी” (निगरानी/अनुश्रवण समिति) बनाई जा सकती है.
7. यह मंच मुख्यतः तात्कालिक तौर पर औरतों-दलितों-आदिवासियों के मुद्दों को सामने रखकर कार्य करेगा. यह मूलतः पितृसत्ता-वर्णवाद-अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ बेख़ौफ़-आज़ाद आवाज़ों का मंच होगा.
8. यह वर्तमान शासन-सत्ता के विरोध का और असहमति का मंच होगा.

दोस्तो,

यह बहस आरम्भ करने का एक प्रस्ताव है, यह राष्ट्रीय कन्वेंशन, और इसमें शिरकत करनेवाले देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कलाकार-संगठनकर्ता इस प्रस्ताव की दिशा तय करेंगे, इस उम्मीद के साथ यह प्रस्ताव आप सबके समक्ष प्रस्तुत है कि पूरे राष्ट्र की आवाज़ यहाँ से सामने आएगी.

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हम विचारों की जंग हार गये तो राजनैतिक लडाई भी हार जायेंगे .ः गौहर रजा

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प्रभात खबर

 पटना : हमारा समाज रूढ़िवादी परंपराओं की रही है. हमारे पास ऐसी कोई पहचान नहीं रही है, जो पूरे मुल्क को एक सूत्र में बांध कर रख सके, फिर भी हमने आजादी के आंदोलन में एक बड़े लक्ष्य के आगे संकीर्ण भेदों को मिटा कर रख दिया. यह संभवत: उस समय के नेतृत्व की काबिलियत थी. अब ऐसा नहीं है. लेकिन, हमारे संविधान में वे सभी तत्व मौजूद हैं, जो बहुलता के बावजूद सभी को एक सूत्र में बांध कर रख सकें. यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अगर हम विचारों की लड़ाई हार गये, तो राजनीति की जंग भी हार जायेंगे. उक्त बातें वैज्ञानिक, उर्दू के लेखक, शायर, सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍म मेकर गौहर रजा ने इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह के तीसरे दिन भारतीय नृत्य कला मंदिर में आयोजित ‘भारत की संस्कृति एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिचर्चा में कहीं.

सेमिनार की शुरुआत करते हुए सुप्रसिद्ध लेखक वीरेंद्र यादव ने कहा कि भारत की संस्कृति को एक रंग में रंगने की कोशिशें पिछले दिनों बहुत तेज हुई हैं. इप्टा के महासचिव राकेश ने शेख सादी की एक कहानी के हवाले से कहा कि किसी काल का सांस्कृतिक रुझान क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी नियंत्रक शक्ति किन हाथों में है.

  ‘संस्कृति’ संकट विशुद्ध राजनीतिक :

शैलेंद्र झारखंड इप्टा के शैलेंद्र कुमार ने कहा कि हम जिसे ‘संस्कृति’ का संकट बता रहे हैं, वह संकट दरअसल विशुद्ध राजनीतिक है और वह कालखंड के इस दौर में संस्कृति का मुखौटा पहनकर आयी है. सत्ता बहुलवादी संस्कृति को सुविधानुसार अपने सांचे में ढालने के प्रयास में लगी हुई है. यह आवाज को दबाने का नया विमर्श है, जो जीवन की नमी को सोखनेवाला है. फिल्मकार एमएस सथ्यू ने इप्टा के गठन के दिनों की याद करते हुए कहा कि तब भी हमारे सामने कुछ ऐसी ही चुनौतियां थीं. चर्चा में दक्षिण भारत के केपी शशि और बंगाल के रंगकर्मी शमिक बंदोंपाध्याय ने भी हिस्सा लिया. कार्यक्रम के आखिर में इप्टा रायगढ़ की नाट्य आलेख पर केंद्रित ‘रंगकर्म’ पत्रिका का लोकार्पण किया गया.
. उषा आठले ने पत्रिका का संक्षिप्त परिचय दिया.


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इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह में बोले जावेद अख्तर खां, अभिनेता रंगमंच का केंद्र

 

प्रभात खबरः

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह का आज 31 अक्तूबर को 5वां और अंतिम दिन राष्ट्रीय संगोष्ठी-4 में बोलते हुए वरिष्ठ अभिनेता जावेद अख्तर खां ने कहा कि रंगमंच के केंद्र में अभिनेता ही होता है. शंभु मित्रा व उत्पल दत्त की याद में भारतीय नृत्य कला मंदिर में “अभिनय और रंगमंच” पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी-4 में आज जावेद अख्तर खां अपनी बात रख रहे थे.

इसमें मुख्य वक्ता के रूप में निर्देशिका और अभिनेत्री वेदा राकेश, अभिनेता जावेद अख्तर खां और अभिनय शिक्षक और नाटकार आसिफ अली उपस्थित थे. संगोष्ठी का संचालन इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हिमांशु रॉय ने किया. जावेद अख्तर खां ने कहा कि नाटकों में दर्शक अपनी नजर से अभिनेता को देखता है, बल्कि उसे कहां से देखना है यह भी दर्शक तय कर सकता है. उसी तरह अभिनेता भी मंच पर अपनी स्थिति तय करता है. यही अभिनेता की ताकत है, लेकिन सिनेमा में यह संभव नहीं है. सिनेमा में अभिनेता को कैमरे की नजर से देखना पड़ता है. सिनेमा में अभिनेता अपनी स्थिति तय नहीं कर सकता, वह सब निर्देशक के हाथ में होता है.

महान ब्रिटिश नाटककार जी बी प्रिस्टले को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि सच और भ्रम के जादू को ही अभिनय कहते हैं. अभिनेता अपने टाइम और स्पेस से दर्शकों को निकाल कर चरित्र के टाइम-स्पेस में लेकर चला जाता है. उन्होंने आगे अपनी बात बढ़ाते हुए कहा कि कोई भी जन्म से अभिनेता नहीं होता, उसे सीखना पड़ता है. इसलिए जावेद अख्तर खां ने एक्टिंग-ट्रेनिंग को अनिवार्य बताया.

अभिनेता स्वयं अपना माध्यम :

जावेद अभिनय कला की बारीकियों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अभिनेता स्वयं अपना माध्यम है. उसका शरीर उसका माध्यम है इसलिए शरीर का ध्यान रखा जाना चाहिए. निरंतर अभ्यास करना चाहिए. किसी भी तरह के आवेश में अभिनय नहीं करना चाहिए. अंत में उन्होंने कहा कि अभिनय सबसे पहले नकल है, लेकिन जब नकल असल का भ्रम देने लगे तो अभिनय हो जाता है. गुुरु शिष्य परंपरा से भी होती है ट्रेनिंग : आसिफ अली आसिफ अली ने ट्रेनिंग के अलग-अलग रूप को समझाते हुए कहा कि परंपरागत रूप से नाटक करने वाले भी एक तरह की ट्रेनिंग अपनी परंपरा से लेते हैं. गुरु शिष्य परंपरा से भी ट्रेनिंग होती है. गुरु अपना शिष्य चुनता है कि उसके अर्जित ज्ञान का वह (शिष्य) पात्र भी है या नहीं. इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जो ज्ञान परंपरा के जरीये मिलता वह एक तरह की ट्रेनिंग ही है. उन्होंने आगे कहा कि रंगमंच जीवन जैसा जरूर है, लेकिन जीवन नहीं है. वैसे ही अभिनय भी जीवन जैसा होता है लेकिन जीवन नहीं होता. अभिनय में हमें कार्य और कारण को समझना चाहिए.


अभिनय विज्ञान की तरह है यानी उसमें तर्क होता है. तभी हम चरित्र के सत्य तक पहुंच पाते हैं. इसलिए सवाल करना जरूरी है यही वैज्ञानिक प्रक्रिया है अभिनय का. आसिफ अली ने आगे बात करते हुए कहा कि अभिनय दो तरह से किया जाता है, चरित्र की प्रस्तुति और चरित्र का प्रतिनिधित्व. रंगमंच के अभिनय में चरित्र का प्रतिनिधित्व हो सकता है लेकिन सिनेमा में अभिनेता को चरित्र की प्रस्तुति करनी होती है.

इस संगोष्ठी की तीसरी और अंतिम वक्ता वेदा राकेश ने अभिनय और रंगमंच को समझाने के लिए अपने तीन नाटकों के छोटे छोटे एकल टुकड़े दिखाए. जिनमें “ट्रॉय की औरतें” के उनके अभिनय पर दर्शक भावुक हो गये. … उस दिन वह अभिनेता बन जायेगा : अखिलेंद्र मिश्रा बातचीत के दौर में अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने कहा कि शरीर के अंदर पूरा ब्रह्मांड है, जिस दिन अभिनेता अपने अंदर झांकना सीख जाएगा उस दिन वह अभिनेता बन जायेगा. 

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लोकगीत और लोकनृत्य से बिहार के कलाकारों ने बिखेरी अपनी संस्कृति की छटा.

 

समाजी भगत 

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के मौके पर प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया गया है. यह प्रदर्शनी भारतीय नृत्य कला मंदिर के बहुद्देश्यीय सांस्कृतिक परिसर की गैलेरी में लगी है. इसमें इप्टा से जुड़े अहम दस्तावेज, संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से सम्मानित कलाकारों की तस्वीरें, गांधी जी की 150वीं जयंती पर उनके विचार, कविता पोस्टर और कंधमाल हिंसा पर फोटो शामिल है. तीन गैलेरी में फैली इस प्रदर्शनी का उद्धघाटन मशहूर चित्रकार सवींद्र सावरकर ने किया.

इस आयोजन के लिए बहुद्देश्यीय परिसर को मशहूर चित्रकार और इप्टा आंदोलन से जुड़े चित्त प्रसाद को समर्पित किया गया है. मालूम हो कि चित्त प्रसाद ने ही इप्टा का निशान बनाया था.

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*IPTA National Platinum Jubilee Festival*
*27 to 31 October 2018*
Kaif Azmi Mahanagar; Patna (Bihar)

चित्त प्रसाद को समर्पित इप्टा की प्रदर्शनी

इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के मौके पर प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया गया है। यह प्रदर्शनी भारतीय नृत्य कला मंदिर के बहुद्देश्यीय सांस्कृतिक परिसर की गैलेरी में लगी है।

इसमें इप्टा से जुड़े अहम दस्तावेज, संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से सम्मानित कलाकारों की तस्वीरें, गांधी जी की 150वीं जयंती पर उनके विचार, कविता पोस्टर और कंधमाल हिंसा पर फ़ोटो शामिल है। तीन गैलेरी में फैली इस प्रदर्शनी का उद्धघाटन मशहूर चित्रकार और कला शिक्षक सवीन्द्र सावरकर ने किया।

इस आयोजन के लिए बहुद्देश्यीय परिसर को मशहूर चित्रकार और इप्टा आंदोलन से जुड़े चित्त प्रसाद को समर्पित किया गया है। चित्त प्रसाद ने ही इप्टा का निशान बनाया था। उसके अंतर्गत तीन गैलरी को सुनील जाना, सोमनाथ होर, जैनुल आबेदीन का नाम दिया गया है।

सुनील जाना कला दीर्घा में केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी ने उन कलाकारों और नाटकों की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई है जो इप्टा से जुड़े रहे हैं और जिन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कृत और साम्मानित किया है। इसकी अभिकल्पना परवेज़ अख़्तर की है जिसमें उनका सहयोग योगेश कुमार पाण्डेय और नासिरुद्दीन ने किया है।

सोमनाथ होर कला दीर्घा में इप्टा के इतिहास की झलक की प्रदर्शनी लगाई गई है। जिसमें इप्टा की स्थापना (1943) के पूर्व की देश-काल-परिस्थिति को रेखांकित करते हुए इप्टा की स्थापना, संस्थापक और पहली महासचिव अनिल डी सिल्वा, कम्युनिस्ट पार्टी के पी. सी. जोशी, सेन्ट्रल कल्चरल स्कवाड, नाटकों पर पाबंदियों आदि से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर इप्टा की निष्क्रियता और फिर से पुनर्गठन से लेकर गोल्डन जुबली समारोह, पटना और आज तक की राष्ट्रीय इप्टा की सक्रियता की अच्छी खासी झलक दिखाई देती है।

इसके साथ ही बिहार इप्टा की तरफ़ से इप्टा के तमाम सदस्यों से एक अपील भी की गई है, चूंकि यह प्रदर्शनी इप्टा के इतिहास की मात्र एक झलक है, कि जिनके पास भी इप्टा से जुड़े कोई भी दस्तावेज़ हों तो वे बिहार इप्टा को उपलध करवाएं ताकि आगे आने वाले दिनों में इसे जोड़ा जा सके। इस प्रदर्शनी की अभिकल्पना नासिरुद्दीन के की है और इसमें उनके सहयोगी रहे संजय सिन्हा, फ़रीद खां, तनवीर अख़्तर और फ़ीरोज़ अशरफ़ खां।

 

इसमें इंदौर इप्टा के मुकेश बिजोले व अशोक दुबे और अशोक नगर इप्टा के पंकज दीक्षित की एक प्रभावशाली कविता-पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई है.

 

ज़ैनुल आबदीन कला दीर्घा में कंधमाल हादसे के दस साल पूरे होने पर एक छाया-चित्र प्रदर्शनी लगाई गयी है। इसकी अभिकल्पना कर्नाटक के फ़िल्मकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता के पी ससी ने की है।

इसी के साथ नट-मंडप द्वारा महात्मा गाँधी के जन्म के 150 साल पूरे होने पर उनकी तस्वीरों, उद्धरणों और उनके आन्दोलन से सबंधित प्रदर्शनी लगाई गई है।

लखनऊ इप्टा द्वारा उत्तर प्रदेश में इप्टा के नाटकों, आन्दोलनों और गतिविधियों की एक बेहतरीन प्रदर्शनी भी इसका हिस्सा है। जिसमें नाटकों की तस्वीरें, सांप्रदायिकता विरोधी कबीर और नज़ीर यात्राओं का वर्णन और अन्य गतिविधियों की अच्छी जानकारी मिलती है।


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इप्टा के 75वें वर्ष की शुरूआत के मौके पर पटना इप्टा ने विशेष कार्यक्रम ‘‘आग़ाजः जनगीतों का उत्सव़’’ का आयोजन 25 मई, 2017 को प्रेमचंद रंगशाला परिसर, राजेन्द्र नगर में किया। ‘आग़ाज़ः जनगीतों का उत्सव’ कार्यक्रम के अंतर्गत इप्टा के कलाकार जनवादी गीतों की प्रस्तुति की गयी और इप्टा के 74 साल के सांस्कृतिक संघर्ष से दर्शक रू-ब-रू हुए। इसके तहत वरिष्ठ संगीतकार सीताराम सिंह के संयोजन में दस दिवसीय ‘इप्टा संगीत कार्यशाला’ में तैयार किये गये चुनिन्दा जनगीतों की प्रस्तुति की गई। https://youtu.be/8ysmFxnD_os 

ऑडिटोरियम में इप्टा की तीसरी शाम रंग संगीत की प्रस्तुति से सजी.

 

रंग संगीत ः दैनिक भास्कर

24 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह में शनिवार को तीसरी शाम पटना इप्टा की टीम ने रंग संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में रंगकर्म के प्रसिद्ध नाटकों के संगीत और सीताराम सिंह द्वारा लिखे और संयोजित रंग संगीत की प्रस्तुति दी गई। इनमें प्रमुख रूप से मुझे कहा ले आये हो कोलंबस, एमएफ हुसैन की आत्मकथा, धरती का जादूगर के संगीत शामिल थे। इन प्रस्तुतियों को सुन दर्शकों के बीच उत्साह का माहौल बना रहा। 

नाट्य समारोह के तीसरे दिन पटना इप्टा के सीताराम सिंह को रायगढ़ का प्रतिष्ठित 9वां शरदचंद्र वैरागकर स्मृति रंगकर्म सम्मान प्रदान किया गया। इप्टा रायगढ़ के साथ ही जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, अग्रसेन सेवा संघ, तनया ग्रुप एवं शहर की अन्य सामाजिक संस्थाओं ने भी शाल और श्रीफल भेंट कर सीताराम का सम्मान किया। सम्मान प्राप्त करने के बाद उन्होंने लोगों को सं‍बोधित करते हुए कहा कि इस सम्मान और लोगों के प्यार से वे अभिभूत है। इससे पहले भी उन्हें 1917 में व्यथा म्यूजिकल फीचर के लिए आकाशवाणी द्वारा वार्षिक सम्मान दिया गया था। इतना ही नहीं वे 2012 में आकाशवाणी द्वारा गजल में टॉप ग्रेड से सम्मानित हो चुके हैं। पटना और बेगूसराय इप्टा के लगभग सभी नाटकों का संगीत संयोजन और निर्देशन इन्हीं के द्वारा किया जाता है। वे मैथिली फीचर फिल्म लालका पाग में भी संगीत निर्देशन किया है। 

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इप्टा की राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह में पटना की धरती पर भारत का अणु रूप मौजूद था। इसकी खूबसूरती का बयान शब्दों में किया जाना असंभव है।

अनेकता में एकता को प्रस्तुत कलाकारों का यह दृश्य कई संदेश प्रसारित कर रहे थे। कई भाषाओं के लोग एक साथ सड़कों पर चल रहे थे। भाषाओं के भेद के बावजूद लोग एक दूसरे से ऐसे मिल रहे थे जैसे एक दूसरे को बहुत पहले से जानते पहचानते हों। आपसी सौहार्द में भाषाओं के भेद विलीन हो गए थे।

भारत के इस अणु रूप को देख कर यही अहसास हो रहा था कि जैसा भारत का संपूर्ण रूप आज दिख रहा है वैसा नहीं है। भारत के संपूर्ण रूप को बिगाड़ने की कोशिश और इसके वास्तविक रूप को विकृत करने की जो कोशिश हो रही है उसे रोकने का संदेश देता है इप्टा की राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह। पटना में उपस्थित भारत का अणु रूप साझी विरासत और साझे संघर्ष की संस्कृति को समृद्ध करने की आवश्यकता को महसूस कराता है। आइए हम सब मिलकर अपनी साझी विरासत और अपने साझे संघर्ष के लिए एकजुट हों!

* प्रेम प्रकाश इप्टा बिहार
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