क्या बस्तर से आएगी नई सरकार की राजमुकुट ःः उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

 

12.11.2018

छत्तीसगढ़ में 12 नवम्बर को पहले चरण का विधानसभा चुनाव होना है। पहले चरण का मतदान देश के आंतरिक मामलों को प्रभावित करने वाले धुर नक्सल प्रभावित बस्तर और राजनांदगांव क्षेत्र यानी जिसे नो मेन्स नो लेन्ड कहा जाता है वहां होगा। मतदाता यहां 190 उम्मीदवारों में से 18 विधायकों का भाग्य का फैसला करेंगे। इसे लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई है और मतदान टीमों को रवाना भी कर दिया गया है 650 मतदान दलों को हेलीकॉप्टर से भेजा गया है। पहले चरण की 18 सीटों में से ज्यादातर नक्सल प्रभावित हैं। इस वजह से मतदान का वक्त अलग-अलग है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 10 सीटों (मोहला-मानपुर, अंतागढ़, भानुप्रतापुर, कांकेर, केशकाल, कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और कोंटा) पर मतदान सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक होगा। बाकी सीटें राजनांदगांव, डोंगरगढ़, खैरागढ़, बस्तर, जगदलपुर, चित्रकोट, डोंगरगांव और खुज्जी में 8 से 5 बजे तक वोट डाले जाएंगे।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के 31,79,520 मतदाता मुख्यमंत्री रमन सिंह, उनके मंत्रिमंडल के दो सदस्यों, भाजपा सांसद और कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं समेत 190 उम्मीदवारों की भाग्य का फैसला करेंगे। जिन 18 सीटों पर मतदान होगा उनमें से 12 सीट बस्तर क्षेत्र में तथा छह सीट राजनांदगांव जिले में है। पहले चरण में 18 सीटों में से 12 सीट अनुसूचित जनजाति के लिए तथा एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। जिन 18 सीटों पर मतदान होगा उनमें से मुख्यमंत्री रमन सिंह की सीट राजनांदगांव पर भी देश भर की नजर टिकी हुई है। इस सीट पर सिंह के खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला चुनाव मैदान में है।

कांग्रेस पार्टी ने शुक्ला को सिंह के खिलाफ प्रत्याशी बनाकर कांग्रेस ने वाजपेयी के नाम पर भाजपा को मिलने वाले अटल वोटों पर सेंध लगाने की कोशिश की है। सिंह ने वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनाव में झीरम घाटी में नक्सली हमले में अपनी जान गंवाने वाले उदय मुदलियार की पत्नी अल्का मुदलियार को हराया था। उदय मुदलियार की माओवादियों ने झीरम घाटी हमले में हत्या कर दी थी। पहले चरण के मतदान में मंत्री केदार कश्यप और महेश गागड़ा नारायणपुर और बीजापुर से चुनाव मैदान में है। उनके खिलाफ कांग्रेस ने चंदन कश्यप और विक्रम मंडावी को उतारा है. वहीं पहले चरण में भाजपा की ओर से कांकेर से लोकसभा सांसद विक्रम उसेंडी अंतागढ़ सीट से उम्मीदवार हैं. विक्रम उसेंडी के खिलाफ कांग्रेस के अनूप नाग हैं.

वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में विक्रम उसेंडी ने अंतागढ़ से जीत हासिल की थी लेकिन बाद में पार्टी ने उन्हें वर्ष 2014 में कांकेर लोकसभा सीट के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था। इस चुनाव में उसेंडी को जीत मिली थी और अंतागढ़ में उपचुनाव होने के बाद यह सीट फिर से भाजपा को मिल गई थी। लेकिन इस सीट में नमोशुदों को एससी का दर्जा और भाषा संबंधित मांगे लंबित होने से उनका राह आसान नहीं नजर आता है। पहले चरण के चुनाव में भाजपा की ओर से विधायक संतोष बाफना और सरोजनी बंजारे, जगदलपुर और डोंगरगढ़ सीट से उम्मीदवार हैं।

वहीं कांग्रेस के नौ विधायक भानुप्रतापपुर से मनोज सिंह मंडावी, कोंडागांव से मोहन लाल मरकाम, बस्तर से लखेश्वर बघेल, चित्रकोट से दीपक कुमार बैज, दंतेवाड़ा देवती कर्मा, कोंटा से कवासी लखमा, खैरागढ़ से गिरीवर जंघेल, केसकाल से संतराम नेताम और डोंगरगांव से दलेश्वर साहू, डोंगरगढ़ से भुनेश्वर बघेल पर पार्टी ने फिर से भरोसा जताया है। दंतेवाड़ा सीट से उम्मीदवार देवती कर्मा पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा की पत्नी हैं। महेंद्र कर्मा ने बस्तर क्षेत्र में सलवा जुडूम आंदोलन की शुरूवात की थी। 25 मई वर्ष 2013 को झीरम हमले में कर्मा की मृत्यु हुई थी। देवती कर्मा के खिलाफ भीमा मंडावी चुनाव मैदान में है। वहीं कवासी लखमा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और कांग्रेस विधायक दल के उपनेता हैं।

कोंटा कांग्रेस की परंपरागत सीट है. इस सीट से भाजपा के धनीराम वारसे लखमा के खिलाफ उम्मीदवार हैं। पहले चरण के मतदान में 31,79,520 मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। इनमें से 16,21,839 पुरूष मतदाता और 15,57,592 महिला मतदाता हैं. वहीं 89 तृतीय लिंग के मतदाता हैं। चुनाव के लिए 4,336 मतदान केंद्र बनाये गये हैं। विधानसभा के पहले चरण की 18 सीटों में जीत लिए राज्य के सभी राजनीतिक दलों ने अपनी ताकत झोंक दी है। पिछले चुनाव में सत्तधारी भाजपा को इनमें से केवल छह सीटों पर ही जीत मिली थी। भाजपा ने इस बार इस क्षेत्र में अधिक से अधिक सभाएं लेकर जनता को आकर्षित करने का प्रयास किया है और एजुकेशन हब, आजीविका कालेज, नक्सल समस्या पर लगाम जैसे मुद्दे उठाए हैं।

इन क्षेत्रों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी समेत अन्य नेताओं ने रैलियां की और अपनी पार्टी के लिए वोट मांगा. वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन सीटों पर पांच सभाएं और रोड शो कर मुख्यमंत्री रमन सिंह, क्षेत्र के सांसद और उनके बेटे अभिषेक सिंह पर कई आरोप लगाए। गांधी ने राफेल, राज्य में चिटफंड और पनामा पेपर समेत अन्य मुद्दों को उठाया है छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा के लिए दो चरणों में मतदान होगा। पहले चरण में नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र के सात जिलों और राजनांदगांव जिले के 18 सीटों के लिए मतदान होगा। वहीं 20 नवंबर को 72 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे।

राज्य में भाजपा पिछले 15 वर्षों से सत्ता में है और इस बार उन्होंने 65 सीटें जीतकर चौथी बार सरकार बनाने का लक्ष्य रखा है। वहीं कांग्रेस को भरोसा है इस बार उन्हें जीत मिलेगी और 15 वर्ष का नेतृत्व व अंदरूनी टूटन समाप्त होगा। राज्य के दोनों प्रमुख दल सरकार बचाने और बनाने को लेकर आमने सामने हैं। नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सोमवार का सूरज उम्मीदों की नई किरण राजसत्ता के लिए नई राजमुकुट के लिए चमकेगा। विकास इतनी दू्रत गति से चल रही है कि राज्य गठन के बाद प्रदेश में 36 प्रतिशत आदिवासी आबादी अब घट कर 32 प्रतिशत रह गई है। यहां सत्ता इसलिए भी नहीं कि संविधान की पांचवी, छठवीं अनुसूची, पेसा कानून, वन अधिकार कानून, सीएसआर, डीएमएफ यहां लागू नहीं होते हैं।

तथाकथित चौथे स्तम्भ की हालात यह है कि सच को उजागर करने वाले पत्रकारों को यहां जाने से रोका जाता है। जुलाई 2015 में सोमारू नाग को और अगस्त 2015 में संतोष यादव को गिरफ्तार किया गया। मालिनी सुब्रमण्यम को बस्तर छोडऩा पड़ा, प्रभात सिंह जेल की हवा खानी पड़ी। एडिटर्स गिल्ट ने मार्च 2016 में बस्तर, बीजापुर व आसपास के इलाकों का दौरा किया था और इससे जुड़े पत्रकार विनोद वर्मा को सीडी मामले में जेल में डाल दिया गया। छत्तीसगढ़ की सरकार बस्तर को भय और लूट का अड्डा बना दिया है। अंतागढ़, भानुप्रतापपुर, कांकेर, नारायणपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर तथा कोंटा को भारत की सबसे खतरनाक क्षेत्र माना जाता है। जहां लगभग 45 हजार सुरक्षा बलों को भेजा जा गया है।

बस्तर वास्तव में युद्धक्षेत्र है। अंदरूनी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं रोड, नाली, बिजली, स्कूल, रोटी, कपड़ा तथा मकान कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आता है। छत्तीसगढ़ गठन के 18 सालों बाद 16 जिलों में नक्सलियां ने अपनी समानान्तर सरकार कायम कर रखी है। नक्सल उन्मुलन के नाम पर 9 हजार करोड़ के फंड के अलावा संविधान की अनुच्छेद 275 के तहत मिलने वाली फंड को भी शिक्षा सहित कई मदों में खर्च कर दिया जाता है।दल्ली राजहरा से लेकर बैलाडीला तक टाटा, एस्सार, अदानी सहित सरकारी कम्पनियों की गिद्ध दृष्टि लूटो और भय कायम करो की राजनीति पर टिकी हुई है। सलवा जुडूम के बाद जो 650 गांव जला दिए गए थे उसे बार-बार जलाने की कोशिश हो रही है और ग्रामीण जो बसना चाहते हैं उन्हें मुठभेड़ में मारा जा रहा है। भयावह तस्वीर यह है कि पिछले दो दशक में बस्तर से लगभग 3 हजार युवतियां मानव तस्करी के भेट चढ़ चुकी है। 3 हजार से ज्यादा आदिवासियों को जेलों में बंद रखा गया है कइयों को कई खतरनाक बीमारी हो गए हैं कइयों की मौत हो गई है। इन इलाकों मेेंं लगभग 3हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया हैं।

हाल के 15 दिनों में ही नक्सल वारदातों के चलते नौ जवान शहीद हो गए वहीं पांच नागरिकों को भी जान से हाथ धोना पड़ा है। बस्तर के आदिवासियों, किसानों, श्रमिकों, युवाओं और महिलाओं को यह अच्छे से पता है कि यहां के चुनाव पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग ने भी यहां अधिकतम मतदान के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। आयोग द्वारा जहां कहीं भी आंशिक खतरा महसूस किया गया, उन जगहों से बूथों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया। इसके साथ ही मतदाताओं को जागरुक करने के लिए चुनाव आयोग ने कई कार्यक्रम चलाए।

बस्तर के आदिवासियों का सपना लगातार चूर-चूर होता चला आ रहा है। आदिवासी इलाके पेयजल, सडक़, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से आज भी वंचित है। लगभग 31 लाख से अधिक मतदाता क्या एक बार फिर से 12 विधान सभा निर्वाचन से 2018 में नई सरकार को राजमुकुट सौंपेगा। बस्तर का दुर्भाग्य कहिए आजादी के कई दशकों बाद आदिवासियों के पास न राशन कार्ड है न आवास योजना ही है। रोजगार के सौ दिनों से वे आज भी काफी दूर है। पिछले बार पूरे राज्य में एसटी 29 एससी 10 आरक्षित विधानसभा सीटों में से 08 सीट पर कांग्रेस ने अपना जगह बनाया था। भाजपा 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 55 सालों तक कांग्रेस को आदिवासियों ने सत्तासुख भोगने का सुअवसर दिया। लेकिन कांग्रेस के आदिवासी मसीहा, टायगर और लायन सभी अपनी-अपनी कश्ती नहीं बचा पाए।

आज भी कांग्रेस व भाजपा के पास एक भी चिराग नहीं जो आदिवासियों का नेतृत्व कर सकें। दोनों ही दलों ने आदिवासियों को हासिए में धकलने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। पिछले विधानसभा चुनाव में रमन ने अपनी साफ-सुथरी, चाल, चेहरे व चरित्र से आदिवासियों को भाजपा की तरफ आकर्षित करने व बांधे रखने में सफल हो गए थे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व अजीत जोगी ने समय-समय पर आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा उछाला हैं। लेकिन सरकार की किसानविरोधी नीति, शिक्षाकर्मियों का संविलियन, भिलाई इस्पात संयंत्र में दुर्घटना, चरण पादुकाओं, गाय-बैलों, नमक व एक से लेकर तीन रुपया किलो चावल, शराब, मोबाइल आदिवासियों के जीवन में बदलाव नहीं ला सका है। कांग्रेस ने भी अपने समय खूब दलिया, बकरी, मुर्गी व सुकर से लेकर ट्रक-बस व टीवी का वितरण किया था। किसी भी सरकार ने आदिवासियों के मान, सम्मान और स्वाभिमान को बनाए रखने शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार जैसे बुनियादी जरूरतों को अब तक पूरा नहीं किया है?

इसी वजह से आदिवासी समाज नक्सलवाद को अपना अभिव्यक्ति बना बैठे है। भाजपा, कांग्रेस, भाकपा जैसे अन्य पार्टियों की तकदीर सलवा जुडूम, सिंगाराम, ताड़मेटला, सारकेगुड़ा नरसंहार, एडसमेटा हत्या, नुलकातोंग, 5 वीं अनुसूची, 6 वीं अनुसूची, हिंदुत्व के दुष्प्रभाव, कार्पोरेट घरानों के साथ एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग) जैसे चुनौतियों के आस-पास घूमेगा। लेकिन विभिन्न पार्टियों व आदिवासियों के बीच दरभा घटना अंतरविरोध का काम करेगा। सलवा जुडूम का नेतृत्व करने के कारण महेंद्र कर्मा खुलकर सामने आ गए जिसका खामियाजा कांग्रेस को पिछले चुनाव से लेकर अब तक उठाना पड़ा।जिसके पास हथियार होता है वह ताकतवर कहलाता है। चाहे नक्सली हो या फिर अर्धसैनिक बल। इसलिए आसन्न चुनाव के पहले ही निजी सुरक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र रखने वालों से हथियार जमा कर लिए गए है। हाल के घटनाक्रमों ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों ही पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर आदिवासियों के लिए काम नहीं किया है। नीतिगत समानता व कई खुलासों ने कांग्रेस के साथ रमन के छबि को भी दागदार बना दिया है। यही कारण है, कि लालबाग में आयोजित भाजपा के रैली में आदिवासियों की कम उपस्थिति से रमन सिंह चिंतित है। भाजपा सलवा जुडूम से जितना भी बचने की कोशिश करे जुडूम में आडवानी की भूमिका का पर्दाफाश होने के बाद दोनों ही दलों की स्थिति बस्तर में संकट की हो सकती है।

०मुद्दे जो बस्तर के चुनाव को प्रभावित करेंगे
०सलवा जुडूम

5 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट से जारी आदेश के बाद सलवा जुडूम पर रोक लग गई। 640 गांव कब्रगाह में बदल गया। 302 गांव आंध्र में शरण लेने पलायन कर गए। 2 लाख आदिवासी विस्थापित कर दिए गए। इस दौरान 3 सौ हत्या, 99 बलात्कार, 103 घर जलाए गए। सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते आदिवासी बस्तर में घुटन भरी जिंदगी जी रहे है। पिछले चुनाव के दौरान दंतेवाड़ा में आडवाणी के आगमन के दौरान माटवाड़ा जुडूम कैंप में शिविरार्थियों को लाइन में बैठाकर गोलियों से भून दिया गया था। जिसे लोग आज भी नहीं भूला पाए है। 2002 से प्रारंभ जुडूम की भारी तबाही, धन की हानि और आपातकाल जैसी परिस्थितियों ने आदिवासी मन को अंदर तक गहरे जख्मों से भर दिया है। आडवाणी की सलवा जुडूम में भागीदारी के बाद यहां के चुनावी समीकरण अब बदल सकते है। महिलाओं के साथ कई महिनों तक बलत्कार हुआ। चाऊर वाले बाबा, दारू वाले बाबा, आदिवासी मुख्यमंत्री की इलेक्ट्रॉनिक गैजेट लालीपाप, उनका शांत, सौम्य व सादगी से लबरेज चेहरा भयानक भी हो सकता है। यह आदिवासियों को भी समझ आने लगा है।

०सिंगाराम की घटना

8 जनवरी 2009 को एसपीओ और जिला पुलिस बल के जवानों ने एक भिड़ंत में 18 नक्सलियों को मारने का दावा किया था। वास्तव में इस घटना में नक्सलियों को पनाह देने के आरोप में आदिवासियों को कतार में खड़ा कर न सिर्फ गोलियां मारी गई बल्कि इस नरसंहार को जायज ठहराने के लिए उन्हें नक्सली वर्दी पहना दी गई।

०ताड़मेटला दावानल

6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला गांव में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के 76 जवानों को मार गिराया। इसके बाद 11, 14 व 16 मार्च 2011 को कोया कमांडो ने मोरपल्ली, तिक्कापुरम और ताड़मेटला के आदिवासियों के साथ मारपीट किया। कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। तकरीबन 400 घरों को आग के हवाले कर दिया।

०सारकेगुड़ा का नरसंहार

28-29 जून 2012 को सारकेगुड़ा, कोत्तागुड़ा व राजपेंटा से बीज पंडुम का त्योहार मनाने एकत्रित ग्रामीणों व बच्चों को अर्धसैनिक बल ने अपने पूर्व नियोजित अभियान के तहत घेर कर अंधाधुंध गोलीबारी में मार गिराया। इस गोलीबारी में 17 निर्दोष आदिवासियों को अपना जान गंवाना पड़ा। इस मामले को लेकर पूरे देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई।

०एडसमेटा में हत्या

इस वर्ष 17 मई को बीज पंडुम मना रहे अर्धसैनिक बलों ने सारकेगुड़ा में अपनाए गए अभियान को दोबारा लागू करते हुए 3 बच्चों सहित आठ आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया। सभी घटनाओं में जांच को लेकर अनिश्चय की स्थिति बनी हुई है। लोकतंत्र में इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि सभी घटनाओं में पुलिस थाना में एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।

०नुलकातोंग जनसंहार

दक्षिण बस्तर में मूलनिवासियों के इस क्षेत्र में खेत-खिलहान कई किलोमीटर दूर जंगलों के बीच फैले होते हैं। इन सुदूर जंगलों में मूलनिवासी हल के साथ गाय को भी खेती जोतने में लगाते हैं। कालांतर में बदलते समय के साथ पेंदा खेती करने के बाद अब इन जंगलों में भी मूलनिवासी किसान फसल को तैयार करने के लिए एक झोपड़ीनुमा ढांचा जिसे लाड़ी कहते हैं खड़ा करते हैं, बता दें लाड़ी जंगल से प्राप्त बल्लियों, बांस, ताड़ के पत्तों व घास-फूंस से बनाते हैं । यहां लाड़ी का प्रयोग खेती का सामान रखने, खाना बनाने, फसल रखने और यदा कदा घोटुल के रूप में भी करते हैं। 5 अगस्त के उस भयावह रात को ऐसे ही एक लाड़ी में गांव से सुरक्षा बलों के आमद की डर से गांव के लगभग 30-35 लोग अपनी जान बचाने यहां दुबके बैठे थे, ग्रामीणों का कहना है कि सुरक्षा बल जब गांव आते हैं तो खासकर जवान युवक व युवतियों से पूछताछ, मारपीट, हत्या और जो खुशकिस्मतों होते हैं, को साथ ले जाकर यातना देकर जेलों में डाल देते हैं। ऐसे ही लाड़ी में से 15 लोग अगली सुबह 6 अगस्त को सुरक्षाबलों की गोलियों का शिकार हो गए। पुलिस का कहना है सिर्फ दो लोग जो हाथ ऊपर किए हुए थे उन्हें छोड़ दिया गया।

०5 वीं व 6 वीं अनुसूचियों का मामला

इन अनुसूचियों का विरोध करने के कारण अरविंद नेताम की पुत्री व महेंद्र कर्मा को यहां हार का मुंह देखना पड़ा। अरविंद नेताम द्वारा तीसरी मोर्चा का कमान सम्हालने से व महेंद्र कर्मा की असामयिक मृत्यु के बाद कांग्रेस में बस्तर का नेतृत्व करने वाला कवासी लखमा के सिवाय कोई नजर नहीं आ रहा है। उनकी यहां साफ-सुथरी छबि मानी जाती है। कोंटा से भाकपा से इस चुनाव में भाग्य आजमाने वाले मनीष कुंजाम इस मुद्दे पर अपनी सीट बचा लें। इन अनुसूचियों का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि यह आदिवासियों का स्वायत्तशासी सरकार गठन करने की ताकत देती है।

०हिंदू संस्कृति का प्रभाव

आदिवासी हिंदू नहीं है। यह सब जानते हैं। इसके बाद भी दोनों ही राजनैतिक दलों ने बाबा बिहारी दास, रामकृष्ण मिशन, आरएसएस के वनवासी संगठन, सरस्वती शिशु मंदिर व एकल विद्यालय द्वारा आदिवासियों के संस्कृति को खत्म कर हिंदू संस्कृति को थोपने का कार्य बस्तर में बड़े पैमाने में कर रही है। उनके प्रकृति पूजा को खत्म कर उन्हें हिंदू देवी-देवताओं को मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है। हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देते हुए वर्णव्यवस्था, जातिवाद व धर्म परिवर्तन की राजनीति यहां बड़े पैमाने में चल रही है।

०अंतागढ़ उपचुनाव में गड़बड़ी

कांकेर जिले के विधानसभा क्षेत्र अंतागढ़ के 2014 में हुए उपचुनाव में गड़बड़ी को लेकर लगी चुनाव याचिका हाईकोर्ट में खारिज हो गई है। याचिका प्रत्याशी रूपधर पुडो ने लगाई थी। इस मामले में उस वक्त नया मोड़ आने की उम्मीद की जा रही थी जब पंकज महावर ने हाईकोर्ट में आवेदन लगाकर गवाह बनने की इच्छा जताई थी। अंतागढ़ चुनाव में हारे हुए प्रत्याशी रूपधर पुडो बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी।

उनका आरोप था कि चुनाव में भारी धांधली की गई है। इस मामले में कांग्रेस के प्रत्याशी मंतूराम पवार के ऐनवक्त पर नाम वापस लेने की वजह से बवाल हुई था। बाद में कांग्रेस ने अंतागढ़ उपचुनाव में फिक्सिंग का आरोप लगाते हुए टेप जारी किया था। जिसमें पूर्वमुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके विधायक पुत्र अमित जोगी सहित अन्य पर आरोप लगे थे। इस चुनाव में 11 प्रत्याशियों ने नाम वापस लिए थे और 12वें प्रत्याशी रूपधर पुडो थे।

०कार्पोरेट घरानों के साथ एमओयू

टाटा व एस्सार जैसे बड़े कंपनियों द्वारा जबरन आदिवासियों के जमीन अधिग्रहण ने यहां की जिंदगी को नरक बना दिया है। जमीन अधिग्रहण के लिए ही सलवा जुडूम जैसे कुख्यात जनशिकार ने यहां जन्म लिया। बैलाडीला और अरिडोंगरी जैसे खनन क्षेत्रों को जिन्हें राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने माइनिंग लाइसेंसके तहत अपने पास रखा था, प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस के जरिए निजी कंपनियों को दे दिया गया। इसी तरह राजनांदगांव के बोरिया-टिब्बू, हहलादी और कांकेर जिलों के ज्ञात खनन क्षेत्रों को भी निजी कंपनियों को दे दिया गया। यह सब कुछ सिर्फ सहमति पत्रों के आधार पर ही किया गया। चुनाव जीतने के लिए जन आकांक्षाओं को कभी महत्व नहीं मिला।

आदिवासी जनमत को अधिक समय तक मुगालते में नहीं रखा जा सकता है। स्वंयभू आदिवासी नेताओं का डिंडोरा कोई भी पार्टी नहीं पीट सकती है। उक्त मुद्दों के इर्दगिर्द इस विधान सभा में राजनीतिक पार्टियों का जीत-हार निर्भर करेगा। अर्धसैनिक बलों पर आचार संहिता का अंकुश रहे तो निश्चित तौर पर 2018 का चुनाव एंटी इन्कंबंसी का रहेगा। पोलिंग बूथ का स्थानांतरण, निर्वाचन में लगे अधिकारियों को जानकारियों का अभाव, चुनाव प्रक्रिया को कठिन बनाना, बैंक की लापरवाही, स्कूलों का बंद हो जाना और सुरक्षा बलों को वहां ठहराना, राजनीतिक पार्टियों में उभरते भीड़ व झंडा-बैनर की संख्या के आधार पर किसी भी पार्टियों की जीत बताना बेमानी होगी। एक्जीट पोल कुछ भी हो लेकिन साफ है घमासान ऐसा कि मतदाताओं का मूढ़ समझना किसी की बस की बात नहीं?

उत्तम कुमार ,संपादक दक्षिण कोसल

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