दस्तावेज़ ःः आंदोलनों पर बढ़ते राजकीय दमन के खिलाफ, राष्ट्रीय एकजुटता सम्मलेन, रायपुर ,छतीसगढ ⚫ रिपोर्ट ,प्रस्ताव एवं घोषणा पत्र

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31 अक्टूबर, 2018 , रायपुर ,छतीसगढ

 

11.11.2018 रायपुर

भारत में लोकतंत्र, संविधान और मानवाधिकार पर बढते हमले ने देश को एक गंभीर स्थिति में खडा कर दिया हैं. भीमा कोरेगांव के सम्मेलन पर हिन्दू संगठनों के हमले के बाद सरकार ने पूरे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों, बुध्दिजीवियों, वंचितों की पैरवी करने वाले वकीलों, व्यक्तियों और मज़दूर आंदोलन से मज़दूर को गिरफ्तार कर लिया. ऐसे समय छतीसगढ में राजकीय दमन के खिलाफ एक दिवसीय कनवेंशन आयोजित की गई.

छतीसगढ में स्थितियां और भी विकट हैं .

यहां भी लागातार राजकीय दमन का शिकार बहुत ही ज़्यादा हुआ है, दक्षिण बस्तर में निरपराध आदिवासियों की नक्सल के नाम से हत्यायें. महिलाओं का उत्पीडऩ, आगजनी, अपहरण, अंधिधुंध गिरफ्तारियों ने पूरे आदिवासी समुदाय के अस्तित्व पर निर्णायक खतरा खडा कर दिया है .

छत्तीसगढ़ मे सभी प्रकार के जन-आंदोलनो को बुरी तरह गैर-जनतांत्रिक और गैर-कानूनी रूप से ब्रूटली दबाया जा रहा है. किसान आंदोलन, आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार, जल-जंगल-जमीन और “पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996” (पेसा), वनाधिकार कानून का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा रह गया हैं .बडे छोटे उद्योगों के लिये किसानों आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रहीं हैं. मज़दूर आंदोलन और उनके असुरक्षित जीवन की घटनाओं से अखबार भरे पडे हैं. पत्थलगढी से लेकर चहूँ ओर मसीही समाज पर हमले किये जा रहे है. न चर्च सुरक्षित है और न धर्म और विश्वास की आज़ादी का अधिकार.

दलितों, वंचितों और महिलाओं के साथ सामाजिक बहिष्कार से लेकर सामाजिक उत्पडी़न चरम पर है.

इन सबके लिये आवाज़ उठाने और कानूनी सहायता करने वालों के खिलाफ उत्पीड़ित बेतहाशा बढ रहा हैं.विनायक सैन, सोनी सोरी, अजय टीजी, कमल शक्ला, लिंग राम कोडपी, प्रभात सिंह, संतोष मरकाम से लेकर जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के साथियों को तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया. यह तो कुछ उदाहरण हैं.

इस एकजुटता सम्मेलन में अनेक मुद्दों पर सहभागी संगठनों ने अपने अनुभव साझा किये जिनमें प्रमुख रूप से निम्न की भागीदारी रही:

वरिष्ठ अधिवक्ता अमरनाथ पांडे, कविता श्रीवास्तव पीयूसीएल नेशनल सचिव, असीम राय, गुजरात कोलकाता , गडचिरोली से कल्पना अलाम, सुखराम मांडवी और सैनू गोट्टा कमल शुक्ला, पत्रकार सुरक्षा कानून समिति छतीसगढ, आनंद मिश्रा समाजवादी चिंतक . अरविन्द नेताम छतीसगढ के वरिष्ठ आदिवासी नेता , रजनी सोरेन, माधुरी बहन, राजेंद्र सायल, नंदकुमार कश्यप, रिनचिन, लिंगराज भाई, उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल. अखिलेश एडगर, जैकॉब कुजूर, प्रतिमा गजबिये, पदमजा, कुलदीप एच एन एल यू. नुपूर एच एन एल यू ,अनुराधा तलवार बंगाल, कुरैशी एडवोकेट, लखन सुबोध, गुरू घासीदास सेवा समिति, जिला किसान संघ राजनांदगाव से सुदेश टीकाम, शालिनी गेरा, तुहिन देव .आदि आदि .

सम्मलेन में छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल, जनमुक्ति मोर्चा, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, मजदूर कार्यकर्ता समिति, छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, छत्तीसगढ़ महिला अधिकार मंच, डब्लू.एस.एस. छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ महिला मुक्ति मोर्चा, जिला किसान संघ राजनंदगांव, गुरु घासीदास सेवादार संघ छत्तीसगढ़, आंबेडकर युवा मंच बिलासपुर, छत्तीसगढ़ नागरिक संयुक्त संघर्ष समिति, सामाजिक न्याय मंच रायपुर, पत्रकार सुरक्षा कानून समिति, आल इंडिया लॉयर्स यूनियन, विस्थापन विरोधी आन्दोलन, रेला कलेक्टिव, क्रांतिकारी संस्कृति मंच, दलित आदिवासी संगठन, जाग्रत आदिवासी दलित संगठन, पी यू सी एल राजस्थान शामिल रहे .

 

 

देश-प्रदेश की परिस्थिति पर एक सोच-समझ.

देश में जैसे-जैसे सामाजिक आर्थिक संकट गहराता जा रहा है,इन संकटों से प्रभावित हिस्सों पर राजकीय दमन भी बढ़ते जा रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य जो नैसर्गिक और खनिज संसाधनों में देश के संपन्नतम राज्यों में है वहीं गरीबी अशिक्षा स्वास्थ्य कुपोषण में भी अग्रणी है ,यह भयावह विषमता अपने आप में विशाल मेहनत दलित आदिवासी समुदाय के खिलाफ दमनकारी नीतियों को प्रमाणित करता है। 46% वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ में वनांचलों में रहने वाले कारपोरेट हित साधन के कारण सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं । कारपोरेट मुनाफा सुनिश्चित करने कानूनी प्रावधानों का शासन द्वारा खुले आम उल्लंघन किया जा रहा है। आदिवासियों की खेती और बस्तियां उजाड़ी जा रहीं हैं।इसका विरोध करने पर उन्हें नक्सल कह फर्जी एनकाउंटर में मारने महिलाओं का बलात्कार स्कूली बच्चों की हत्या जैसे कृत्यों को अंजाम दिया जाता है.

पिछले वर्ष से किसानों के विद्रोह ने नया स्वरुप धारण किया है, जो दो ऐतिहासिक किसान यात्रा में प्रदर्शित हुआ है. पहली जो महाराष्ट्र में लगभग 40,000 किसानों ने 6.12.2018 तक लगभग 180 किलोमीटर की “पद-यात्रा” नासिक से मुंबई तक की, और उसमें आम जनता की भागीदारी देखने को मिली, जिसके फलस्वरूप सरकार को उनकी प्राय: प्राय: सभी मांगे माननी पड़ीं. दूसरा, तमिल नाडू के किसानों ने भारत की राजधानी दिल्ली में मार्च 14 को पूरे 41 दिनों के लिए एक अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन किया जो सन 2016 के भीषण अकाल के चलते किसानों की दुर्दशा और हाइड्रो-कार्बन परियोजना के क्रियान्वन के विरोध में था. इस विद्रोह ने स्पष्ट कर दिया कि अब देश के किसान कॉर्पोरेट-परस्त सरकारों से मिलनी वाली राहत और टुकड़ों से संतुष्ट होने वाले नहीं, लेकिन एक जन-पक्षीय किसान-नीति के लिए संघर्ष और निर्माण करते रहेंगे, जो उन्हें न्याय और गरिमा प्रदान करे, और “देश के अन्नदाता” के रूप में उनके महत्वपूर्ण योगदान को सामाजिक और राजनैतिक तौर पर मान्यता दे.

छत्तीसगढ़ में भी किसानों के संसाधनों जैसे जल,जंगल ज़मीन, आदि को जोर-ज़बर और दमनात्मक तरीके से सरकार हथिया कर उद्योगों और मुनाफाखोर और पर्यावरण नष्ट करने वाली बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को सौंप रही है, इसके विनाशकारी स्वरुप उभर कर सामने आ रहे हैं. वहीं किसान छत्तीसगढ़ को “धान के कटोरा” के रूप में सामाजिक-न्याय पर आधारित विकास के लिए सभी नागरिकों को भोजन के अधिकार, और अन्य बुनियादी ज़रूरतें मुहैय्या करने वाले राज्य के लिए संघर्ष और निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं.

प्रदेश में असंगठित मजदूरों की बड़ी फौज है जिन्हें जीने लायक सम्मानजनक न्यूनतम वेतन से वंचित रखा गया है, सरकारी क्षेत्र में ठेका और संविदा प्रथा लागू है जहां न ही सेवा शर्तें हैं न भविष्य की सुरक्षा,पुलिस के सिपाहियों के काम का निश्चित समय नहीं है । इन विसंगतियों के खिलाफ संगठनों द्वारा आवाज़ उठाने पर संगठन के नेतृत्वकारी साथियों सहित सामान्य सदस्यों को जेल में डाल उन पर अमानुषिक अत्याचार कर समझौते के लिए दबाव डाला जाता है.

पत्थल गढ़ी नामक आदिवासी आंदोलन के जरिये जशपुर के करीब दो दर्जन गांव के लोगों ने ऐलान किया था कि राज्य की बीजेपी सरकार उनके हितों का कुछ भी ध्यान नहीं रख रही है. इसलिए वे ग्रामसभा को ही सबसे बड़ी सरकार मानते हैं. ग्रामीणों ने एक पत्थर पर लिखकर अपने अधिकारों की मांग की थी. राज्य की बीजेपी सरकार ने पत्थरगढ़ी को संविधान के खिलाफ बताते हुए उसे तोड़ दिया था. इन गांवों में संविधान की पांचवीं अनुसूची को पूरी तरह से लागू किये जाने की मांग ने जोर पकड़ा हुआ है.

 

दस हजार से ज्यादा आदिवासी ग्रामीण अनुसूचित क्षेत्रों को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. उनका आरोप है कि आदिवासियों को लेकर संवैधानिक धाराओं का पालन कराने में राज्य सरकार नाकाम साबित हुई है. लिहाजा वे अपनी ग्राम पंचायतों को ही सबसे ताकतवर और बड़ी संवैधानिक संस्था मानते हैं.

प्रदेश में सामाजिक बहिष्कार के 28 हजार मामले अब तक सामने आ चुके हैं। इसे गैरकानूनी करने का सुझाव तीन साल पहले राज्य सरकार को दिया गया था और अधिनियम पिछले एक साल से बनकर तैयार है। अब तक सरकार की स्वीकृति नहीं मिलने के चलते पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।

इस सम्मलेन में सामाजिक वहिष्कार के मामलों पर रपट पेश की गयी, और यह खुलकर सामने आया कि यह निर्णय जाति पंचायत या स्वयंभुओं द्वारा लोगों पर अत्याचारों की बढ़ती घटनाओं के कारण लिया गया। पिछले कुछ समय में छत्तीसगढ़ के रायगढ जिले से इस तरह की घटनाओं की सबसे ज़्यादा सूचनाएं मिली थीं और सामाजिक बहिष्कार के ज़्यादातर मामलों में वजह अंतरजातीय विवाह था.

छत्तीसगढ़ में जातिगत हिंसा के भी कई घटनाएं को रिपोर्ट किया गय. छत्तीसगढ़ के दलित समुदाय पर आज भी सामाजिक और आर्थिक शोषण व् दमन की कोई सीमा नहीं. हर आंदोलन को इस सवाल पर गौर करने की ज़रुरत है. जाती का सबसे खतरनाक चेहरा महिलाओं के शरीर और जीवन पर दिखाई देती है. प्रदेश के हर आंदोलन और प्रगतिशील संगठन को जाती और पितृसत्ता के उन्मूलन के लिए लड़ने की एक प्रतिबध्दता जतनी होगी.

छत्तीसगढ़ में बस्तर आज भारत में सबसे अधिक सैन्यीकृत संभाग है, प्रति नागरिक पीछे पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों की संख्या के दृष्टिकोण से. बस्तर के ग्रामीण इलाके के कुछ किलोमीटर की दूरियों पर इन बलों के शिविर हैं, जिसमें सशत्र सैनिक दल-बल के साथ आस-पास के इलाकों में समय-समय पर गश्ती करते हैं, जिससे व् आम नागरिकों पर डराने-धमकाने की नियत से शक्ति प्रदर्शन करते हैं. इनमें से अधिकाँश गाँव कें न तो स्कूल, न आंगनवाडी, न सार्वजनिक स्वस्थ्र केंद्र और न ही राशन दुकानें हैं. इन गश्ती दौरों के दौरान इन बलों द्वारा लूट-खसोट, मार-पीट, बलात्कार और हत्याएं की जाती हैं.

इन तमाम विसंतियों उत्पीड़न के खिलाफ अपना जीवन समर्पित कर प्रभावितों के लिए काम करने वाली सुधा भारद्वाज सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं पर फर्जी अपराध कायम कर उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। इनमें वंचितों प्रताड़ितों के लिए मुकदमा लड़ने वाले वकील और उनके लिए लिखने वाले बुद्धिजीवी , पत्रकार भी हैं। पुलिस और सरकारी वकील बनावटी पत्र को मीडिया में प्रचारित कर इन लोगों पर प्रधानमंत्री की हत्या के साजिश का आरोप मढ़ते है हालांकि खुद के झूठ में विश्वास न होने से अदालत में सबूत नहीं रख सके .

कारपोरेट के पक्ष में सरकार लगातार जनता से झूठ बोल रही है। इतिहास, राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों और विज्ञान के खिलाफ लगातार भ्रम फैला युवा पीढ़ी का ब्रेन वाश कर उन्हें गुलाम बनाने के प्रयास हो रहे हैं जो कि पूरी की पूरी पीढ़ी के खिलाफ दमन का घिनौना स्वरूप है।इसी तरह से व्यक्तिगत आजादी और नागरिक सुरक्षा के संवैधानिक मूल अधिकारों पर खाप पंचायतों, जातीय दबंगों, मठाधीशों द्वारा खुले आम उल्लंघन कर जातीय और सामाजिक बहिष्कार के कृत्यों को अंजाम दिया जाता है जिसके कारण हत्याएं, आत्महत्याएं और आर्थिक प्रताड़ना की घटनाएं बढ़ीं हैं। ऐसे कुप्रथाओं के खिलाफ कानून न बनाना दोषियों को खुले घूमने देना भी एक प्रकार से एक नागरिक के प्रति सरकारी दमन ही है.

 

 

⚫ प्रस्ताव एवं भावी एजेंडा

सम्मेलन में निम्लिखित प्रस्तावों पर चर्चा के बाद उनपर सहमति दी गयी:

1. भीमा-कोरेगांव प्रकरण में कथित हिंसा से सम्बंधित सभी जनतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों, परिवारों की त्वरित और निशर्त रिहाई की हम मांग करते हैं;

2. कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों, दलितों, मुसलामानों, आदिवासियों के खिलाफ ‘विधिविरुद्ध क्रिया – कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967’ (UAPA) के तहत लगाए गए सभी झूठे आरोपों को वापस लिया जाए.

3. भीमा-कोरेगांव हिंसा के असली दोषियों, मनोहर भीडे और मिलिंद एकबोटे जैसे हिंदूवादी नेताओं को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कानून के तहत विधिवत मुकदमा चलाया जाए, जिन्होंने भीमा-कोरेगांव में आगंतुकों पर सुनियोजित ढंग से हिंस भड़काने की साजिश रची.

4. दमनात्मक कानून — ‘विधिविरुद्ध क्रिया – कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967’ (UAPA) को निरस्त किया जाए, और राष्ट्रद्रोह कानून को रद्द किया जाए

5. नगरीय-समाज में, जनतांत्रिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं के असहमति के स्वरों की अव्भिव्यक्ति को राज्य द्वारा हमले, अपराधीकरण और प्रतिहिंसा पैदा कर और संवैधानिक आज़ादियों को कुचलने पर तत्काल रोक लगे.

6. यह सम्मेलन देश भर में विचाराधीन कैदियों की दशा-दुर्दशा पर चिंता व्यक्त करता है, जिन्हें देरी के कारण और ज़मानत के कानूनी प्रावधानों पर अमल न करने के कारण, सालों-साल जेलों में कैद रहना पड़ता हैं; इससे भी अधिक चिंता का विषय है कि इनमें से अधिकाँश विचाराधीन कैदी गरीब-शोषित वर्ग के, दलित, आदिवासी, माहिलायें हैं. छत्तीसगढ़ में नक्सल-विरोधी सरकार-सैन्य नीति और गैर-संवैधानिक “छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून” के फलस्वरूप हजारों निर्दोष आदिवासी, किसान, युवा व् महिला, फ़र्ज़ी मुकदमों में जेलों में सड रहे हैं. यह सम्मेल्लन मांग करता है कि सरकारों द्वारा, खासकर उनके द्वारा गठित कानूनी सहायता समितियों द्वारा, उनको ज़मानत पर कानूनन रिहाई के लिए पहल की जाए, और लंबित मामलों में त्वरित कार्यवाही की जाए. पी.यू.सी.एल. और जगदलपुर लीगल ऐड ग्रुप से भी मांग की जाती है कि इस बावत एक विशेष टास्क फ़ोर्स गठित कर इस मानव अधिकार मसले को उच्च न्यायालय व् सर्वोच्च नयायालय में चुनौती दी जाये.

7. यह सम्मलेन राजनतिक बंदियों पर यातना और अत्याचार पर मांग करता है कि भारत सरकार सभी संयुक्त राष्ट्र दस्तावेजों के आधार पर उन्हें मान्यता देते हुए उनका सम्मान करे, जैसे कि “नागरिक और राजनितिक अधिकारों पर अन्तराष्ट्रीय अनुबंध” (ICCPR), और “यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार या सज़ा के खिलाफ सम्मेलन” (the Convention Against Torture and Other Cruel, Inhuman or Degrading Treatment or Punishment) के प्रावधानों के तहत. छत्तीसगढ़ में इसमें अधिकाँश राजनितिक बंदी गैर-संवैधानिक और दमनात्मक कानूनों के तहत बिना किसी न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में हैं, जैसे कि छत्तीसगढ़ विशेष जन-सुरक्षा कानून, ‘विधिविरुद्ध क्रिया – कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967’ (UAPA) को निरस्त किया जाए, और राष्ट्रद्रोह (Sedition) कानून.

8. यह सम्मलेन इन सभी राजनितिक बंदियों की निशर्त रिहाई की मांग करता है, और इस बाबत एक समिति के गठन की मांग करता है, जिसमें उच्च न्यायालय के एक अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ती अध्यक्ष हों, और जिसमें मानव अधिकार संगठनों की प्रतिनिधियों को भी सम्मलित किया जाये.

9. छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर लगातार होने वाले कातिलाना हमलों और उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता से वंचित रखने के तौर-तरीकों की यह सम्मेलन घोर निंदा करता है, जिसमें सरकार और मीडिया घरानों की मिली-भगत खुलकर सामने आ चुकी है;

10. यह सम्मेलन मांग करता है कि सरकारों द्वारा पत्रकार सुरक्षा कानून को पारित किया जाए, जिसका मसौदा पी.यू.सी. एल. ने व्यापक स्तर पर सलाह-मशविरा से तैयार किया है;

11. यह सम्मेलन वकीलों को अलग-थलग करने और उन्हें बदनाम करने की नीयत से उनके खिलाफ पुलिसिया कार्यवाही और झूठे प्रचार की कड़ी निंदा करता है, और बार कौंसिल और अन्य अधिवक्ता संघों से अपील करता है कि ऐसे मामलों में अधिवक्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने विशेष रूप से सरकार से पहल करें;

12. यह सम्मेलन सभी संघर्षशील-मेहनतकश कर्मचारियों (आंगनवाडी, प्रेरक संघ, सफाई कर्मचारी, बल-श्रमिक शिक्षक, नर्सेज, सहायक स्वास्थ्य कर्मी,पुलिस कर्मियों और उनके परिजनों, सहायक शिक्षा कर्मी) से एकजुटता दर्शाते हुए उनकी मांगों का समर्थन करते हैं;

13. यह सम्मेल्लन केंद्र और राज्य सरकारों की कॉर्पोरेट जगत-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में किसान-विरोधी नीतियों का पुरजोर विरोध करता है जिसके फलस्वरूप खेती-किसानी नष्ट हो रही है, और उसपर निर्भर करोड़ों किसानों-मज़दूरों को जीने और जीविकौपर्जन के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. पूरे देश में किसानों के विद्रोह ने नया स्वरुप धारण किया है, है.

यह सम्मेल्लन किसानों के संघर्ष को समर्थन देता है, और तमाम जनवादी संगठनों और जनतांत्रिक शकित्यों से अपील करता है कि नए भारत के लिए नए छत्तीसगढ़ के सपने को साकार करने किसान-मजदूरों, आदिवासियों-दलितों के संघर्षों में शामिल हों.

14. यह सम्मलेन छत्तीसगढ़ में पत्थलगढ़ी आन्दोलन के विरोध में प्रदेश में भाजपा सरकार के संरक्षण में सांप्रदायिक संगठनों द्वारा हिंसक हमले की घोर निंदा करता है, जिसके चलते आदिवासियों की सांस्कृतिक परंपरा को नष्ट कर एक विशेष धर्म की मान्यताओं को थोपना और उसकी आड़ में राजनितिक फ़ायदा उठाना ही मूल उदेश्य है. इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार के निर्देश पर पुलिस ने दो अधिकारियों के खिलाफ शांति भंग, साम्प्रदायिक भावना भड़काने और सरकारी कार्य में हस्तक्षेप करने की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज गिरफ्तार किया. यह सम्मलेन इस आन्दोलन के फलस्वरूप सभी गिरफ्तार लोगों की निशर्त रिहाई की मांग करता है, और इस पूरे मामले को सांप्रदायिक स्वरुप देने के और हिंसात्मक हमलों के दोषी संगठनों और राजनेताओं पर उचित कानूनी कार्यवाई की मांग करता है.

15. यह सम्मलेन छत्तीसगढ़ में, ख़ास कर बस्तर में सैन्यकरण का पुरजोर विरोध करता है, और पुलिस और अर्ध-सैनिक बालों द्वारा आम नागरिकों पर अपराधों की घोर निंदा करता है. यह सम्मलेन उस दंडमुक्ति के प्रावधान का भी पुरजोर विरोध करता है, जिसके संरक्षण में वर्दीधारी अपने ही देश के नागरिकों पर ज़ुल्म-सितम ढाते हैं और अपराध करते हैं, और बच निकलते हैं. यह सम्मलेन मांग करता है कि सभी जनतांत्रिक और शांतिपूर्ण संगठन, राजनितिक दल, और जागरूक व्यक्ति इस हिंसक परिस्थिति का एक गैर-सैन्यीकृत और सामाजिक-राजनितिक हल खोजने में प्रयासरत रहें, जैसे कि शांति वार्ता और पुलिस व् अर्ध-सैनिक बलों का कम-से-कम उपयोग कर प्रशासनिक व् न्यायायिक अधिकारीयों का इस्तमाल कर.

16. यह सम्मलेन सभी राजनितिक दलों से मांग करता है कि एक जुट होकर ‘सामाजिक बहिष्कार प्रतिषेध अधिनियम 2016’ का प्रारुपण कर ‘टोनही प्रताड़ना अधिनियम 2005’ की तर्ज़ पर कानून बनाने का विधेयक अगली विधानसभा गठित होने के बाद विधान सभा में लाया जाए. और जब तककि कानून न तैयार हो, और जहां भी सामाजिक बहिष्कार के आरोप को साबित करने के ठोस सबूत हैं, तो नया अधिनियम भारतीय दंड संहिता की धारा 34, 120-ए, 120-बी, 14 9, 153-ए, 383 से 389 और 511 के तहत दोषी पर मुकदमा दायर कर उसको को सज़ा दी जाएगी।

17. यह सम्मेलन सभी जनवादी, लोकतान्त्रिक, शांतिप्रिय संगठनों और नागरिकों से अपील करता है कि वे आगामी विधान सभा चुनाव में फासीवादी, अधिनायकवादी, अलोकतांत्रिक, कॉर्पोरेट जगत के उम्मीदारों को परास्त करने चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं, और संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों को बरकरार रखने के लिए सघन अभियान छेड़ें. यह सम्मेलन द्वारा जन-संगठनों की ओर से इसी तर्ज़ पर “वोटरों के नाम एक अपील” जारी करने एक समिति का गठन कर इसे विस्तार से प्रचारित और प्रकाशित किया जाए.

18. इसी तर्ज़ पर “जन आंदोलनों पर बढ़ते राजकीय दमन के खिलाफ” राष्ट्रीय एकजुटता सम्मलेन देश में प्राय: सभी प्रान्तों में आयोजित किये जायें, और अधिवक्ता सुधा भारद्वाज और भीमा कोरेगांव से सम्बंधित प्रकरण में गिरफ्तार और प्रताड़ित सभी मानव अधिकार रक्षकों की रिहाई के लिए छत्तीसगढ़ में सभी नगरों में हर पखवाड़े सत्याग्रह आयोजित कर गिरफ्तारियां दी जायें, जिसमें देश भर से जनवादी और लोकतान्त्रिक संगठन और व्यक्ति भाग लें..

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इप्टा इंदौर द्वारा तैयार पोस्टर  जिनका उपयोग सम्मेलन में किया गया .

 

 

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