दिल्‍ली में उठी छत्‍तीसगढ़ की बीस ग्राम सभाओं की आवाज़

दिल्‍ली में उठी छत्‍तीसगढ़ की बीस ग्राम सभाओं की आवाज़ 
 जनवरी 2015 को दिल्ली में छत्तीसगढ़ की 20 ग्राम सभाओं ने किये प्रस्ताव, सरकार से आग्रह किया कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें और कोयला खदान की नीलामी अथवा आवंटन न करें। छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन  की विज्ञप्ति हम जनपथ से साभार प्रकाशित कर रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा, कोरबा तथा रायगढ़ में स्थित घने जंगल एवं जैव-विविधता से परिपूर्ण हसदेव अरण्य तथा धरमजयगढ़ क्षेत्रों की 20 ग्राम सभाओं ने सर्व सम्मत्ति से प्रस्ताव पारित कर कहा है कि: 

  • वह अपने क्षेत्र में किसी भी खनन कार्य का विरोध करते हैं और उत्खनन की अनुमति नहीं देंगे. अतः सरकार से निवेदन करते हैं कि उनके क्षेत्र में कोई भी खदान न तो आवंटित हो और ना ही उसकी नीलामी की जाय.
  • यह क्षेत्र जैव विविधता से परिपूर्ण है जिसका यहाँ के आदिवासी तथा वनवासी समुदाय सदियों से संरक्षण करते आ रहे है. यहाँ के आदिवासियों का जंगल के साथ सह-जीवी जैसा रिश्ता है और वे लोग अपनी आजीविका, पहचान तथा संस्कृति के लिए जंगल पर ही आश्रित हैं. इसलिए उन्होंने संकल्प लिया है की वे अपने जंगलों को कोई नुक्सान नहीं होने देंग.
  • उनके आस-पास के क्षेत्रों में खनन के अनुभव विनाशकारी सिद्ध हुए हैं जहां कई लोगों को विस्थापित होना पड़ा, आजीविका पर भारी संकट आया, जंगल नष्ट हो गए तथा वहां की जल, वायु और ज़मीन प्रदूषित हो गई.
  • उनके क्षेत्र में वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया काफी कमज़ोर है और वनाधिकारों का निरंतर उल्लंघन  हो रहा है. वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूर्ण किये बिना किसी भी खनन परियोजना से आदिवासियों तथा वनवासियों के अधिकारों का हनन होगा.

ग्राम घाटबर्रा, ज़िला सरगुजा के जयनंदन सिंह पोर्ते ने कहा “हम निरंतर अपने जंगलों एवं घरों को बचाने के प्रयास करते आ रहे हैं परंतु सरकार तथा कॉर्पोरेट हमसे हमारे जंगल तथा घर छीन कर हमें बर्बाद करने पर आमादा हैं I बिना पूर्व स्वीकृति लिए खदानों का आवंटन अथवा नीलामी की यह नई प्रक्रिया, हम पर अपनी ज़मीन देने के लिए दबाव डालने की एक और कोशिश है, जिसका हम विरोध करते हैं.”

रायगढ़ जिले में स्थित सरसमल गाँव के कन्हाई पटेल ने बताया “उनके क्षेत्र में खदानों में सभी प्रक्रियाओं और नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है. स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर अन्नियामित्तायें थीI खदानें घर के 10 मीटर से कम की दूरी तक आ चुकी हैं I घरों को क्षति पहुंची है और वायु तथा जल-स्त्रोत गंभीर रूप से प्रदूषित हुए हैं. हमें इन गंभीर संकटों के साथ अपना जीवन – यापन करने पर मजबूर हैं.”
मंत्रियों, सरकारी अधिकारीयों तथा सांसदों से संवाद

पिछले एक हफ्ते में छत्तीसगढ़ के ग्रामवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल, विशेष रूप से हसदेव अरण्य तथा धरमजयगढ़ क्षेत्रों से, दिल्ली आया है और उन्होंने माननीय प्रधान मंत्री, पर्यावरण एवं वन मंत्री, कोयला मंत्री तथ आदिवासी कार्य मंत्री से मिलने की अनुमति मांगी . यह प्रतिनिधिमंडल हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति तथा छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन की ओर से है.

यह प्रतिनिधिमंडल श्री प्रकाश जावड़ेकर, माननीय पर्यावरण एवं वन मंत्री तथा श्री जुएल उरांव, माननीय आदिवासी कार्य मंत्री से मिला और अपनी समस्याओं को उनके समक्ष रखा . उन्होंने माननीय मंत्रियों का ध्याम 20 ग्राम सभाओं द्वारा पारित अपने गाँव तथा आजीविका की संरक्षण के लिए कोयला खनन के विरुद्ध प्रस्तावों पर भी आकर्षित किया . यह प्रतिनिधि मंडल अन्य राजनैतिक दलों के वरिष्ट नेताओं से भी मिला.
प्रतिनिधिमंडल ने निम्न बिन्दुओं को सुनिश्चित करने के लिए सरकार से विशेष आग्रह किया –

  • उनकी ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों का सम्मान हो तथा उनके क्षेत्र में कोयला खदानों की नीलामी तथा आवंटन न किया जाये.
  • मौजूदा परिचालित खदानों में विभिन्न अनियमित्ताओ (जिसमें स्वीकृति सम्बन्धी अनियमित्ता शामिल हैं) को ध्यान में लिया जाए तथा उल्लंघन करने वाले दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की जाए . जब तक इन अनियमित्ताओ को दूर न किया जाये कोयला खदान का नया आवंटन / नीलामी न की जाये .
  • जैव-विविधता से परिपूर्ण घने जंगल के इलाके, जोकि देश के कोयला क्षेत्र के 10 प्रतिशत से भी कम हैं, का विनाश न किया जाये.
  • किसी भी खदान के आवंटन से पूर्व ही पर्यावरणीय स्वीकृति, वन डायवर्सन स्वीकृति तथा ग्राम सभा स्वीकृति ली जाये, अन्यथा यह महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं निरर्थक सिद्ध होंगी.

हरिहरपुर गाँव, सरगुजा के मंगल साय ने कहा “अगर ग्राम सभाओं के इस निर्णय की अनदेखी कर सरकार ने इन कोयला ब्लाकों  का आवंटन या नीलामी किया तो हम इसका दृढ़ता से विरोध करेंगे और अपने अधिकारों एवं हितों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करते रहेंगे .”

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन के संयोजक आलोक शुकला के अनुसार “हम सरकार की लोकतांत्रिक परामर्शी प्रक्रियाओं की अवहेलना कर महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन करने की इस प्रक्रिया का पूरी तरह से विरोध करते हैं जिनमें कोयला अध्यादेश, भू-अधिग्रहण अध्यादेश, माइनिंग अध्यादेश, इत्यादि शामिल हैं . इन सभी अध्यादेशों द्वारा सरकार ने कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए राष्ट्रिय एवं जन-हितों तथा पर्यावरणीय चिंताओं को ताक पर रख दिया है.
इन क्षेत्र के बारे में मुख्य जानकारी

  • छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य तथा धरमजयगढ़ के ~२००० वर्ग. की.मी. में फैला जंगल क्षेत्र घने जंगल तथा जैव-विविधता से परिपूर्ण है जिसे 2010 में माइनिंग के लिए “नो-गो” घोषित किया गया था. पर्यावरण मंत्रालय तथा कोयला मंत्रालय की संयुक्त अध्ययन के अनुसार ऐसे नो-गो क्षेत्र देश के सम्पूर्ण कोयला क्षेत्र के 8.11 प्रतिशत से भी कम हैं.
  • ये संविधान की पांचवी अनुसूची के क्षेत्र हैं जहां पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार कानून 2006 के प्रावधान लागू हैं I अतः यहाँ खनन से पूर्व ग्राम सभा की स्वीकृति अनिवार्य है.
  • संविधान के अनुसार पांचवी अनुसूची क्षेत्र में ग्राम सभाओं का विशेष महत्त्व है कि वे ना केवल महत्वपूर्ण नीति नियोजन तथा निर्णयों में भागिदार रहे बल्कि उनपर आदिवासी आजीविका, संस्कृति तथा परंपरा को संरक्षित करने का भी दायित्व है.
  • इस क्षेत्र को कोयला अध्यादेश 2014 के अंतर्गत घोषित बहुत सारे कोयला ब्लाकों के आवंटन / नीलामी से खतरा है जिसके गंभीर पर्यावरणीय तथा सामाजिक दुष्प्रभाव होंगे.

संपर्क: आलोक शुकला(09977634040) / प्रियांशु गुप्ता(09999611046), छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, सी 52 –सेक्टर -1, शंकर नगर रायपुर, छत्तीसगढ़ cbaraipur@gmail.com  


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