मूर्ति_के_नाम_पर_जनता_को_लूटा_सरदार_को_ठगा ःः बादल सरोज

8.11.2018
● ठगी के ब्रान्ड अम्बेसेडरों के पास जब हुक्मरानी आजाती है तो वे किसी को भी नही छोड़ते। वे जनता के वर्तमान को ही नही ठगते, देश के अतीत को भी नही बख्शते । इनकी सबसे ताजी ठगी सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशाल मूर्ति है ।
इसके कुछ पहलू ही काफी हैं इस ठगी को उजागर करने के लिए ;
#किसके_पैसे_से_खड़े_हुए_हैं : 3000 करोड़ के सरदार ?
● इंडियन ऑयल कारपोरेशन = 900 करोड़ रुपये
● आयल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन (ओएनजीसी) = 500 करोड़ रुपये
● भारत पेट्रोलियम = 250 करोड़ रुपये
● आयल इंडिया कारपोरेशन = 250 करोड़ रुपये
● गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड = 250 करोड़ रुपये
● पावर ग्रिड कारपोरेशन = 125 करोड़ रुपये
● गुजरात मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन = 100 करोड़ रुपये
● इंजीनियर्स इंडिया = 50 करोड़ रुपये
● पेट्रोनेट इंडिया = 50 करोड़ रुपये
● बॉमर इंडिया = 50 करोड़ रुपये
■ ध्यान दें, ये सभी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां है । अम्बानी या अडानी या माल्या, छोटे-संझले-मंझले मोदी या भाजपा के चहेते किसी भी पूंजीपति की कम्पनी ने इसमें चवन्नी भी नही जोड़ी है !!
■ याद रहे कि इनमें भी अधिकांश तेल कंपनियां है । वही तेल कम्पनिया जो तकरीबन हर रोज डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ाकर औसत हिंदुस्तानी की कमर तोड़ रही हैं ।
#कैसे_आया_यह_पैसा
इन कम्पनियों ने भी यह रकम अपने मुनाफे में से काटकर जमा नही की है । कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) के कोष में से दिया है ।
● कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) का कोष वह राशि होती है जो कंपनियां उस प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से उत्पन्न नुकसान के खामियाजे के रूप में जमा करती हैं, जिसे कायदे से प्रभावित नागरिकों को मिलना चाहिए था । चूंकि – बकौल उनके – व्यक्तिगत रूप से ऐसे व्यक्तियों का चिन्हांकन मुश्किल होता है इसलिए यह प्रावधान किया गया कि हर कम्पनी अपने मुनाफे का कमसेकम 2 प्रतिशत कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) के नाम पर निकालेगा । इसे पेयजल, स्कूल, अस्पताल, सड़कों इत्यादि के ढांचागत निर्माण और सामुदायिक विकास पर खर्च किया जाएगा ।
● निजी कॉर्पोरेट कंपनियां इसमे भी चोट्टियाई से बाज नही आती । सिर्फ पब्लिक सेक्टर कम्पनियां हैं जो इसका प्रावधान रखती हैं ।
● भारत में कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) के नियम अप्रैल 1, 2014 से लागू हैं. इसके अनुसार जिन कम्पनियाँ की सालाना नेटवर्थ 500 करोड़ रुपये या सालाना आय 1000 करोड़ की या सालाना लाभ 5 करोड़ का हो तो उनको CSR पर खर्च करना जरूरी होता है. यह खर्च तीन साल के औसत लाभ का कम से कम 2% होना चाहिए. CSR नियमों के अनुसार, CSR के प्रावधान केवल भारतीय कंपनियों पर ही लागू नहीं होते हैं, बल्कि यह भारत में विदेशी कंपनी की शाखा और विदेशी कंपनी के परियोजना कार्यालय के लिए भी लागू होते हैं.
● कम्पनी मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में CSR गतिविधियों पर 9822 करोड़ रुपये खर्च किये गए थे जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 11.5% ज्यादा है. वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट में 5097 कम्पनियाँ शामिल है जिनमे से सिर्फ 2690 ने CSR गतिविधियों पर खर्च किया था. शीर्ष 10 ने इस मद में 3207 करोड़ रुपये खर्च किये जो कि कुल खर्च का 33% है.
#किसका_लहू_लगा
● इस तरह यह सीधे सीधे वह निवाला है जो सरदार पटेल के भारत के किसी असमर्थ नागरिक के मुंह मे जाना था, उसे जिंदा रखने के काम आना था । मगर वह किसी चीनी कम्पनी के मुनाफे और एक महाभ्रष्ट आत्ममुग्ध गुजराती की छपास लिप्सा की बलि चढ़ गया । इतने पर भी संतोष नही हुआ । इस मूरत के रखरखाव पर हर साल करीब 150 करोड़ रुपयों का खर्च अनुमानित हैं – इसे भी यही कम्पनियां इसी सीएसआर में से खर्च किया जाएगा ।
● उनकी राजनीतिक दिशा और आग्रहों को अलग रख कर देखें तो सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय राजनीति की उस पीढ़ी के नेता थे जो सार्वजनिकता और निजता में फर्क करते थे । सरकारी पैसे को बाबा जी की कमाई मानकर खुद पर खर्च नही करते थे । कहते हैं कि वे जो कपड़े पहनते थे उसका सूत भी खुद ही चरखे से कातते थे । उनके वस्त्रों की उतरन से उनकी बेटी और कई बार सांसद रही मणिबेन अपने कपड़े सिलती थीं । ऐसे सरदार के साथ उनके ठीक उलट आचार-विचार वाले आज के पाखण्डी नेतृत्व ने उनकी विराट मूर्ति की स्थापना करके उनके साथ जो ठगी की गई है वह भी उनकी मूर्ति जैसी विराटाकार ही है ।
वे मुतमईन है कि उनके टीवी चैनल उनके अखबार इस तरह की “फालतू” बातों पर चर्चा ही नही होने देंगे । इसलिए अंधेरनगरी में चौपट राजा का राज चलता रहेगा । मगर इतिहास में ऐसी आत्ममुग्ध मूर्खताओं की उम्र अधिक नही रही है ।

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