ललित टिप्पणी ःः तुम कोई अच्छा-सा रख लो अपने दीवाने का नाम ःः असगर वज़ाहत 

7.11.2018

कहते हैं नाम में क्या रखा है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि नाम में बहुत कुछ रखा है। मिसाल के तौर पर फिल्मी लेखक और उर्दू के शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि नाम तो बहुत इंपॉर्टेंट होता है । मान लीजिए गब्बर सिंह का नाम शराफत अली होता तो क्या होता है? और मान लीजिए की धन्नो का नाम सावित्री होता तो क्या होता….इसलिए नाम बहुत इंपॉर्टेंट है… शायद यही वजह है कि आजकल नाम बदलने का चलन जोरों पर है। हमारे एक दोस्त ने अपने कुत्ते का नाम शेरू रख दिया और शेरू को शेर से लड़वा दिया। नतीजे में लड़ाई , जो जल्दी ही ख़त्म हो गई थी, के बाद शेरू की सिर्फ दुम ही मिल पाई थी। लेकिन इस घटना से नाम बदलने का महत्व कम नहीं होता । यही वजह है कि आजकल नाम बदलने पर जोर है।
अभी सुबह रास्ते में मोहम्मद हलीम मिले थे ।सलाम दुआ के बाद मैंने कहा हलीम साहब अपने लिए कोई अच्छा सा नाम सोच कर रख लीजिए ।
कहने लगे क्या मतलब है?
मैंने कहा सड़कों और शहरों के नाम बदलने के बाद जल्दी ही आदमियों के नाम बदलने का नंबर आएगा। आपसे कहा जाएगा कि आपका नाम भारत की गुलामी का प्रतीक है और इसे बदलना पड़ेगा। यदि नाम न बदला तो फिर प्रतीक को सहन नहीं किया जाएगा ।तब आप क्या करेंगे? नाम बदलना आपकी मजबूरी हो जाएगा। तब कोई दूसरा नाम आप क्या रखेंगे? मोहम्मद हलीम ने कहा, मैंने सोच लिया है ।मैं अपना दूसरा नाम पंडित राजकुमार शर्मा रखूंगा।
मैंने कहा यह नाम तो ब्राह्मण नाम है । आपको कौन रखने देगा।
फिर क्या करूं? उन्होंने ने कहा।
मैंने उनसे पूछा- आप की जाति क्या है ?
वे बोले, इस्लाम में जाति तो होती नहीं ।
मैंने कहा, मैं इस्लाम पर लिखी हुई किताबों की बात नहीं कर रहा, भारतीय मुसलमानों की बात कर रहा हूं। क्या उनके यहां जाति नहीं होती?
वे कुछ शरमाते हुए बोले, हां होती तो है ।
मैंने कहा,आपकी मुस्लिम जाति के टक्कर की जो हिंदू जाति हो, आप उस जाति का हिंदू नाम रखें।
उन्होंने कहा कि मैं शेख हूं। क्या मैं यादव नाम रख सकता हूं?
मैंने कहा ऐसा गजब न करना ।यादव तुम्हें पीट-पीटकर पराठा बना देंगे।
वे बोले गुप्ता रख सकता हूं, गुप्ता?
मैंने कहा गुप्ता रखने की तुम्हारी क्या हैसियत है। गुप्ता तो व्यापारी होते हैं। बड़ी-बड़ी दुकानें होती है उनकी। तुम उनमें कहां खप पाओगे?
वे बोले तो फिर क्या करूं ?
मैंने कहा सोच लो, वैसे ‘चोआइस’ बहुत कम है।
हलीम साहब ने मुझसे पूछा, तुमने क्या सोचा है।
मैंने कहा, मैंने तो बड़ा पक्का सोच लिया है। अपना नाम छेदीलाल ।अब यहां से और ‘कहां’ जाऊंगा?
उन्होंने कहा, यार आदमी बड़े समझदार हो। मुझे भी ऐसे ही कुछ करना पड़ेगा।
हलीम साहब चले गए ।और किस्सा नाम का निकल आया था इसलिए फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की यह ग़ज़ल याद आ गई
.….तुम कोई अच्छा सा रख लो अपने दीवाने का नाम…..
रंग पैराहन का, खुश्बू जुल्फ लहराने का नाम
मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम
दोस्तों उस चश्म-ओ-लब की कुछ कहो जिसके बगैर
गुलिस्तान की बात रंगीन न मैखाने का नाम
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमा जली
फिर तसव्वुर ने लिया उस बज्म में जाने का नाम
मोह्तसिब की खैर, ऊंचा है उसी के नाम से
रिंद का, साक़ी का, मय का, खुम का, पैमाने का नाम
हम को कहते हैं चमन वाले गरीबान-ए-चमन
तुम कोई अच्छा सा रख लो अपने दीवाने का नाम
फैज़ उनको है तक़ाज़ा-ए-वफ़ा हम से जिन्हें
आशना के नाम से प्यारा है बेगाने का नाम

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