वर्जुअल और रियल दुनिया की सच्चाई के बीच लक्ष्मण मस्तूरिया सुपुर्देखाक ःः सुभाष मिश्रा

4.11.2018

मोर संग चलव गा मोर संग चलव जी “का जयगान करने वाले छत्तीसगढ के माटी पुत्र कवि , गायक मित्र लक्ष्मण मस्तूरिया आज खारून नदी के किनारे महादेव घाट के कबीरपंथी समुदाय के शमशान घाट मे सुपुर्दखाक कर दिये गये । सबको साथ चलने का आव्हान करने वाला यह जनकवि सबकी आँखें नम करके अकेले ही सबके बीच मे से चला गया और छोड़ गया बहुत सी कसक और सवाल ।

कबीर पंथी लक्ष्मण मस्तूरिया ( गोस्वामी ) पूरे जीवनभर कबीर की पंरपरा के वाहक रहे । श्रद्धाजंलि सभा मे आये साहित्यिक , सांस्कृतिक बिरादरी के लोगो ने छत्तीसगढ को पहचान दिलाने वाले इस गंभीर कवि को शासन से कोई महत्वपूर्ण सम्मान , सहायता नही मिलने के दर्द का व्यक्त किया । छत्तीसगढ की ढाई करोड़ जनता के इस जन कवि लक्ष्मण मस्तूरिया को सोशल मीडिया के ज़रिये हज़ारों की संख्या मे श्रद्धाजंलि देने वाले , उनपर लिखने वालों मे से बहुत ही थोड़े लोग महादेवधाट मे दिखे । वर्जुअल और रियल दुनिया की सच्चाई को बयां करने वाली इस कटु सच्चाई के बीच कुछ साथी एक आवेदन पर सभी से हस्ताक्षर लेकर ये माँग करने जा रहे थे ,की मरणोपरांत लक्ष्मण मस्तूरिया के नाम कोई पुरस्कार , संस्था का नाम किया जाये ।

सोशल मीडिया पर उनके बारे मे बहुत कुछ लिखा गया । संपादन उपरांत कुछ कमेंट और पोस्ट ।

“मोर संग चलव रे… मोर संग चलव गा…” सत्तर के दशक में उनका लिखा यह गीत आज भी छत्तीसगढ़वासियों की जुबान पर है। छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मोर छंइहा भुइंया’ एवं ‘मोर संग चलव’ फिल्म के लिए उन्होंने कमाल के गीत लिखे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मया मंजरी’ का निर्देशन भी किया।

नि:शब्द हूं
क्या लिखूं, आज एक कवि नहीं गया..एक गीतकार नहीं गया..छत्तीसगढ़ की लोककला का ध्रुव तारा चला गया।

मस्तुरिया भूतो न भविष्यति

मुस्तुरिया एक ही रहेंगे.. उनके बिना छत्तीसगढ़ में लोकगीत का इतिहास पूरा नहीं होगा। मेरे हृदय और पसंद में छत्तीसगढ़ी का सबसे बड़ा पुरखा चला गया।
कका तोला आउ रहना रहीस, छत्तीसगढ़ म चेतना नई जागे हे..

 

मोर संग चलव रे.. छत्तीसगढ़ निर्माण के कला शिल्पी तोला नमन
छत्तीसगढ़ी लोक की चर्चा बिना लक्ष्मण मस्तुरिहा के संभव नहीं ।
। धरती की वंदना – मैं बंदत हंव दिन रात ओ मोर धरती मैया , जय होवय तोर , गांव की अभ्यर्थना – मोर गंवई गंगा ए , धन धन रे मोरे किसान , नदिया के तीर हे पुन्नी के रात हे , संयोग और वियोग श्रृंगार के मधुर गीत – वा रे मोर पंड़की मैना , कोन सुर बाजंव मैं तो घुनही बंसुरिया , मन डोले रे मांग फगुनव••
भाई जतका गीत लोक के मधुर चितेरे ••
पद्मश्री लक्ष्मण मस्तूरिया!!!

( कृपया दोयम दर्जे के साहित्यकार इस पोस्ट से दूर रहें, आप उनको ठगिए जिन्हें साहित्य में जनवाद का पता नहीं और जो ख़ुद का औसतपन बेच रहे हैं)

छत्तीसगढ़ छद्म साहित्यकारों के लिए भी उर्वर भूमि है। हमारे साहित्य को इस तरह संक्रमित किया गया कि माटीपुत्र मौलिक रचनाकारों से अन्याय हुआ, उन्हें अपमानित किया गया ।
लक्ष्मण मस्तूरिया ने छत्तीसगढ़ का ’राज्य-गान’ लिखा है-

“ मोर संग चलव गा…मोर संग चलव जी”

इस गीत की हर पंक्ति छत्तीसगढ़ मन की व्यथा-कथा कहती है-

ओ गिरे थके हपटे मन
अऊ परे डरे मनखे मन”

चिंतन कीजिए यह क्यों लिखा होगा मस्तूरियाजी ने। गिरे, थके, हपटे….कौन हैं?

यह दो पंक्तियाँ हमारा पूरा इतिहास और वर्तमान कहती हैं। यह गीत छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के पूर्व लिखा गया और आज भी इसकी सामयिकता, इसका यथार्थ जस का तस है।
महानदी मै अरपा पैरी
तन मन धो हरियालव

कहाँ जाहु बड़ दूर हे गँगा…..
कहाँ जाहु बड़ दूर हे गँगा

पापी ईहे तरो रे
मोर संग चलव गा”

“ कहाँ जाहू बड़ दूर हे गँगा”

हमारी गंगा तो महानदी, अरपा और पैरी हैं।

एक छत्तीसगढ़िया होने के नाते क्या आप ख़ुद से यह सवाल पूछ सकते हैं-

“मस्तूरियाजी को पद्मश्री क्यों नहीं मस्तुरिया जी ल पद्म श्री ले सम्मानित नइ करे बर गुणा अऊ गणित होय-च होही। आप जरूर जानत होहौ।
मै तो कइहौं के पद्श्री, पद्मभूषण ये सब मस्तुरिया के आघु बहुत छोटे हे ।
“जागौ रे जागौ रे
बागी बलिदानी मन
महाकाल भैरो लखनी
महमाया शीतला काली मन..,, –

लक्ष्मण मस्तुरिया संक्षिप्त परिचय

जन्म-07 जून 1949 स्थान-मस्तुरी,बिलासपुर छत्तीसगढ़ ।छत्तीसगढ़ के खेत खलिहान,मजदूर -किसान के जीवन संघर्षों ,छत्तीसगढ़ की माटी की महक ,अंचल की गौरव गाथा मस्तुरिया जी के गीतों में देखते ही बनती है ।बघेरा( दुर्ग) के दाऊ रामचंद्र देशमुख के “चदैनी गोंदा” में गीत लिखकर , गाकर 22 साल के उम्र में विशिष्ट पहचान पाई।चदैनी गोन्दा’ के लिये लगभग डेढ़ सौ गीत लिखे। मंच पर इनमें से 40-50 गीतों का उपयोग होता रहा। मस्तूरी से राजिम और आसपास जीवकोपर्जन के लिए काम ।राजकुमार कॉलेज रायपुर में अध्यापन ।

लक्ष्मण मस्तुरिया जी प्रसिध्द गीत1⃣मोर संग चलव रे,2⃣मय बंदत हव दिन रात वो मोर धरती मईया ,3⃣पता दे जा रे ,पता दे जा रे गाड़ी वाला,4⃣मया नई चिन्हें देसी बिदेशी,5⃣मन डोले रे मांघ फगुनवा, आदि।
छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह ‘ मोर संग चलव रे’ वर्ष 2003 में, 61छत्तीसगढी निबंधो का संग्रह ‘माटी कहे कुम्हार से’वर्ष 2008 में और 71हिन्दी कविताओं का संग्रह ‘ सिर्फ सत्य के लिये’ भी वर्ष 2008 में प्रकाशित हुए।मस्तुरिया जी का अन्य कृतियाँ मैं छत्तीसगढ़िया हव रे ,धुनही बंसुरिया,गवई-गंगा।सन 1974 में लाल किले में छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध शायर मुकीम भारती के साथ कवि सम्मेलन में शामिल हुए।वीर नारायण सिंह जी के जीवनी गाथा पर आधारित मस्तुरिया जी की लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी’ भी प्रकाशित होचुकी है।रामचंद्र देशमुख जी ने देवारों के नाचने गाने की पारंपरिक कला को वर्ष 1994-95 में ‘देवार डेरा ‘के नाम से संस्था बनाकर नई पहचान दिलाई ।

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  • सुभाष मिश्रा , छतीसगढ के जानेमाने रंगकर्मी और साहित्यकार . की फेसबुक से आभार सहित .

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