बेटा भुइयां के…….छत्तीसगढ़ के सबसे लोकप्रिय गीतकार, गायक और जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया को हम लोगों ने आज खो दिया है ./ गिरीश पंकज 

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को इस अकस्मात दुख को सहने की शक्ती प्रदान करे । 

लक्ष्मण जी मूलतः गीतकार थे जो बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के प्रख्यात ‘चंदैनी गोंदा’ में गीत लिखकर स्थापित हुए। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तुरी की माटी में सात जून 1949 को जन्मे लक्ष्मण जी महज बाईस साल की उम्र में ही प्रसिद्ध सांस्कृतिक-संस्था ‘चंदैनी गोंदा ‘ के मुख्य गायक बन चुके थे। ‘चंदैनी गोंदा” के संस्थापक रामचंद्र देशमुख जी ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक-पहचान को और आंचलिक-स्वाभिमान को देश और दुनिया के सामने लाने के लिए लोक-कलाकारों और कवियों को एक छत के नीचे लाकर दुर्ग जिले के अपने गाँव बघेरा में इसकी बुनियाद रखी, जहां सात नवम्बर १९७१ को अंचल के दूर -दूर से आए हजारों लोगों के बीच इसका पहला प्रदर्शन हुआ। छत्तीसगढ़ के खेत-खलिहान और मजूर-किसान के जीवन-संघर्ष को गीतों भरी मार्मिक कहानी के रूप में, एक सुंदर और ह्रदय स्पर्शी गीत-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘चंदैनी गोंदा’ ने यहाँ की जनता के दिलों में बरसों-बरस राज किया।

 

गेंदे के फूल दो प्रकार के होते हैं। बड़ा गोंदा सिर्फ श्रृंगार के काम आता है, जबकि छोटे आकार के गेंदे को छत्तीसगढ़ी में ‘चंदैनी गोंदा ‘ कहा जाता है, जो देवी की पूजा में अर्पित किया जाता है। देखा जाय तो गेंदे के फूलों का यह पौधा छत्तीसगढ़ के गाँवों में हर घर के आँगन की शान होता है। तो इसी चंदैनी गोंदा को प्रतीक बना कर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक जागरण की एक नयी यात्रा की शुरुआत हुई। जिसके सुंदर और मनभावन गीतों में से अनेक सुमधुर गीत अकेले लक्ष्मण मस्तुरिया ने लिखे थे।

दरअसल उस दौर में दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ने ग्राम बघेरा और वहां के अपने घर-आँगन को छत्तीसगढ़ी-रंगमंच का एक ऐसा स्टूडियो बना दिया था, जहाँ कवियों और कलाकारों की प्रतिभा को उड़ान के लिए नए पंख मिले।

लक्ष्मण मस्तुरिया जी ने ‘चंदैनी-गोंदा’ के लिए लगभग डेढ़ सौ गीत लिखे। मंच पर इनमे से चालीस-पचास गीतों का उपयोग होता रहा।

सांस्कृतिक जागरण के इस महान मंच ने कवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी को माटी की महक और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर उनके गीतों के ज़रिए उन्हें छत्तीसगढ़ में आवाज की दुनिया का नायक भी बना दिया। उनका यह गीत आज भी छत्तीसगढ़ की माटी में रचे-बसे हर इंसान को सामूहिकता की भावना में बाँध लेता है और लोग इन पंक्तियों को अनायास गुनगुनाने लगते हैं –

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी ,
ओ गिरे -थके हपटे मन, अऊ परे-डरे मनखे मन ,
मोर संग चलव रे , मोर संग चलव जी .
अमरैया कस जुड छाँव म मोर संग बईठ जुडालव ,
पानी पी लव मै सागर अवं,दुःख-पीरा बिसरा लव .
नवा जोत लव, नवा गाँव बर, रस्ता नवां गढव रे!

लक्ष्मण का यह गीत वास्तव में समाज के गिरे-थके, ठोकर खाए , भयभीत लोगों को अपने साथ चलने, आम्र-कुञ्ज की छाँव में बैठ कर शीतलता का अहसास करने, अपनी भावनाओं के सागर से पानी पीकर दुःख-पीरा को भुला देने और एक नए गाँव के निर्माण के लिए आशा की नयी ज्योति लेकर नया रास्ता गढ़ने का आव्हान करता है। अपने इसी गीत में लक्ष्मण जनता को यह भी संदेश देते हैं-

महानदी मै, अरपा-पैरी, तन-मन धो फरियालव ,
कहाँ जाहू बड दूर हे गंगा, पापी इहाँ तरव रे ,
मोर संग चलव रे , मोर संग चलव जी!

इस गीत में शब्द ज़रूर लक्ष्मण जी के हैं, लेकिन भावनाएं छत्तीसगढ़ महतारी की हैं , जो अपनी धरती की संतानों से कह रही है कि मैं ही महानदी और मैं ही अरपा और पैरी नदी हूँ , गंगा तो बहुत दूर है, इसलिए पापियों, तुम यहीं तर जाओ।

लक्ष्मण छत्तीसगढ़ के उन गिने -चुने कवियों में हैं, जिन्हें नयी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह के मौके पर लाल किले के मंच से काव्य-पाठ करने का अवसर मिला है। लक्ष्मण को यह गौरव आज से छत्तीस वर्ष पहले १९७४ में छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध शायर मुकीम भारती के साथ मिल चुका था। उस दौर में वहां २० जनवरी १९७४ को आयोजित काव्य-संध्या में उन्हें गोपाल दास ‘नीरज’, बालकवि बैरागी, रमानाथ अवस्थी, डॉ रविन्द्र भ्रमर, इन्द्रजीत सिंह ‘तुलसी’, निर्भय हाथरसी और रामवतार त्यागी जैसे लोकप्रिय कवियों के साथ आमंत्रित किया गया था।

छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक जागरण के ऐतिहासिक रंगमंच ‘चंदैनी गोंदा’ से आकाशवाणी, दूरदर्शन और कवि सम्मेलनों के मंच से होते हुए लक्ष्मण छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी उन्होने अनेको गीत लिखे ।

लक्ष्मण के गीतों को सुरों में सजा कर ग्रामोफोन के जमाने में करीब चालीस रिकार्ड्स भी बाजार में आए और खूब लोकप्रिय भी हुए। उनके गीतों पर आधारित सैकड़ों कैसेट्स और ऑडियो तथा वीडियो सी .डी .संगीत के बाज़ार में हाथों-हाथ लिए गए हैं।

उनकी 77 छतीसगढ  कविताओं का संग्रह ‘मोर संग चलव’ वर्ष 2003 में , इकसठ छत्तीसगढ़ी निबन्धों का संग्रह ‘माटी कहे कुम्हार से’ वर्ष 2008 में और इकहत्तर हिन्दी कविताओं का संकलन ‘सिर्फ सत्य के लिए ‘ भी वर्ष में प्रकाशित हो चुका है इसके पहले छत्तीसगढ़ के महान क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह की जीवन-गाथा पर आधारित उनकी एक लम्बी कविता ‘सोनाखान के आगी ‘ भी पुस्तक रूप में आ चुकी है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में साहित्य, कला और संस्कृति के मैदान में पिछले करीब चालीस वर्षों से नाबाद रहकर एक लंबी पारी खेल रहे लक्ष्मण के खाते में तरह -तरह की सफलताओं के साथ-साथ सम्मानों की भी एक लंबी फेहरिस्त भी है। दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय ,भोपाल द्वारा मार्च २००८ में आयोजित अलंकरण समारोह में जिन तीन प्रसिद्ध कवियों को मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री बलराम जाखड ने सम्मानित किया , उनमे लक्ष्मण मस्तुरिया भी थे , जिन्हें आंचलिक रचनाकार सम्मान से नवाजा गया

अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ में भी लक्ष्मण को अनेक अवसरों पर अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है , जिनमे रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान (दुर्ग) और सृजन सम्मान (रायपुर ), भी शामिल है। हमारे समय के वरिष्ठ साहित्यकार रायगढ़ निवासी डॉ. बलदेव कहते हैं- ‘लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत चिर युवा छत्तीसगढिया के गीत हैं। अल्हड जवानी, उमंग, उत्साह, साहस, आस्था , आशा, विश्वास , स्वाभिमान , उत्कट प्रेम, सर्वस्व समर्पण की भावना, विरह-वेदना और पुनर्मिलन की छटपटाहट की सहजतम अभिव्यक्ति उनके गीतों की विशेषता है। उनके गीतों की लोकप्रियता का रहस्य उनके गले की मिठास के साथ साथ उनके गीतों में कथ्य की नवीनता तथा रूप-विधान और भाव-सौंदर्य रहा है ।

अलविदा छत्तीसगढ़ महतारी के सच्चे सांस्कृतिक सपूत… 🙏🏽

गिरीश पंकज ,वरिष्ठ साहित्यकार छतीसगढ 

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