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दस्तक, नवम्बर-दिसम्बर 2018, का सम्पादकीय 

इलाहाबाद, बनारस सहित उत्तर प्रदेश के ज्यादातर शहर इस समय धूल-मलबे से अंटे पड़े हैं। यहां के लोग इस खुदाई से आजिज आकर आपस में मजाक करने लगे है कि ‘आज कल हर तरफ खुदा-खुदा है।’ इलाहाबाद का नाम हाल ही में ‘प्रयागराज’ होने से चर्चा का विषय भले ही बदल गया है, लेकिन इस समस्या से सभी अब भी जूझ रहे हैं। शहर में यह खुदाई और पेड़ कटाई इसलिए की जा रही है ताकि इलाहाबाद को ‘स्मार्ट’ बनाया जा सके, वो भी कुंभ मेले के पहले, क्योंकि इस बार का कुंभ सरकारी सौजन्य से इस ‘स्मार्ट सिटी’ का पहला ‘धार्मिक इवेंट’ होने जा रहा है। इलाहाबाद को स्मार्ट बनाने के लिए एक ओर जहां अमेरिका की टीम 2015 से ही यहां का चक्कर लगा रही है, तो दूसरी ओर इस बार के अर्द्धकुंभ को धार्मिक नहीं बल्कि ‘साम्प्रदायिक वोट का इवेंट’ बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित साधुओं का ‘परामर्श मण्डल’ योगी मोदी, और शाह की टीम को लगातार दिशा-निर्देश दे रहा है।

उनके दिशा-निर्देश पर ही राज्यपाल रामनाईक ने इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ घोषित पहले कर दिया, उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने इसे मंजूरी बाद में दी। इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ रहेगा और इसका शरीर ‘शिकागो’। वास्तव में ‘प्रयागराज’ धर्म और साम्राज्यवादी विकास के गठजोड़ का बेजोड़ मॉडल बन गया है। यह ऐसा मॉडल है, जिसमें धार्मिक लोगों को भी धकेलकर बाहर कर दिया गया है। इस साल माघ महीने में संगम के किनारे तंबू में रहने वाले लोगों को संगम तट से दूर कर दिया गया है। योगी जी ने हालिया दौरे में प्रशासन को फटकार लगाकर कहा है कि ‘ये लोग घर के हैं, कहीं भी रह लेंगे, संगम किनारे देशी-विदेशी पर्यटकों को जगह मिलनी चाहिए।’ अखबारों ने इस खबर को मुख्यमंत्री के प्रति प्रशंसाभाव से प्रकाशित किया, जबकि कल्पवास करने वाले हजारों लोगों, जिनमें बड़ी आबादी बुजुर्गों की होती है, को प्रतिदिन के स्नान के लिए रोज 8-10 किमी पैदल चलना होगा। लेकिन किसी भक्त ने इसके खिलाफ मुंह तक नहीं खोला है। यह तो कुंभ के विकास कार्य की बात है, जो एक अलग लेख का विषय है। यहां हम इलाहाबाद, बनारस सहित प्रदेश ही नहीं देश भर में किये जा रहे तोड़-फोड़ की बात कर रहे हैं। यह तोड़-फोड़ कहीं शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर, कहीं सड़क बनाने के नाम पर, कहीं फ्लाईओवर बनाने के नाम पर तो कहीं बनी हुई सड़क चौड़ी करने के नाम पर की जा रही है। इस खुदाई और पेड़-कटाई से होने वाली मुसीबतों को लोग यह सोचकर झेले जा रहे हैं कि यह सब ‘विकास कार्य’ है, जिसमें आगे चलकर हम सब को लाभ होगा। लेकिन सोचने की बात है कि जो सरकार राशनकार्ड को आधार से जोड़कर गरीबों को गेहूं-चावल के लाभ से वंचित कर रही है, वह सरकार भला जनता के लाभ के लिए विकास कार्य कब से करने लगी? यह विकास कार्य इस तथ्य से और भी संदिग्ध लगने लगता है कि इस वक्त हमारा शहर, प्रदेश, या देश ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के सभी देश स्मार्ट बनाये जाने के लिए खुदे पड़े हैं। भारत के आस-पास के सभी देशों- पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार सभी देशों के कई शहर स्मार्ट बनाये जाने के लिए खोद दिये गये हैं या खोदे जाने की योजना से गुजर रहे हैं, जिसकी वजह से इस समूचे क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है और हवा में फेफड़ों को देने वाली कई बीमारियां घुल चुकी हैं।

यह सब क्यों और किसके लाभ के लिए है, यह समझना आज के दौर में मुश्किल नहीं है, जबकि पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में बुरी तरह आ चुकी है। इस आर्थिक मंदी का एक ही मतलब है-साम्राज्यवादी कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे का चक्र रूक गया है। उन्हें पूंजीनिवेश कर मुनाफा कमाने के लिए कुछ और क्षेत्र, कुछ और जनता चाहिए। इन दोनों को उपलब्ध कराने का काम साम्राज्यवादी देशों और भारत जैसे देशों की सरकारें कर रही हैं। इस समय भारत इन देशों के लिए सबसे मुफीद जगह है, भारत की इसी स्थिति को साम्राज्यवादी देश कहते हैं कि ‘भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है।’ हमारे लिए इसका अर्थ है कि ‘भारत की जनता इन कॉरपोरेटों के लिए मुनाफे को बढ़ाने के लिए सबसे तेजी से दबोची जा रही है।’ स्मार्ट सिटी के बहाने, विकास के नाम पर इस देश की जनता का खून सबसे तेजी से चूसा जाना है, ताकि मुनाफाखोर कारपोरेटों की अर्थव्यवस्था मंदी से उबर सके।

अमेरिका, यूरोपीय देश, जापान और चीन जैसे साम्राज्यवादी देशों को इस मंदी से निकालने में जो क्षेत्र इस समय सबसे मददगार है, वह है ‘विकास’ यानि ‘निर्माण’ का क्षेत्र। यही वजह है कि भारत सहित तमाम अल्पविकसित देशों में निर्माण कार्य जोरों पर चल रहा है, भले ही इन देशों की जरूरत सड़क से ज्यादा स्वास्थ्य की हो या कुछ भी और। और यही वजह है कि इन दिनों हमारा शहर, प्रदेश, देश और महाद्वीप तक खुदा-खुदा है।

भारत के साथ मात्र अमेरिका से हुए समझौते से इस पूरे ‘विकास कार्य’ की मंशा को समझा जा सकता है। अमेरिका की ओर से यह समझौता यूनाइटेड स्टेट एण्ड डेवलपमेण्ट एजेन्सी ख्न्ैज्क्।, ने किया है। खुद यह एजेन्सी अपने बारे में कहती है कि ‘विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अमेरिकी सामान और सेवायें निर्यात कर अमेरिका में रोजगार पैदा करना हमारा मिशन है।’ इस उद्देश्य में उसने यह नहीं जोड़ा कि इसके माध्यम से अपने देश की मंदी को दूर करना भी इसका उद्देश्य है। अपने इस मिशन को पूरा करने के लिए यूएसटीडीए ने एक अन्य संस्था ‘इण्टरनेशनल बिजनेस पार्टनरशिप प्रोग्राम ख्प्ठच्च्, का गठन किया है, जिसका काम है भारत और इसके आसपास के अर्द्धविकसित और फूलती अर्थव्यवस्था वाले देशों में निर्यात बढ़ाने के लिए अमेरिकी कम्पनियों के बीच सम्बन्ध विकसित करना। जाहिर है ये तालमेल भारत जैसे देशों से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने के लिए है। ये तो सिर्फ एक देश से हुए समझौते का कुछ खुलासा है, इस तरह भारत में तथा पड़ोसी मुल्कों में अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय देश, जापान, चीन सभी अपनी ठहरी हुई अर्थव्यवस्था को संभालने में लगे है, और हमें लग रहा है कि हमारा विकास हो रहा है।

इस मुनाफाखोर व्यवस्था में आपदायें भी इन कम्पनियों के लिए खुशियों की सौगात लकर आती हैं। नेपाल में तीन साल पहले आये भूकम्प के बाद काठमाण्डू, ललितपुर सहित कई शहरों को ‘स्मार्ट’ बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हो गये हैं, जिसके लिए फिनलैण्ड स्थित कम्पनी को ठेका दिया गया है, इस कम्पनी को देने के लिए भारी-भरकम विदेशी कर्जा भी लिया गया है और किसानों से उनकी जमीनें भी। इस कारण इस समय काठमाण्डू भी खुदा-खुदा है। पाकिस्तान का इस्लामाबाद वहां का पहला ‘स्मार्ट सिटी कैपिटल’ बनने जा रहा है, इसके बाद मुल्तान, सहिवाल व अन्य शहरों का नम्बर आना है। यहां इस काम के लिए चीन और सऊदी अरब की कम्पनियां मैदान में हैं। बांग्लादेश में भी सऊदी अरब है। श्रीलंका में कोलंबो, रतनपुरा के स्मार्ट बनने का नम्बर लग चुका है, जहां अमेरिका के रियल स्टेट डेवलपर आ चुके हैं। म्यामांर में भी शहरीकरण विकास परियोजना प्रवेश कर चुकी है। इन सभी देशों में इस कार्य के लिए जमीन कब्जाने का काम यहां की सरकारों द्वारा लगभग पूरा किया जा चुका है। यानि इस लूट का ‘बेस’ सरकार ने तैयार कर दिया है, जिसे हर जगह ‘विकास’ का ही नाम दिया गया है, जिसमें इन देशों की मध्यवर्गीय जनता डूब-उतरा रही है। असलियत यह है कि इस ‘विकास’ और ‘स्मार्टनेस’ से मंदी में डूबे कारपोरेटों को रोजगार मिल रहा है, और उनके लिए ही पूरा महाद्वीप इस समय खुदा-खुदा है, और सालों तक इस यह सिलसिला कायम रहना है।

सीमा आज़ाद

संपादक ,दस्तक 

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