जगदलपुर विधिक सहायता संघ अपनी अभिन्न मित्र, सहयोगी, संरक्षक और प्रेरणास्रोत – सुधा भरद्वाज की गिरफ्तारी की निंदा करता है.

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जगदलपुर विधिक सहायता संघ अपनी अभिन्न मित्र, सहयोगी, संरक्षक और प्रेरणास्रोत – सुधा भरद्वाज की गिरफ्तारी की निंदा करता है.

 

प्रेस विज्ञप्ति
हम जगदलपुर विधिक सहायता संघ और उससे जुड़े लोग, पुलिस द्वारा हमारी साथी वकील, मित्र, सलाहकार और सहयोगी सुधा भारद्वाज की गिरफ्तारी और उन्हें पुलिस रिमांड पर भेजे जाने की कड़ी निंदा करते हैं। हम सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, वकीलों, दोस्तों व सभी लोकतांत्रिक अधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता समुदायों और आम जनता से एकजुटता और ताकत की सामूहिक अभिव्यक्ति के लिए आह्वान करते हैं। साथ ही हम अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेखकों और प्रोफेसरों पर हो रहे हमले की भी निंदा करते हैं, जिसके तहत वकील सुरेंद्र गडलिंग, वकील अरुण फरेरा, प्रोफेसर शोमा सेन, वर्णन गोंसाल्वेज़, महेश राउत, वरवर राव, गौतम नवलखा, सुधीर धावले, फ्रा. स्टेन स्वामी, रोना विल्सन, आनंद टेलटुम्बे और कई अन्य लोगों को पुणे पुलिस द्वारा झूठ और छल के इस जाल से फंसाया जा रहा है। हम सरकार द्वारा नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संगठनों को चुप करने के उद्देश्य से किये जा रहे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हमलों की भी निंदा करते हैं। भारत सरकार एक रणनीतिगत तरीक़े से हर असंतोष की आवाज़ को “देशद्रोही” या “शहरी नक्सल” घोषित कर रही है, इस लगातार हमले से जूझ रहे संगठनों — पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स(PUDR), इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स (IAPL), राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए समिति (CRPP), लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा समिति (CPDR), और पर्सिक्यूटेड प्रिसनर्स सॉलिडेरिटी कमिटी (PPSC) — के साथ भी हम दिल से खड़े हैं ।

 

हम पुणे पुलिस द्वारा बनायी गयी उन सभी मनगढ़ंत कहानियों, जिन्हें पुलिस द्वारा मिडिया को दिए गए उन कुख्यात पत्रों के ज़रिए बताया जा रहा है, का पुरज़ोर खंडन करते हैं। हम उम्मीद करते हैं की आम जनता पुलिस के इस झूठ और षड़यन्त्र को समझेगी। पूरा मामला ऐसे अप्रामाणिक, असंपुष्ट, व असत्यापित पत्र — ऐसे पत्र जो कि अर्थ और शैली दोनों ही संदर्भ में बहुत हास्यापद हैं — के आधार पर आपराधिक इलज़ाम लगाता है। जैसे कि न्यायमूर्ति डी.वी.चंद्रचूड़ ने अपने पृथक निर्णय में उल्लेख किया था कि पुलिस द्वारा जो पत्र सुधा भारद्वाज द्वारा लिखा हुआ बताया जा रहा है वह किसी मराठी भाषी व्यक्ति ने लिखा है — जब की अधिवक्ता सुधा को मराठी नहीं आती है और उन्होनें अपनी हिंदी भी दिल्ली, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में सीखी है, जहां वह पिछले 45 वर्षों में रहती और काम करती आई हैं! जिन पत्रों को पुलिस इन सभी लोगों के खिलाफ एक अहम सबूत की तरह दिखा रही है उसे पुलिस ने अदालत में पेश करने से पहले प्रेस को जारी कर दिया। पुलिस का यह रवैय्या स्पष्ट रूप से दिखाता है कि अभियोजन पक्ष को उनके ही द्वारा लगाए हुए आरोपों पर थोड़ा भी विश्वास नहीं है और इसीलिए वो आम जनता में गिरफ्तार लोगों को बदनाम करने के इरादे से इस तरह के सस्ते हथकंडों को अपना रहा है।
यह एक दम खुले आम, बिना कानून से डरे हुए किया जा रहा है। यह कोई पहली या अकेली घटना नहीं है जहाँ पुलिस द्वारा जनता की राय को बाटने के लिए मीडिया का इस्तेमाल किया गया हो। यह आज की सरकार की एक ख़तरनाक प्रवृत्ति जिसके अंतर्गत सारी लड़ाइयां झूठ और छल से मीडिया में लड़ी जा रही है, न की क़ानूनी दायरे के भीतर अदालतों में।

 

हम पुणे पुलिस द्वारा सुधाजी और हमारे ऊपर लगाए गए उन आरोपों का भी स्पष्ट रूप से खंडन करते हैं जिसके तहत यह दिखाया जा रहा है कि सुधा बस्तर के अंदरूनी इलाकों में चल रही हमारी गतिविधियों के लिए पैसे की व्यवस्था करती हैं। पुलिस यह एक जाली पत्र के ज़रिए दिखा रही है जिसमें किसी “सुधा” द्वारा किसी “कामरेड प्रकाश” को संबोधित करते हुए इस बात का जिक्र किया है। हम पूरी तरह से इन आरोपों से इंकार करते हैं और स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि हमें अपने काम और हमारी गतिविधियों के लिए वकील सुधा भारद्वाज द्वारा कभी कोई पैसा नहीं दिया गया है। हमें पिछले पांच साल से अन्य समूहों, दोस्तों और व्यक्तिगत वकीलों से आर्थिक सहायता मिलती आयी है और अगर कोई हमारे वित्त का माध्यम जानना चाहता है तो हम उनसे ख़ुशी से अपने खाते का विवरण साझा करने को तैयार हैं। हम सुधाजी के साथ किसी भी तरह की आर्थिक सहायता के सम्बन्ध से इंकार करते हैं, पर हम दिल से, और पूरे सम्मान के साथ उनके साथ अपने अत्यंत घनिष्ठ संबंध को स्वीकार करते हैं। सुधाजी के साथ अपने इस सबंध को हम अपना अच्छा भाग्य समझते हैं क्यूंकि हमारे दिल में उनके प्रति और उनके अमूल्य काम के प्रति बहुत सम्मान है।

 

साथ ही में हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि बस्तर के किसी भी अंदरूनी इस्लाके में हम कभी भी नहीं जाते हैं और न ही हमारी वहां कोई गतिविधियां है। वकील होने के नाते हम अदालतों, पुलिस स्टेशनों, प्रशासनिक कार्यालयों और शोधकर्ताओं के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते आये हैं। हमें और हमारे काम को बदनाम करने और हमारी पहचान पर गंभीर सवाल खड़ा करने के इरादे से हमारे खिलाफ एक सोशल मीडिया अभियान चला आ रहा है। हमारे खिलाफ पुलिस द्वारा लगाए गए इस तरह के झूठे और बेबुनियादी इलज़ाम नए नहीं हैं और छत्तीसगढ़ पुलिस और उनके द्वारा संचालित समूहों द्वारा हमें लगातार धमकाया और बदनाम किया जाता रहा है। बीजापुर जिले में हुई सामूहित यौन हिंसा की घटनाओं में महिलाओं को क़ानूनी सहायता देने के परिणामस्वरूप , फरवरी 2016 में जगदलपुर से हमारा पलायन हुआ था।बस्तर के संघर्ष प्रवण क्षेत्र में उन आदिवासियों, जिनके मानावाधिकारों का उल्लंघन किया गया है, को कानूनी सहायता प्रदान करने के हमारे काम के लिए हम पर लगातार हमला किया गया है। जुलाई 2013 से हम प्रलेखन से संबंधित काम में शामिल रहे हैं, साथ ही हम उन आदिवासियों का क़ानूनी प्रतिनिधित्व करते आये हैं जिन्हें पुलिस द्वारा झूठे मामलों में फसाया जाता है। इसके अलावा हम उच्च न्यायालय एवं जांच आयोग में उन लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और करते आये हैं जिनके परिवार वालों को पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मार दिया गया है। इस काम के चलते पुलिस और सरकार दोनों ही हमें नापसंद करती हैं, बावजूद इसके कि हम हमेशा कानून की सीमाओं के भीतर काम करते हैं और हमारा काम इस संवैधानिक दायित्व पर आधारित है कि हाशिए पर रहने वाले लोगों को भी क़ानून का संरक्षण प्राप्त हो, और क़ानून उनके लिए भी समान रूप से काम करे।

 

सुधा भारद्वाज ने हमें कभी भी कोई पैसा नहीं दिया है, पर जो उन्होंने हम जैसे युवा वकीलों एवं पुरे कानून समुदाय को दिया है वह पैसों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। अपनी अदम्य भावना से वकील सुधा भारद्वाज कई लोगों के लिए प्रेरणास्रोत रहीं हैं। इन पांच सालों में उनके साथ करीबी रूप से कानूनी अभ्यास देखने और सिखने का जो मौक़ा हमें मिला है उसके लिए हम अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं । कानून की सीमाओं पर निराशा और कुंठा के क्षणों में उन्होनें हमें कानूनी रूप से लड़ाई लड़ते समय दृढ़ता और धैर्य रखने का मूल्य सिखाया। उनसे हमने सीखा कि बड़ी जीत ही सब कुछ नहीं होती, जरुरी है लड़ाई और संघर्ष की प्रक्रिया। नए नौसिखिये वकील होने के बावजूद उन्होंने हमेशा हमें इज्जत दी और हमारे सरल से सरल प्रश्नों और सुझावों को भी अहमियत दी । उन्होंने हमारे लिए अपने एक सहकर्मी की जगह बनायी न की कभी भी जूनियर के रूप में हमें नकारा ।सिर्फ हमें ही नहीं, उन्होंने कई और लोगों को कानूनी शिक्षा और मानवाधिकार कानून के अंतर्गत काम करने के लिए प्रेरित किया है।

 

सुधाजी एक असाधारण नैतिकता और समर्पण के साथ काम करने वालीं वकील रही हैं और उन्होंने निडरता से उन मामलों में कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान किया है, जिन्हें कोई अन्य वकील छूने की भी हिम्मत नहीं करता। उन्होंने नसबंदी काण्ड— जहां सरकारी लापरवाही के कारण 13 महिलाएं मर गयी थीं — के जांच आयोग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रगतिशील सीमेंट श्रमिक संघ के मामलों पर उच्च न्यायालयों और श्रम न्यायालयों में भी सक्रिय रूप से मामलों कि पैरवी करी और वकीलों और न्यायाधीशों ने उनके ज़ोरदार कानूनी कौशल की काफ़ी सराहना करी। उन्होंने झारखंड में एमओटीए(MoTA) का प्रतिनिधित्व किया है और वह लगातार आशियात्मक किसानों और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करती आयी हैं, जिनकी जमीन का सरकार द्वारा “विकास” के नाम पर, खनन के लिए, या औद्योगिक लाभ के लिए ज़बरदस्ती अधिग्रहण हुआ है या किया जा रहा है । उन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्य न्यायाधीश द्वारा छत्तीसगढ़ विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य के रूप में भी नियुक्त किया गया था जिसके तहत उन्होंने कई लोगों को कानूनी सहायता दी। वकील के रूप में उनका काम उनकी पहचान और जीवन का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। सुधाजी मज़दूर संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के साथ जुडी हैं , पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज की महासचिव हैं, आईएपीएल की उपाध्यक्ष हैं, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की सदस्य हैं, और साथ ही एक ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनकी नैतिकता की जितनी भी सराहना करें उतनी कम है। सुधाजी पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉ. बीनायक सेन की कुख्यात गिरफ्तारी के बाद एक दृढ़ आवाज, समर्थक और आयोजक भी रही हैं। पीयूसीएल के एक सदस्य के रूप में उन्होंने सलवा जुडूम द्वारा किये गए मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ दृढ़ता से बात की और एक वकील के रूप में उन्होंने सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं और एसपीओ द्वारा सामसेट्टी बलात्कार में पीड़ित लोगों का प्रतिनिधित्व किया। हम वकीलों, जिन्होंने जगदलपुर विधिक सहायता संघ में काम किया है या काम कर रहे हैं, के लिए सुधाजी वह ताकत हैं जो हमें बनाए रखती है, हमें मार्गदर्शन देती है और हमें आकार देतीं हैं।

 

अब भी, जबकि सुधाजी को पुलिस हिरासत में भेजे जाने की खबरें आ रही हैं, हम अपने काम को और भी उत्साह और ताकत के साथ जारी रख रहे हैं। हम भीमा कोरेगांव मामले में सुधा भारद्वाज और शेष गिरफ्तार लोगों के साथ दृढ़ता से खड़े हैं। हम अपने काम के अगले अध्याय को अधिवक्ता सुधा भारद्वाज को समर्पित करते हैं, और हम उम्मीद करते हैं कि हम उनको निराश नहीं करेंगे। साथ ही, जैसे जैसे इस अन्यायपूर्ण गिरफ्तारी के खिलाफ क़ानूनी लड़ाई आगे बढ़ रही है, हम इस उम्मीद की आखिरी किरण को पकड़े हुए हैं की भारत की कानूनी व्यवस्था सुधाजी को निराश नहीं करेगी।

 

निकिता अग्रवाल, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय,बिलासपुर
शिक्खा पांडे, डेविड डब्लू. लीब्रोन ह्यूमन राइट्स फेलो,२०१८
ईशा खंडेलवाल,अधिवक्ता, जगदलपुर विधिक सहायता संघ
शालिनी गेरा, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
डॉ.लाखन सिंह, छत्तीसगढ़ राज्य अध्यक्ष, पि.यु.सी.एल
प्रियंका शुक्ल, अधिवक्ता, बिलासपुर
रुपेश कुमार
गुनीत आहूजा, अधिवक्ता, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
पारिजात भरद्वाज, अधिवक्ता
गुट्टा रोहित, ह्यूमन राइट्स फोरम
राधिका चितकारा, विधिक शोधकर्ता
मधुर भारतीय, अधिवक्ता, भारत सर्वोच्च न्यायलय
चांदनी चावला, स्कूल ऑफ़ अफ्रीकन एंड ओरिएण्टल स्टडीज, लन्दन
सहाना मंजेश, अधिवक्ता
आरुषि महाजन, अधिवक्ता, लॉयर्स कलेक्टिव (एच.आई.वि./एड्स विंग), दिल्ली
कुलदीप सिंह, हिदायतुल्ला राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर
अजय सिंह सूर्यवंशी, अधिवक्ता
गौरव बक्शी, हिदायतुल्ला राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर
अभिनव गुप्ता, शोधकर्ता
जी.वि.इस. सहित रेड्डी, अधिवक्ता, दिल्ली
अर्पित गुप्ता, Legislative Assistant to Member of Parliament (LAMP) fellow
प्राविता, अधिवक्ता
शार्दुल गोपूजकर, महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, मुंबई
रिद्धि पांडेय, मास्टर्स छात्र, IHEID, जेनीवा
निकिता सोनावणे, अधिवक्ता
मानसी वर्मा, अधिवक्ता
सराह जैकब्सन, माटी
आश्विन पटुला , नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया युनिवर्सिटी, बैंगलोर
अतीन्द्रियो चक्रबोर्ती, अधिवक्ता
गोपिका एन. , अधिवक्ता
ज़ेबा सिकोरा, अधिवक्ता
ईरा चड्ढा श्रीधर
मुक्त जोशी, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया युनिवर्सिटी, बैंगलोर
उपासना चौहान, Volunteer at Migration and Asylum Project
संजीव मेनन , अधिवक्ता
रिशिका सहगल, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी
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